कान्हा की शिक्षा – श्रीकृष्ण जन्म पर विशेष

 – डा.अजय शर्मा

हमारे देश में महापुरूष एवं भगवान के जन्म दिन मनाने की स्वस्थ परम्परा है, जो मानवीयता के अनेक संस्कारों को प्रदान करती है। आवश्यकता है उसे हृदय से मनाने की। आईए भगवान श्रीकृष्ण के जन्म दिवस पर विद्यार्थी के नाते उनकी कतिषय विशेषताओं को जानने का प्रयास करें जो हमारे जीवन को सुखद और सफल बनायेंगी।

आज का मानव अपने ही बुने जाल में उलझ गया है। अनेक तनावों को स्वयं ही आमन्त्रित करता है और उनकी समीपता से आहत हो रोगी होकर कराहता हुआ समय से पूर्व ही इहलोक से विदा ले रहा है। ऐसे अवसर पर हम अपने कान्हा अर्थात् श्रीकृष्ण की शिक्षाओं को व्यवहार में लायेंगे तब ही स्वस्थ्य जीवन, पूर्ण जीवन और सोद्देश्य जीवन जी सकेंगे। भगवान श्रीकृष्ण को आज सारा विश्व मानता है। वे बड़े लोकप्रिय देवता हैं। अन्य देवता जो कार्य नहीं कर पाये वे चार कार्य हमारे कान्हा ने किए, आईये उनसे सीखें।

खूब खाया : भगवान श्रीकृष्ण बहुत खाते थे, कहते हैं नन्द बाबा के असंख्य गायें थीं फिर भी श्रीकृष्ण का कार्य उनसे नहीं चलता था, वे चोर कर और लूट कर भी खाते थे। खाने के बीच में मर्यादा नही लायें – डांट भी खाई, दण्डित भी हुए, फिर भी खाया जबकि आज हम खाने के मामले में कितने संकुचित होते जा रहे हैं। दूध से बालकों को दूर रखा जा रहा है, घी की तो बारी ही नहीं आती, मक्खन क्या है इसकी तो वे परिभाषा भी नहीं जानते। यदि हम खूब खायेंगे तो खूब पचायेंगे और स्वस्थ भी रहेंगे।

खूब नाचे : कहते है, नृत्य सबसे कठिन व्यायाम है। यदि कोई व्यक्ति एक घण्टा नाच ले तब उसे किसी प्रकार के अन्य व्यायाम की आवश्यकता नहीं रह जाती है। भगवान कृष्ण खूब नाचते थे, कहीं ग्वालों के साथ नाचते, कहीं गायों के साथ नाचते, कहीं मोरों के साथ नाचते, कहीं अकेले मुरली के साथ नाचते तो कहीं गोपियों के साथ। एक-दो गोपियों से मन नहीं भरता तब अनेक गोपियों के साथ महारास करते, लगता है उनका शरीर और मन दोनों नाचते थे तब ही सदैव ऊर्जावान रहकर हंसते मुस्कराते रहते थे। आज कितने बालक-युवा नृत्य कर रहे हैं या नृत्य को अच्छा मान रहे हैं। यदि हम अपने मन को नचाने लगें तब तनाव कहाँ भाग जायेगा, ढूँढ़ना पड़ेगा।

खूब खेले : आजकल बालक खेल से दूर होते जा रहे हैं। भौतिकवादी कैरियरिज्म की दौड़ ने अभिभावकों को यह सिखा दिया है कि खेल पढ़ाई में बाधक है। और तो और विद्यालय भी खेल को न्याय नहीं दे पा रहे हैं। केवल शुष्क पढ़ाई ही करा रहे हैं, वे भूल गए हैं ‘पहला सुख निरोगी काया’ है। उनसे कोई पूँछे यदि विद्यार्थी नहीं खेलेंगे तब क्या बड़े लोग खेलेंगे, क्या अध्यापक खेलेंगे, वकील खेलेंगे, डॉक्टर खेलेंगे, पोस्टमास्टर खेलेंगे, क्या क्लर्क खेलेंगे या माता-पिता खेलेंगे? सोचें विद्यालय में खेल के मैदान होते ही क्यों हैं?

खेल से दूरी के कारण हमारे युवाओं की प्रतिरोधक क्षमता समाप्त हो गयी है। अनेक गुण जैसे – साहस, दलीय भावना, परस्पर सहयोग, परिश्रमशीलता, एकाग्रचित्तता, लक्ष्य बोध आदि से वे दूर होते जा रहे हैं। आज थोड़ी भी उनके अनुकूल बात नहीं होती गले में फन्दा डालने का प्रयास करते हैं। शरीर दुर्बल हो रहे हैं, झल्लाहट बढ़ रही है, ऐसे में कान्हा को अपना आदर्श मानें और खेल को जीवन का अनिवार्य अंग बनायें।

भगवान श्रीकृष्ण अपने जीवन में बहुत खेले, अपने जीवन का अधिकतम भाग खेल में बिताते थे। गायों को चुगाना उन्होनें इसीलिए चुना क्योकि इसमें खेलना बहुत सुलभ है, गायों को छोड़ दिया, वन में और खेलने लगे ग्वालों के साथ। भगवान कृष्ण ने जितने भी बड़े-बड़े कार्य किये, शत्रुओं/राक्षसों का वध खेल-खेल में किया जैसे – पूतना को मारा दूध पीते-पीते। कालिया का संहार किया गेंद खेलते हुए। वकासुर मारा खेलते हुए। यहाँ तक कि कंस को मारा कुश्ती खेलते हुए। उन्होंने सारे बड़े-बड़े कार्यों को खेल समझा, हम लोग खेल को भी बड़ा कार्य समझ रहे हैं। इसीलिए तनावों को निमन्त्रित कर रहे हैं।

खूब गाया : भगवान श्रीकृष्ण ने खूब गाया। विश्व का सबसे महान ग्रन्थ जिसका सर्वाधिक भाषाओं में अनुवाद हुआ है ऐसा 18 अध्याय का गीत, वे गा गए जो आज तक हमें कर्म की प्रेरणा दे रहा है। आज गाने को किस दृष्टि से देखा जाता है? हम देख रहे हैं जो व्यक्ति गा सकता है वही प्रभावशाली एवं लोकप्रिय व्यक्तित्व का स्वामी हो सकता है। गाने से शुष्कता समाप्त होती है, जीवन रसयुक्त बनता है।

तो आइये श्रीकृष्ण जन्म महोत्सव के अवसर पर उनकी विशेषताओं को व्यवहार में लाने का प्रयत्न करें। युवाओं को इस ओर प्रेरित करें ताकि जीवन उन्हें बोझ न लगे और वे रसमय, आनन्दमय जीवनयापन करें।

(लेखक श्रीजी बाबा स.वि.मं.मथुरा में प्राचार्य है।)

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