घर-घर तिरंगा – हर घर तिरंगा

– गोपाल महेश्वरी

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रोचक संयोग ही था कि भारत भूषण जी का जन्म भी पन्द्रह अगस्त 1947 को ही हुआ था और उनके पौत्री यानि बेटे की बेटी क्रांति का 10 मई 2016 को। जब से क्रांति इस घर की बेटी बनी है उसका जन्मदिन बहुत धूमधाम से मनाया जाता है। सारा परिवार मित्र, आसपास के बच्चें एकत्र होते। वैसे भी भारतभूषण जी केवल क्रांति के नहीं सारे मोहल्ले के ‘कहानी वाले दादा जी’ थे। बच्चे अपने मन के सारे प्रश्न उनसे बिना झिझक पूछ लेते थे वे प्रश्न भी जो अपने माता-पिता व शिक्षकों से भी पूछने में संकोच रहता। क्रांति के प्रत्येक जन्मदिन पर उसका जन्मोत्सव बच्चों के लिए महोत्सव ही होता था। जैसे कोई जादू‌गर किसी बक्से में एक चीज छुपाता है और दूसरी बन कर निकलती है वैसे ही बच्चे प्रश्न करते और दादा जी उनके रोचक उत्तर बना देते। उनके उत्तरों में राष्ट्रभक्ति का रंग चढ़ा होता था पर ऐसे कि बच्चों को न वह भाषण लगता न इतिहास के आँकडों का मेला, पर बातें सब भूत, भविष्य, वर्तमान को जोड़ती चलती। जैसे गत वर्ष ही एक बच्चे ने पूछा- “दादा जी! आपने क्रांति का नाम क्रांति क्यों रखा?” दादा जी मुस्कुराकर- ऐसा इसलिए बेटे! कि इसके जन्मदिन की दिनांक को ही 1857 में अमर शरीर बलिदानी मंगल पाण्डेय ने स्वतंत्रता के प्रथम संघर्ष का बिगुल फूंका था।”

जैसे बच्चे टोली बनाकर चलते है बच्चों के मन में प्रश्न भी अकेले नहीं आते। एक प्रश्न के पीछे दूसरा फिर तीसरा, चौथा। बच्चों की रेलगाड़ी की भाँति प्रश्नों की रेलगाड़ी में डिब्बे जुड़ते ही जाते हैं। दादा जी की कला यह भी कि वे उत्तर इस प्रकार देते कि यह रेलगाड़ी विषय की पटरी न उतरने पाती लेकिन निरंतर नए नए नदी, पहाड़, पुल, स्टेशन पार करती जाती। उस दिन भी तो क्रांति क्या?, संघर्ष क्या?, बलिदानी क्या होता है?, बिगुल फूंकना यानि क्या? मंगलपाण्डे कौन थे? 10 मई को ही क्रांति क्यों हुई? प्रश्नोत्तरी की ऐसी सभा जमी कि अच्छे से अच्छा टीवी धारावाहिक भी फीका पड़ जाए। मंगल पाण्डेय की सच्ची कहानी से क्रांति का पिछला जन्मदिन ‘मंगलमय’ बन चुका था।

जैसे दादा जी वैसे बच्चे। वे दादा जी का जन्मदिन भी उतने ही उत्साह से मनाते और चूंकि वह दिन 15 अगस्त का होता तो प्रात: शालाओं में तिरंगा फहराने और उत्सव मनाने के बाद सारा दिन होता बच्चों के पास अपने दादा जी का जन्मदिन मनाने के लिए। इस दिन दादा जी तैयारियों में अधिक हस्तक्षेप नहीं करते, वे बच्चों को अपनी कल्पना, सूझबूझ, कुशलता को पूर्ण स्वतंत्रता से विकसित होने का अवसर देते। हाँ, कहानी सभा के आयोजन में उन्हें सहभागी होना ही पड़ता था पर आज वे इस रेलगाड़ी के ड्रायवर नहीं गार्ड बने रहने का प्रयत्न करते। फिर भी यह बच्चों की सभा थी, इसमें कोई भी नियम अटल या अंतिम नहीं होता।

घर की छत पर इसदिन तिरंगा फहराकर राष्ट्रगान गाने से ही दादा जी का जन्मोत्सव आरंभ होता वस्तुतः बच्चों में कुछ जो बहुत छोटे थे वे तो इसे दादा जी का जन्मदिन ही मानते थे पर दादा जी और बड़े बच्चे तो जानते थे कि यह भारत की स्वतंत्रता का भी जन्मदिवस है।

इस वर्ष दादा जी की एक सूचना से बच्चे सुखद आश्चर्य में डूबे। बोले- “इस बार हम उत्सव तीन दिन मनाएँगे।” “तीन दिन?” रवि ने पूछा। “हाँ, तीन दिन।” दादा जी ने पहले प्रश्न का उत्तर दिया, मानों प्रश्नों की रेलगाड़ी के इंजन ने सीटी दे दी। “तीन दिन क्यों?” हेमा ने पूछा। उत्तर तुषार ने दे दिया- “क्योंकि हमारे प्रधानमंत्री जी ने कहा है।” दादा जी ने रोका- “प्रधान मंत्री जी ने आग्रह किया है।”

“हरवर्ष तो ऐसा नहीं होता इस वर्ष क्यों?” सबने सोचा अब दादा जी बोलेंगे पर बोल पड़ी क्रांति- “क्योंकि यह हमारी स्वतंत्रता का अमृत महोत्सव का वर्ष है।” विश्वास बोला- “अमृत महोत्सव क्या?” निधि ने जोड़ा “हमारी स्वतंत्रता? हम तो स्वतंत्र ही हैं।” दादा जी पलभर क्रांति को देखते हुए यह भाँप कर कि इसका ठीक उत्तर उसे याद नहीं होगा उसे निराश होने से बचाने के लिए बोले- “अमृत महोत्सव यानि 75 वर्ष होने का उत्सव।” “तो यह तो आपका भी अमृत महोत्सव होगा आप भी तो 75 वर्ष के हो गए हैं।” राधा चहक कर बोली। “हाँ, है तो।” दादा जी मुस्कुराए। “और मेरा?” क्रांति बालसुलभ जिज्ञासा से बोली। “तुम भी पचहत्तर की हो गई हो।” सब हँस पड़े। राशि ने छेड़ा- “तू भी बूढ़ी हो गई क्या? पचहत्तर की।” क्रांति का मुँह उतर गया, वह सोच नहीं पा रही थी कि क्या बोले। पर दादा जी किसी भी बच्चे को उदास, निराश कैसे होने देते, वे बोले- “पचहत्तर की हुई है ऐसा कहा मैंने पचहत्तर वर्ष की नहीं पर पचहत्तर महिनों की हो चली है।” उपहास करने वाले बच्चे जोड़ घटाव में लग गए। सबसे पहले बोली ज्योति- “हो इसका जन्मदिन याद है हमें 10 मई 2016 यानि पूरे पचहत्तर माह।” ज्योति का गणित एकदम ठीक था। क्रांति का मुखड़ा खिल गया है पर राशि का मुरझा गया, उसे लगा उसकी बात कट गई है।

दादा जी बच्चों से बातों के कुशल खिलाडी थे। अपने अनुभव की सारी शक्ति अब वे बच्चों के लिए ही लगाने में आनंद अनुभव करते थे। उत्साह भरे स्वर में बोले- “केवल क्रांति बिटिया का नहीं, तुम सबका भी यह जन्मदिन है, पंचहतरवाँ नहीं पर है जन्मदिन।” अब सब कोतूहल में डूबे। विजय फुसफुसाया “हमारे जन्मदिन तो अलग अलग दिनों में आते है!!” “सच कह रहे हो विजय पर तुम्हारा कहना ठीक है सबके जन्मदिन 15 अगस्त को नहीं आते। पर आप हम सब संतानें है और अपने राष्ट्र के एक अंग, हिस्से, अंश भारत के। भारत जिस धरती, जिस संस्कृति और जिन लोगों के कारण भारत है उन लोगों के रूप ही तो है हम सब एक अर्थ में हम सब भी ‘भारत’ ही हैं।” दादा जी की बात कठिन हो गई थी।

दादा जी भी समझते थे बड़े-बड़ों को भी सबको समझने में साल न लगे ऐसी बात इन बच्चों को एकदम कैसे समझ आएगी।” तुषार बोल ही पड़ा- “फिर भी हमारा जन्मदिन कैसे?” दादा जी ने सरलीकरण का एक और प्रयास किया- “देखो कोई बहुत बीमार हो या बहुत बड़ी कठिनाई में फँस जाए जिससे बचना बिल्कुल सरल न हो, और वह बच जाए तो हम कहते हैं कि इसका तो नया जन्म हो गया है। व्यक्ति पुराना है, आज नहीं जन्मा पर आज मृत्यु जैसे संकट से बच गया है इसलिए नया जन्म हुआ ऐसा मानते हैं कि नहीं ? “कुछ ने समझकर, कुछ ने आधा समझे पर बच्चों ने हाँ में सिर हिलाया। दादा जी आगे कहने लगे- “सदियों पहले मुगलों, फिर अंग्रेजों के शासन से, परतंत्रता से, गुलामी से संघर्ष करते रहने वाले हमारे देश को 15 अगस्त 1947 को नया जीवन मिला। उसी स्वतंत्रता का यह अमृतवर्ष है और हम भारतवासी भी उस स्वतंत्र भारत के अंग होने से यह हमारा भी एक प्रकार नया जन्म है, जन्मदिन है।” दादा जी को लगा अब बात कुछ समझ आई होगी। बच्चे मौन थे, ‘हेवी फाइल’ डाउनलोड होने के कुछ समय ले रहे हैं ये नन्हे कम्प्यूटर।

दादा जी ने आगे कहा- “निधि ने पूछा था यह अमृत महोत्सव क्या है?” निधि प्रसन्न हो गई, उसका प्रश्न टाला नहीं था दादा जी ने। वे बोले- “पराधीनता की प्राणघातक बीमारी”। विजय ने बीच में टोका- “प्रणघातक बीमारी?” राधा बोली- “जैसे कोरोना” दादा जी ने बात आगे बढाई “भयंकर पराधीनता से उबर कर स्वतंत्र भारत इन पचहत्तर वर्षों में गंभीर कमजोरियों से उबरकर पुन: स्वस्थ-सबल-सक्षम हो गया है। यह अब कभी वैसी गंभीर बीमारी का शिकार न हो ऐसी कामना से मनाया जाने वाला यह उत्सव है अमृत उत्सव।

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अच्छा! तो देश का, दादा जी का और हमारा भी अपने अपने प्रकार से जन्मदिन है तो तीन दिन का महोत्सव तो बनता ही है भाई। बोलो सब क्या बोलते हो?” सिद्धांत जो उन सबमें बड़ा था उत्साह से बोला। बच्चों की हर्षध्वनि से वातावरण गूंज उठा। दादा जी को यह रेल ठीक स्टेशन पर खडी करनी थी। अत: बोले- “देश का और आपका, दादा जी का नहीं इन दोनों में दादा जी तो अपने आप ही आ गए।” अच्छा, हमारे सबके लिए अपने देश का यह महान पर्व है तो इस बार घर घर तिरंगा लहराना होगा न? वह भी एक नहीं तीन दिन। लहराएँगे न?” “हाँ, हाँ, अवश्य लहराएँगे” बच्चों ने एक साथ एक स्वर में कहा। “पर झण्डा कहाँ से लाएँगे?” निशा बोली। “झण्डे दादा जी ले आए हैं ये देखो” दादा जी ने एक बड़े से पैकिट में से तिरंगे निकाले, प्रत्येक बच्चे को दिए, सबने उसे सम्मान पूर्वक सिर लगाया।

13 अग‌स्त 2022, जहाँ तक दृष्टि जाती घर घर तिरंगा गर्व से लहरा रहा था।

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(लेखक इंदौर से प्रकाशित ‘देवपुत्र’ बाल मासिक पत्रिका के कार्यकारी संपादक है।)

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