बच्चों को अवसर देकर तो देखिये

 – राजेन्द्र बघेल

आठवीं में पढ़ने वाली नम्रता कक्षा में एक दुबली पतली छात्रा थी। स्वभाव से बस संकोची भी थी। अतः मुश्किल से कोई उत्तर देती या बात करती।

यद्यपि उसके अंग्रेजी विषय के अध्यापक ने कक्षा के सभी विद्यार्थियों को यह संदेश दे रखा था कि उनके पढ़ाते समय सभी विद्यार्थी उनकी बात ध्यान से सुनें, समझें और कोई प्रश्न पूछना चाहें तो पाठ पूरा होने पर पूछें; साथ ही प्रश्न पूछे जानें पर उसका उत्तर दें।

हाँ! यदि सोचने पर भी उत्तर न दे सकें तो अपनी बारी आने पर बोलें अवश्य। न हो सके तो यही कहें, “I don’t know sir”. अध्यापक के इस संदेश के बाद कई दिन बीत गए थे। एक दिन प्रश्न पूछने पर उत्तर देने की बारी नम्रता की आई तो बड़े जोश में उसने कहा, “Yes sir, I know the answer”. अध्यापक ने तुरन्त कहा, “Yes Namrata, very good, you give answer”. नम्रता का उत्तर उस दिन पूर्ण शुद्ध नहीं था। फिर भी उसके साहस को देखकर अध्यापक ने उसे अवसर दिया और उत्तर पूर्ण व शुद्ध करने के लिए प्रयत्न करने को कहा।

उस प्रसंग को बीते आठ वर्ष हो चुके थे। अब नम्रता M.S.C. प्रथम वर्ष की छात्रा थी। उसी मोहल्ले में किराये पर घर लेकर रहने आए वही अध्यापक महोदय नम्रता के घर मिलने गये। अपने माता-पिता के साथ उसने अपने गुरु जी का स्वागत किया और जलपान कराया। जलपान पूर्ण होने पर नम्रता ने अपने गुरूजी को आठ वर्ष पूर्व के उस प्रसंग को याद दिलाया, जो उस दिन कक्षा में घटित हुआ था। उसने कहा, “गुरू जी याद है आप मेरी कक्षा में अंग्रेजी पढ़ाते थे और अपने सभी विद्यार्थियों को ध्यान पूर्वक पाठ की सभी बातें सुनने व समझने के साथ प्रश्न पूछे जाने पर उत्तर देने का संदेश दिया था और यह भी कहा था कि यदि उत्तर न दे सको तो यही कहो, “I don’t know the answer”. आपके प्रश्न पूछने पर उत्तर न दे पाने की स्थिति में मैंने सोचा कि कब तक आपको, “I don’t know, I don’t know.”  कहती रहूंगी। एक हिम्मत करके मैंने कहा, “I know the answer”.  मेरा उत्तर उस दिन पूरा ठीक नहीं था फिर भी आपने मुझे अधूरे उत्तर पर भी ढांढ़स बंधाया और पूरा व शुद्ध उत्तर देने का अवसर दिया। वह क्षण मेरे जीवन का turning point बना जिससे मेरे अध्ययन में आगे बढ़ने की दिशा मिली। आज भी मैं कक्षा में अपना पाठ ठीक से सुनती व समझती तथा ठीक उत्तर देने का प्रयास करती हूँ। चलते-चलते नम्रता ने बताया कि आज वह अपनी क्लास की प्रथम पांच छात्राओं में परफॉर्म कर रही है।

अध्यापक महोदय के जीवन में भी यह एक अनमोल अवसर आया और वह यह अनुभव कर सके कि जाने किस क्षण, कब उनके एक संदेश या प्रोत्साहन से विद्यार्थी के जीवन की दिशा बदल सकती है। बस एक अवसर देने या प्रोत्साहित करने में क्या जाता है ? अब चाहे विद्यालय में अध्यापक हो या घर के माता-पिता या अन्य अभिभावक, सभी अपने बच्चों को एक अवसर देकर तो देखे। आपके बच्चे में कौन-कौन सी क्षमताएं छिपी हैं और वह क्या-क्या कर सकता है ज्ञात हो जाएगा।

अवसर देने की बात चली तो एक समाचार पत्र में छपे एक विवरण (बच्चों के लिए निर्धारित पन्नों पर) का उल्लेख कर इस विषय को और स्पष्ट करना चाहूंगा। अर्पण विद्यालय से घर आता है और घर पहुंचते ही अपनी माँ से कहता है, “अरे माँ मेरी एक बात सुनो”। माँ इस ओर अनसुना कर कहती है- अरे बेटा अभी कोई बात नहीं। स्कूल बैग ठीक से रखो, कपड़े बदल कर हाथ-पैर-मुँह धोकर खाना खा लो और अभी थोड़ा सो जाओ। सोकर उठते ही फिर वही बात अर्पण ने दोहराई, “अरे माँ मेरी बात तो सुनो”। माँ कहती है- बेटा अभी तुम्हारे पिताजी ऑफिस से आने वाले हैं। उनकी चाय बनानी है और हाँ, तुम भी नाश्ता करके खेल कर आना। फिर होमवर्क भी तो पूरा करना है। अब भी माँ ने अर्पण की बात नहीं सुनी। रात को वह सो जाता है, सुबह उठकर स्कूल जाने की तैयारी करते करते फिर माँ से, “अरे माँ स्कूल से आते समय रमेश… । माँ! बस-बस रमेश से तुम्हारा झगड़ा हुआ न। यह करने की क्या जरूरत थी। अपने पढ़ने-लिखने में ध्यान दो और स्कूल बस आने का समय हो गया है – स्कूल जाओ। स्कूल बस पर बैठते-बैठते अर्पण कहता है – अरे माँ वो मेरी बात तो…। जाने माँ को अपने अर्पण की बात सुनने का अवसर कब आएगा भी या नहीं।

किसी विद्वान ने ठीक ही कहा है, “आपका पाल्य जो कह रहा है उसे अवश्य सुनिये अन्यथा आज आप उसकी छोटी बात नहीं सुनेंगे तो भविष्य में वह आपको बड़ी जरूरी बात भी नहीं बतायेगा”। “Listen to anything your children want to tell you.If you don’t listen to the small stuff now,they would not tell you the big stuff.”

सोचिए ऐसे प्रसंग हमें अपने घरों में सुनने को मिलते हैं न। वास्तव में हम अभिभावकों को अपनी बात सुनाने की इतनी जल्दी पड़ी रहती है कि अपने बच्चों को प्रायः अनसुना कर देते हैं। बच्चे अपने जीवन की अहम बात कहने का अवसर नहीं पाते जिससे शायद वह अपने भविष्य की राह बना सकते थे। इस बात से जुड़ा एक और प्रसंग कहना चाहता हूँ जो सम्भवतः इस तथ्य को और स्पष्ट कर सकेगा।

आठ वर्ष की अद्विता अपने दादा जी के साथ बालकनी में रखे पौधों की साज-सँवार करने में मदद कर रही थी। उतने में वह एक पौधे के साथ एक सपोर्टर (पौधे को सीधा खड़ा रहने के लिए कोई साधन) लगाने की बात कहती है। दादा जी ने अद्विता को समझते हुए कहा कि सपोर्टर तो उस पौधे के साथ जरूरी है जो अपने आप खड़े नहीं रह पाते; यह तो अपने आप गमले में खड़ा है। अद्विता फिर भी दादा जी से पौधे में सपोर्टर लगाने की बात दुहराती है; दादा जी भी अपनी बात दुहराते हुए मना कर देते हैं। अब तीसरी बार जोर देकर अद्विता कहती है, “अरे आप मेरी बात तो सुनिये”। अब दादा जी थोड़ा रुककर उससे पूछने लगे, “अच्छा बताओ सपोर्टर लगाने का क्या फायदा है”? अद्विता की पहल सुनकर उसका मतलब जो समझ में आया हम सबको चकित कर देगा। वह कहती है, “मैं चाहती हूँ कि पौधे के साथ लकड़ी का एक सपोर्टर लगाकर पौधे की ऊंचाई के बराबर लकड़ी में एक स्लिप लगाकर उस पर आज की तारीख लिखूँ और एक महीने के बाद देखूँ कि वह पौधा अब कितना बढ़ गया है? लम्बी साँस लेते हुए दादा जी बोले- ओह! तो यह बात है।

वास्तव में हुआ यह कि अद्विता की EVS की क्लास की अध्यापिका ने कल ही “पौधे भी वृद्धि करते हैं” वाला पाठ पढ़ाया था और यह भी कहा था कि उसका प्रयोग अपने घर की फुलवारी में करके देखो। साथ ही इस बात का observation करते हुए एक चार्ट बनाकर उसमें लिखो कि समय-समय पर पौधा कितना बढ़ा? मनुष्य की भांति पौधे भी वृद्धि करते हैं। अब सोचिए वनस्पति विज्ञान के इस पाठ का मूल समझने में अद्विता की सहायता के बजाए दादा जी अपनी ही बात पर अड़े रहकर क्या उसका हित कर पाते? इसका अन्दाजा हम सबको लगाना ही पड़ेगा।

आज जो पाठ या नई जानकारी बच्चे को दी है उसे सुन-समझकर वह उसमें बहुत कुछ और आगे की जानकारी जोड़ना चाहता है; उसे हमें समझकर उसे आगे बढ़ने का अवसर देना होगा।

अब जरा कक्षा चार में पढ़ने वाले अभिनव की बात सुनिये। स्कूल में आज उसने हिंदी की बेला में क्रिया (verb) शब्द की जानकारी की है और घर आकर अपनी माँ के साथ इस पाठ का होमवर्क और कुछ नई बातें पूरी करना चाहता है।  माँ ने जब अभिनव से क्रिया शब्द के बारे में वह क्या जनता है – पूछा तो बड़े चाव से उसने उसकी जानकारी दी। माँ ने उसे प्रोत्साहित करते हुए क्रिया शब्द से जुड़े एक खेल खेलने की बात कही तो अभिनव बहुत खुश हुआ और माँ से कहा, “माँ तुम कोई वाक्य बोलो, मैं उसमें से क्रिया शब्द निकालकर बताऊंगा और फिर उसे क्रियान्वित (act) करके दिखाऊँगा। उस समय वहाँ अभिनव की दादी और बुआ भी बैठी थीं; उन्होंने भी खेल में हिस्सा लिया और सभी आनंदित हुए। अवसर देने और प्रोत्साहित कर बच्चों को आगे बढ़ाने की क्या-क्या उपलब्धियां होती है इस लेख से स्पष्ट होती हैं।

अंत में हम यह कहना चाहेंगे कि सीखने का अवसर देते समय हम यह अवश्य ध्यान रखें:

  • बच्चा जितना जनता है उससे आगे उसे प्रोत्साहित कर आगे बढ़ने का अवसर दीजिए।
  • बच्चा जिस बात/काम में रूचि रखता है उसमें उसे रोकिए नहीं बस उसे करने दीजिए। प्रतीक्षा करिए; अच्छा परिणाम मिलेगा।
  • जो किया उससे भी बहतर क्या-क्या हो सकता है; उस पर सकारात्मक बात करिए।
  • हो सकता है आज उसकी गति कम हो पर ऐसे समस्या ग्रस्त बच्चों का आकलन कर तद्नुरूप उसे कार्य सौंपिये।
  • उसकी राय लेकर उसे जो भी नया करने का अवसर देंगे; वह ज्यादा अच्छा परिणाम देगा।
  • अच्छा perform न कर पाने पर यह आकलन करना कि गलती कहाँ हुई और फिर अवसर देना।
  • अपनी बात ऊपर रखकर जल्दी न करें यह अलाभकारी होगा।
  • विश्वास रखिये आज आप बच्चे को अवसर देंगे कल वह बड़ी चुनौतियों का सामना करेगा।
  • अल्बर्ट आइन्स्टीन का यह कथन बड़ा उपयुक्त है- “प्रत्येक स्वयं में सक्षम और बुद्धिमान है पर मछली से कहा जाए कि वह पेड़ पर चढ़कर दिखाए तो क्या यह समझदारी होगी? “Everybody is genius, but if you judge a fish by its ability to climb a tree it will live its whole life that is stupid.”

(लेखक शिक्षाविद है और विद्या भारती विद्वत परिषद के अखिल भारतीय संयोजक है।)

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