स्वतंत्रता आन्दोलन का जयघोष मंत्र वंदेमातरम्

-रवि कुमार

स्वतंत्रता अमूल्य है और यह हमें अनथक प्रयासों के कारण मिली है। हमारी स्वतंत्रता के लिए हमारे पूर्वजों ने अपने जीवन का बलिदान दिया है। पूरे-पूरे परिवार इस ईश्वरीय कार्य में लग गए, ऐसे असंख्य उदाहरण है। स्वतंत्रता के लिए बहुमुखी प्रयास अपने भारत देश में हुआ। ऐसा ही एक प्रयास जिसने देश के युवाओं व क्रांतिकारियों में नए जोश व उत्साह का संचार हुआ। वो प्रयास है – वंदेमातरम् की रचना। मातृभू की अर्चना के लिए एक काव्य गीत बना जो स्वतंत्रता सेनानियों के जयघोष मंत्र बन गया। आइए जानते है इस काव्य गीत वन्देमातरम के बारे में….

1838 में बंगाल में जन्में बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय एक देशभक्त कवि हुए। स्वतंत्रता संग्राम में जिन साहित्यकारों ने जनजागरण में अपना सहयोग दिया, उनमें बंकिम चन्द्र का नाम प्रथम पंक्ति में लिया जाता है। 7 नवम्बर 1875 (कार्तिक शुक्ल नवमी / अक्षया नवमी – जगधात्री पूजा दिवस) को उन्होंने वन्देमातरम काव्य गीत की रचना की। परंतु उस समय यह काव्य गीत सभी के सामने नहीं आया। कुछ लोगों ने इस काव्य गीत को प्रकाशित करने के लिए बंकिम चंद्र से विशेष आग्रह किया। परंतु लोगों के आग्रह पर उन्होंने प्रकाशित नहीं किया। 1880 में क्रांतिकारी वासुदेव बलवंत फडके की आत्मकथा का भाषा रूपांतरण व प्रकाशन बंगला भाषा में हुआ। इस आत्मकथा का बंकिम चन्द्र के मानस पटल पर विशेष प्रभाव पड़ा। बंगाल व बिहार में (1762-1774) राष्ट्र रक्षा हेतु संन्यासी विद्रोह हुआ था। इस संन्यासी विद्रोह के घटनाक्रम का लेखन ‘आनन्द मठ’ नाम के ग्रन्थ में बंकिमचंद्र की लेखनी ने किया। डॉ० बिमनबिहारी मजुमदार कहते है – “It is just possible that the fight described by Vasudev Balwant (against the British) might have given inspiration for writing Anand math.”

आनन्द मठ ग्रन्थ ‘बंग दर्शन’ नाम की पत्रिका में 1880 से 1882 के मध्य कड़ी के रूप में प्रकाशित हुआ। यह ग्रन्थ एक पुस्तक के रूप में 1883 में प्रकाशित होकर समाज के सामने आया। इस आनन्द मठ पुस्तक में वंदेमातरम् काव्य गीत को जोड़ा गया। इस पुस्तक में प्रकाशन के कारण वंदेमातरम् सभी देशवासियों के सामने आया।

प्रसिद्ध लेखक हेमचंद्र कानूनगो ने कहा था – “तब हम इस बात को समझ नहीं पाए थे कि वन्देमातरम गीत में इतनी शक्ति और भाव छिपा है।” श्री अरविंद ने कलकत्ता से प्रकाशित ‘वंदेमातरम्’ नाम के अंग्रेजी दैनिक समाचार पत्र में (1906) वंदेमातरम् को मंत्र कहा। इस विषय में लिखा – “The mantra had been given and not in a single day, a whole people had been converted to the religion of patriotism.” “सम्पूर्ण देशवासियों का धर्म देशभक्ति हो गया था। यह मंत्र भारत में ही नहीं सारे विश्व में फैल गया था।” वे इस समाचार पत्र के सम्पादक थे।

1896 के कांग्रेस अधिवेशन में रवींद्रनाथ ठाकुर ने इस गीत को अपने कंठ से सर्वप्रथम गाया। 1905 में अंग्रेजों ने बंगाल का विभाजन किया। यह निर्णय अंग्रेजों के द्वारा 17 जुलाई में लिया गया जोकि 16 अगस्त 1905 से लागू होना था। यह विभाजन करने का उद्देश्य बंगाल में स्वतंत्रता आंदोलन के लिए तेजी से चल रही गतिविधियों को धीमा करना था। परंतु अंग्रेजों को क्या पता था कि उनका यह कार्य स्वतंत्रता आंदोलन में ज्वार लाएगा।

vande-mataram

कलकत्ता के टाउन हॉल में 7 अगस्त 1905 को बंग भंग के इस निर्णय के विरुद्ध हजारों लोग एकत्र हुए और सभी के कंठ बोल रहे थे वंदेमातरम्। बंग-भंग आंदोलन से वंदेमातरम् जन-जन का जयघोष बन गया। और यह जयघोष केवल बंगाल ही नहीं भारत व भारत से बाहर सभी के लिए जयघोष मंत्र बना। स्वतंत्रता आंदोलन की प्रत्येक छोटी बड़ी सभा में वन्देमातरम गीत व जयघोष के रूप में गूंजता था। क्रांतिकारियों का आपसी अभिवादन वंदेमातरम् से होने लगा। स्वतंत्रता के प्रयास का प्रायः बन गया वन्देमातरम।

बंग-भंग आंदोलन के समय श्री सुरेन्द्रनाथ बनर्जी के मुख से वाक्य निकला – “Your inner most feeling should be in perfect harmony with the Raga and Bhav of VandeMatram.”

1907 में नेशनल कॉलेज कलकत्ता के छात्र सुशील सेन ने पुलिस सार्जेंट ह्यू को एक घूसा जड़ देने पर अत्याचारी न्यायधीश किंग्सफोर्ड ने पंद्रह बेंत मारने की सजा दी। अगले दिन स्टेटमेन समाचार पत्र ने लिखा – “Every stock of whip was resounded with a cry of VandeMatram.” (प्रत्येक बेंत की मार पर वंदेमातरम् की गूंज प्रतिध्वनित होती थी।)

इस पर काली प्रसन्न कवि ने लिखा –

बेंत मेरे कि मां भुलाबि, आमरा कि माएर सेई छेले।

मोदेर जीवन जाय जेन चले, वंदेमातरम् बले।”

(बेंत मारकर क्या मां को भुलायेगा, हम क्या मां की ऐसी संतान है? वंदेमातरम् बोलते हुए हमारा जीवन भले ही चला जायें।)

अंग्रेज वंदेमातरम् से इतने क्रोधित थे कि उन्होंने इस गीत व जयघोष पर प्रतिबंध लगा दिया था। इस प्रतिबंध के बावजूद वंदेमातरम् का गायन रुका नहीं बल्कि और अधिक तीव्र गति से बढ़ने लगा। सर्वसामान्य तक यह मंत्र पहुंचे तो अलग-अलग भारतीय भाषाओं में इस गीत का प्रकाशन होने लगा। लाला लाजपतराय ने वंदेमातरम् के नाम से पत्रिका का प्रकाशन प्रारम्भ किया। बंग-भंग आंदोलन से निकले स्वदेशी आंदोलन ने पूरे देश में व्यापक रूप ले लिया। आंध्र प्रदेश में इस आंदोलन का नाम ‘वंदेमातरम् आंदोलन’ ही कर दिया गया। विद्यालयों-महाविद्यालयों में वंदेमातरम् गीत व जयघोष का नाद होने लगा। चूंकि इस पर अंग्रेजों ने प्रतिबंध लगा रखा था तो ऐसा करने पर विद्यार्थियों को दंड मिलता था। केशव बलिराम हेडगेवार के नेतृत्व में नागपुर के नील सिटी हाई स्कूल में इंस्पेक्टर के आने पर छात्रों ने वंदेमातरम् का जयघोष प्रत्येक कक्षा में किया। जिसके कारण बालक केशव को विद्यालय से निकल दिया गया। भारतीय स्वतंत्रता आन्दोलन की अनेक घटनाएँ इस जयघोष मंत्र के साथ जुड़ी हुई हैं।

स्वतंत्र भारत में वंदेमातरम् (प्रथम दो चरण) को राष्ट्रीय गीत के रूप में अंगीकृत किया गया है। आज भी इस गीत को सम्पूर्ण गाते है तो उन हुतात्माओं का स्मरण हो आता हैं जिन्होंने स्वतंत्रता आन्दोलन के महायज्ञ में अपने प्राणों की आहुति दी। यह गीत भाव रूप में उन सभी घटनाओं को समेटे हुए हैं जो वंदेमातरम् जयघोष के साथ घटित हुई। यह केवल गीत नहीं राष्ट्रभक्ति का जयघोष मंत्र है।

(लेखक विद्या भारती हरियाणा प्रान्त के संगठन मंत्री है और विद्या भारती प्रचार विभाग की केन्द्रीय टोली के सदस्य है।)

और पढ़े : भारतीय स्वतंत्रता आन्दोलन में मील का पत्थर सिद्ध हुआ बंग-भंग आंदोलन

सन्दर्भ

बंग-भंग विरोधी आन्दोलन – प्रो. सीताराम व्यास, विश्व संवाद केंद्र हरियाणा, 2005

Vande Mataram – Amarendra Laxman Gadgil, Vande Mataram Centenary Special Publication, April 1978

Vande mAtaram (information) – sanskritdocuments.org, 11 September 2017

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