पाती बिटिया के नाम-4 (वे अद्वितीय बलिदान)


 – डॉ विकास दवे

प्रिय बिटिया!

कई बार आपसे बलिदानों के विषय में चर्चा हुई है। देश, धर्म और संस्कृति हेतु अपने प्राणों की आहूति दे देने की परंपरा इस देश में बहुत पुरानी है। आपको याद होगी मारवाड़ की वह कथा जब महाराणा प्रताप को सुरक्षित युद्ध मैदान से बाहर निकालने के लिए झाला मानसिंह ने प्रताप का शिरस्त्राण (सिर पर पहनने का रक्षा कवच) स्वयं पहन लिया था। मुगलों ने संघर्ष कर उन्हें मारकर यही समझा कि राणा का वध हुआ है, जबकि राणा स्वयं तो सुरक्षित युद्ध मैदान से बाहर जा चुके थे।

ऐसी ही एक घटना आपको आज सुनाने जा रहा हूँ जो इतिहास के पृष्ठों में दबकर रही लेकिन उसकी जानकारी संभवतया आप को नहीं होगी।

यह समय वह था जब काश्मीर में रह रहे हिन्दुओं को मुगल अत्याचारों का सामना करना पड़ रहा था। जब हिन्दू जनता गुरु तेगबहादुर के पास रक्षा का आग्रह लेकर पहुँची तो गुरुदेव कुछ क्षण के लिए विचार करने लगे। उनका छोटा-सा नौ वर्षीय पुत्र गोविन्दसिंह गोद में ही बैठा था। वह झट से बोला – ‘पिताजी क्या विचार कर रहे हैं? इनकी रक्षा हेतु बलिदान करने के लिए आपसे बड़ा महापुरूष और कौन हो सकता है? पिता की तंद्रा एक क्षण में भंग हुई और उन्होंने कहा – घोषणा करवा दे कि मुगल शासकों को आप बता दीजिए कि यदि गुरु तेगबहादुर धर्म परिवर्तन कर लेंगे तो हम सभी धर्म परिवर्तन कर लेंगे।

उन्होंने तत्काल अपनी गद्दी पर गोविन्दसिंह को बैठाया और स्वयं गाँव-गाँव में धर्म जागरण हेतु निकल पड़े। औरंगजेब ने उन्हें उनके पाँच शिष्यों सहित गिरफ्तार कर लिया उन्हें धर्म परिवर्तन हेतु यातनाएँ दी जाने लगीं।

यातनाएँ भी ऐसी कि सुनकर ही हृदय दहल उठे। एक शिष्य भाई दयालदास को उबलते हुए तेल की कढ़ाई में डलवा दिया गया। भाई मतिदास को तो आरे से चिरवाकर दो टुकड़े ही कर दिए गए। भाई सतीदास को रूई में लपेटकर आग लगा दी गई। धर्म रक्षा हेतु सभी ने प्राण त्याग दिए किन्तु धर्मान्तरण नहीं किया। अंत में गुरुदेव को भी पिंजरे में बन्दकर चाँदनी चौक में ले जाकर उनकी गर्दन धड़ से अलग कर दी गई।

ये सारे बलिदान तो अपने आप में अनुठे थे ही लेकिन – मैं जिस बलिदान की चर्चा प्रारंभ में कर रहा था वह इन सबसे हटकर था। गुरुदेव की गर्दन और धड़ को मुगल पहरे से लाकर दाह संस्कार करना आवश्यक था। इस कार्य हेतु भाई जीवन एवं उनका पुत्र गाड़ीवान का रूप धरकर चाँदनी चौक पहुँचे। अंधकार का लाभ लेकर वे शव तक पहुँच भी गए किन्तु मुगल सैनिकों को रात्रि भर गलतफहमी में रखने के लिए आवश्यक था कि एक धड़ और गर्दन घटना स्थल पर पड़े रहें।

पिता-पुत्र में बहुत विवाद हुआ दोनों अपना बलिदान करना चाहते थे किन्तु अन्तत: पिता ने कहा, “तुम अभी युवा हो। गोविन्द सिंह जी की सेवा में तुम लम्बे समय तक रह सकते हो अत: मुझे ही यह बलिदान करने दो।” इतना कहकर उन्होंने अपनी गर्दन स्वयं तलवार से अलग कर दी। पुत्र भी उनके शव को प्रणाम कर गुरु तेगबहादुर के शव को लेकर घर पहुँचा। श्रद्धापूर्वक दाह संस्कार कर गुरु गोविन्दसिंह जी के साथ सभी ने धर्म रक्षा की शपथ ली।

बेटे! इस प्रसंग से दो बातें स्पष्ट हो जाती हैं। पहली तो यह कि एक छोटा-सा बालक भी पिता के लिए प्रेरणा बन सकता है। इसके लिए आयु कभी बाधा नहीं बन सकती। दूसरी बात यह है कि बलिदान और त्याग कभी प्रसिद्धि के लिए नहीं किया जाता। नींव के पत्थर बनने वाले कभी शिखर की शोभा नहीं बनते किन्तु शिखर उन्हीं के त्याग के बल पर खड़ा होता है। राष्ट्रहित में ये दो बातें सदैव अपने मन में बनी रहना चाहिए और हमारे राष्ट्रीय चरित्र के विकास के लिए आवश्यक है कि चलता रह यह चिन्तन निरन्तर…।

  • तुम्हारे पापा

(लेखक इंदौर से प्रकाशित ‘देवपुत्र’ सर्वाधिक प्रसारित बाल मासिक पत्रिका के संपादक है।)

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