सा विद्या या विमुक्तये
– नम्रता दत्त
शिशु की स्वाभाविक विशेषताएं
एक वर्ष से भी कुछ अधिक समय से हम निरन्तर शिशु शिक्षा का अध्ययन कर रहे हैं। शिशु शिक्षा गर्भावस्था से भी पूर्व प्रारम्भ होती है, कैसे? इसका अध्ययन करते करते हमने गर्भावस्था के नौ मास का भी अध्ययन किया और जन्म से एक वर्ष के शिशु की शिक्षा के विषय में भी अध्ययन किया है।
इस श्रृंखला में हम शिशु की एक वर्ष से लेकर तीन वर्ष की विभिन्न अवस्थाओं का अध्ययन करेंगे। यह विभिन्न अवस्थायें शिशु शिक्षा में किस प्रकार सहायक होती हैं, इस पर भी हम ध्यान देंगे और स्व-चिंतन के आधार पर उन्हें स्वीकार एवं धारण भी करेंगे।
इस श्रृंखला के प्रथम सोपान में एक से तीन वर्ष के शिशु की स्वाभाविक विशेषताओं पर बात करेंगे। सम्भवतः सोपानों के नाम पहले जैसे ही हो सकते हैं, परन्तु इस बात का ध्यान रखें कि अवस्था (आयु) के विकास के साथ साथ शिशु के स्वभाव में परिवर्तन आना अपेक्षित है। अतः प्रत्येक अवस्था में स्वाभाविक विशेषताएं का अलग अलग होना निश्चित ही है।
शिशु को भगवान का स्वरूप उसकी स्वाभाविक विशेषताओं के कारण ही कहा जाता है। भगवान की ही भांति उसका स्वभाव निर्दोष, निर्मल और वात्सल्यमयी होता है। अन्तर केवल इतना है कि भगवान स्वावलम्बी हैं, सम्पूर्ण सृष्टि का संचालन करते हैं, परन्तु शिशु परावलम्बी (dependent) है। वह अन्तःप्रेरणा (self-inspiration) से अन्यों के सहयोग के माध्यम से स्वयं को स्वावलम्बी (independent) बनाना चाहता है। अन्तःकरण की यह प्रेरणा ही उसके स्वालंबन अर्थात् विकास का कारक बनती है।
शिशु की स्वाभाविक विशेषताएँ
सामान्यत: अज्ञानतावश माता-पिता बड़ी अजीब सी बात कर देते हैं जैसे शिशु के गिरने पर कहेंगे – अरे चींटी मर गई हा…………….। दूध न पीने पर कहेंगे – पी ले नहीं तो बिल्ली को दूध दे दूंगी। खाना खा लो नहीं तो डॉक्टर से सुई लगवा दूंगी। सो जा नहीं तो भूत आ जाएगा। विचार करें जरा इन सब वाक्यों से हम शिशु को क्या संस्कार दे रहे हैं। गलत संस्कारों के साथ साथ उसकी वाणी का विकास भी गलत ही हो रहा है क्योंकि वह जैसा सुनेगा, वैसा ही बोलेगा।
शिशु का विकास एक प्राकृतिक प्रक्रिया है अतः प्रकृति द्वारा प्राप्त उसकी स्वाभाविक विशेषताएँ को समझ कर ही माता-पिता को घर के वातावरण को अनुकूल एवं संस्कारक्षम बनाना चाहिए ऐसा करने से शिशु का विकास यथा समय एवं सही दिशा में होगा।
(लेखिका शिशु शिक्षा विशेषज्ञ है और विद्या भारती उत्तर क्षेत्र शिशुवाटिका विभाग की संयोजिका है।)
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