आपका बच्चा खेलता कब है?


–  अरविंद कुमार

“पढ़ोगे लिखोगे, बनोगे नवाब । खेलोगे कूदोगे, बनोगे खराब ।।” कहावत आपने जरूर सुनी होगी । इस कहावत का सीधा-सा मतलब यह है कि बालक को पूरा समय खेलकूद में ही नहीं बिताना चाहिए अपितु अपने समय का सदुपयोग विद्या प्राप्ति में भी करना चाहिए । आजकल अधिकतर माता-पिता और विशेषकर माताएँ बालक के ऊपर खेल-कूद को छोड़कर केवल पढ़ने का दबाव बनाते नजर आते हैं । कई समझदार अभिभावक और अध्यापक  भी हैं जो खेलकूद के महत्त्व को समझते हैं, और विद्यार्थी को खेलकूद के लिए प्रोत्साहित करते हैं, किन्तु फिर भी ऐसे लोगों की संख्या चिंताजनक रूप से कम है । बालक पर केवल पढ़ते रहने का दबाव बनाने से कुछ नहीं होगा । उसके मन मस्तिष्क को तरोताजा करने के लिए खेलकूद बहुत ही जरूरी चीज है । क्या असल में खेलना कूदना हमें खराब बना देता है? इस पर एक जोरदार बहस की आवश्यकता है ।

यह सच है कि जो विद्यार्थी अपने अध्ययन के प्रति लापरवाही करके, अपना सारा समय और ऊर्जा केवल खेल-कूद में ही खर्च कर देता है, वह अनेक प्रकार से पिछड़ जाता है । लेकिन यह भी उतना ही सच है कि जो विद्यार्थी खेलकूद से बिल्कुल किनारा करके, केवल एक किताबी कीड़ा बन जाता है वह न केवल एक स्वाभाविक स्वस्थ जीवन से दूर हो जाता है, बल्कि उसका शारीरिक, मानसिक, और सामाजिक विकास भी रुक जाता है, तथा वह अनेक प्रकार से दुर्बलता, विषाद और रोगों से घिरा रहकर समय से पहले बुढ़ापे को आमंत्रित करता है ।

हम रोज देखते हैं कि छोटे छोटे बच्चों के बाल सफ़ेद हो रहे हैं, गिर रहे हैं, छोटी सी आयु में ही चश्में चढ़ रहे हैं, छोटी आयु के बालकों को हृदयरोग हो जाता है । यह सब खतरे की घंटी नहीं तो और क्या है? स्मरण रखिए आँखें दिमाग का ही बाहरी हिस्सा हैं, आँखें कमजोर होने का सीधा मतलब है कि बालक का

मस्तिष्क दुर्बल है । ऐसे बालक को याद रखने व समझने में समस्या होती है । वह चिंताग्रस्त भी जल्दी होता है, तथा निराशा व हीन भावना का शिकार भी जल्दी हो जाता है । ऐसे में हम दवाइयों की राह पकड़ते हैं, जबकि इसका केवल एक ही समाधान है – व्यायाम, खेलकूद, योग, जो हमारे शरीर को बल देता है, रक्त को शुद्ध करता है, रक्त संचार को सुचारु रखता है, नस-नाड़ियों को दुरुस्त रखता है, प्राण वायु को बढ़ाता है, स्मरण शक्ति में वृद्धि करता है, रोगरोधी क्षमता को बढ़ाता है, और हमारे शरीर को एक अभेद्य किले का रूप दे देता है ।

एक शोध के अनुसार यदि आप मिट्टी, रेत और घास के स्पर्श से दूर रहते हैं तो आपकी आयु तेजी से घटती है, क्योंकि ये प्रकृति के रूप हैं और हम इनसे भी ऊर्जा प्राप्त करते हैं । पशुपक्षी भी मिट्टी से स्नान करते हैं जो उन्हें अनेक पोषक तत्त्व त्वचा के माध्यम से प्रदान करता है । आयुर्वेद में तो गीली मिट्टी के लेप से अनेक रोगों को दूर करने कि चिकित्सा पद्धतियाँ भी वर्णित हैं, जो आजकल प्राकृतिक चिकित्सा में प्रयोग किया जा रही हैं । अतः इस विचार को तो मन से ही निकाल दें कि मिट्टी में खेलने में कोई खराबी है, हाँ, मिट्टी शुद्ध अवश्य हो । छोटे बच्चों को भी मिट्टी से खेलने 

दिया जाए, जो उनके लिए बिल्कुल सहज व प्राकृतिक है ।

बहुत लोगों की शिकायत होती है कि बच्चा मिट्टी खाता है, तो यह केल्शियम कमी को दिखाता है, यदि आप बच्चे को केल्शियम युक्त दवा या खाद्य पदार्थ खिलाएँ तो बच्चा मिट्टी नहीं खाएगा । इसके अलावा उसकी त्वचा मिट्टी से पोषण प्राप्त करके निखरेगी ।

इसके अतिरिक्त खेलकूद और व्यायाम हमारे पाचन यानि हाज़मे के लिए

भी बहुत जरूरी हैं । केवल शुद्ध और पौष्टिक भोजन निगल लेने से हमें सम्पूर्ण लाभ नहीं हो सकता, इस आहार का ठीक से पचना, रस, रक्त, मज्जा, वीर्य आदि धातुओं में बदलना भी अति आवश्यक है ।

हम खेल से बहुत कुछ सीखते हैं जो केवल किताबें पढ़कर कभी नहीं सीख सकते । जीवन में लाभ और हानि का सामना प्रत्येक व्यक्ति

को करना पड़ता है, दैनिक खेल हमें हार और जीत को समान रूप से ग्रहण करने की योग्यता देते हैं, तथा हमें सामाजिक भी बनाते हैं । आज जो समाज में व्यक्ति अकेला हो गया है, व्यक्ति से व्यक्ति का जुड़ाव ढीला हो गया है, और सारा समाज एक निराशा से ग्रसित जान पड़ता है उसका सबसे बड़ा कारण यह है कि पिछले कुछ समय से बालकों का गलियों में खेलना, साथ में तालाबों में नहाना, मिलकर खाना-पीना छूट गया हैं ।

जो बच्चा किताबी कीड़ा बन जाता है, वह शीघ्र ही शारीरिक रूप से कमजोर होकर, मानसिक दुर्बलता और तनाव का शिकार हो जाता है । परीक्षा में अपेक्षित परिणाम न मिलने पर केवल वही विद्यार्थी तनावग्रस्त होता है, और कई बार आत्महत्या तक कर लेता है जो केवल किताबी कीड़ा होता है, लेकिन पढ़ने के साथ-साथ कुछ समय खेलकूद और व्यायाम में बिताने वाला विद्यार्थी अपने भविष्य के लिए आशावान और दृढ़ संकल्पी होता है, उसकी ऊर्जा कम नहीं होती, उसे तनाव घेर नहीं सकता और वह सकारात्मक विचारों से ही ओतप्रोत रहता है ।

 

कई बार ऐसा देखा जाता है कि माता-पिता और अध्यापक भी परीक्षाएँ पास आ जाने पर विद्यार्थी पर खेलकूद छोड़कर केवल पढ़ाई पर ध्यान देने के लिए दबाव बनाते हैं । यह भी उचित नहीं । सत्य है कि उस समय पढ़ाई पर ध्यान केन्द्रित करना होता है, किन्तु शारीरिक स्वास्थ्य और मानसिक संतुलन बनाए रखना भी उतना ही आवश्यक होता है । परीक्षाओं के दौर में भी थोड़ा सा समय खेलकूद में बिताया ही जाना चाहिए, प्रातः यदि हल्की दौड़ लगा ली जाए तो यह पूरा दिन आपको चुस्त रखेगी, ऑक्सीजन की कमी को दूर कर आलस्य को दूर करेगी तथा मस्तिष्क को ऊर्जावान बनाकर स्मरण शक्ति को बल प्रदान करेगी ।

एक बार स्वामी विवेकानंद के पास कोई दुबला पतला व्यक्ति उपनिषद पढ़ने के लिए गया तो स्वामी जी ने उससे कहा कि पहले फुटबाल खेलो, दौड़ लगाओ, खूब खाओ-पीओ, अपने शरीर व मन को बलिष्ठ बनाओ, फिर ज्ञान की खोज करना । हमारे वेद और उपनिषद तो पुकारकर कहते हैं – नायमात्मा दुर्बलेन लभ्यः ।। यानि जो व्यक्ति मानसिक व शारीरिक रूप से दुर्बल है, वह कैसे सत्य का दर्शन करेगा, कैसे ज्ञान को पा लेगा, कैसे अपनी आत्मा को उपलब्ध हो सकेगा?

महात्मा गांधी ने भी कहा है कि संसार में एक ही पाप है – दुर्बलता ।

आवश्यक नहीं है कि आप खेलकूद को केवल इसलिए अपनाएँ कि आपको इससे अपना करियर बनाना है । हर कोई खिलाड़ी नहीं बनता, हर कोई मेडल नहीं जीतता, हर कोई ओलिम्पिक में नहीं जा सकता, लेकिन हर किसी को स्वस्थ तो रहना ही चाहिए । हम प्रकृति के जितना ही निकट जाना चाहेंगे, उतना ही शारीरिक व्यायाम, खेलकूद व योग के निकट जाने की आवश्यकता अनुभव करेंगे । केवल और केवल पढ़ाई पर ध्यान लगाकर हम अपनी रोजी रोटी कमाने लायक तो बन सकते हैं, लेकिन जीवन को जीने लायक बनाने की शक्ति केवल शारीरिक व्यायाम और खेलकूद में ही है । जैसे प्रतिदिन भोजन, अध्ययन, विश्राम के लिए समय निश्चित करते हैं, बस थोड़ा सा समय प्रतिदिन खेलकूद के लिए भी निकाल कर देखिए । खेल हमारे जीवन को जीने के योग्य बनाते हैं ।

किसी विद्वान ने क्या खूब कहा है : चींटी दिनरात केवल काम करती है और उदासी भरा जीवन जीती है । गिलहरी काम भी करती है और खेलती भी है और एक सुंदर व प्रसन्न जीवन जीती है ।

निर्णय आपको करना है कि चींटी बनें या गिलहरी?

(लेखक विभिन्न भाषाओं के तज्ञ एवं सामाजिक कार्यकर्ता है)

 

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