शिशु शिक्षा 27 – एक से तीन वर्ष के शिशुओं की माताओं का शिक्षण-1

 – नम्रता दत्त

शिशु की स्वाभाविक विशेषताएं

एक वर्ष से भी कुछ अधिक समय से हम निरन्तर शिशु शिक्षा का अध्ययन कर रहे हैं। शिशु शिक्षा गर्भावस्था से भी पूर्व प्रारम्भ होती है, कैसे? इसका अध्ययन करते करते हमने गर्भावस्था के नौ मास का भी अध्ययन किया और जन्म से एक वर्ष के शिशु की शिक्षा के विषय में भी अध्ययन किया है।

इस श्रृंखला में हम शिशु की एक वर्ष से लेकर तीन वर्ष की विभिन्न अवस्थाओं का अध्ययन करेंगे। यह विभिन्न अवस्थायें शिशु शिक्षा में किस प्रकार सहायक होती हैं, इस पर भी हम ध्यान देंगे और स्व-चिंतन के आधार पर उन्हें स्वीकार एवं धारण भी करेंगे।

इस श्रृंखला के प्रथम सोपान में एक से तीन वर्ष के शिशु की स्वाभाविक विशेषताओं पर बात करेंगे। सम्भवतः सोपानों के नाम पहले जैसे ही हो सकते हैं, परन्तु इस बात का ध्यान रखें कि अवस्था (आयु) के विकास के साथ साथ शिशु के स्वभाव में परिवर्तन आना अपेक्षित है। अतः प्रत्येक अवस्था में स्वाभाविक विशेषताएं का अलग अलग होना निश्चित ही है।

शिशु को भगवान का स्वरूप उसकी स्वाभाविक विशेषताओं के कारण ही कहा जाता है। भगवान की ही भांति उसका स्वभाव निर्दोष, निर्मल और वात्सल्यमयी होता है। अन्तर केवल इतना है कि भगवान स्वावलम्बी हैं, सम्पूर्ण सृष्टि का संचालन करते हैं, परन्तु शिशु परावलम्बी (dependent) है। वह अन्तःप्रेरणा (self-inspiration) से अन्यों के सहयोग के माध्यम से स्वयं को स्वावलम्बी (independent) बनाना चाहता है। अन्तःकरण की यह प्रेरणा ही उसके स्वालंबन अर्थात् विकास का कारक बनती है।

शिशु की स्वाभाविक विशेषताएँ

  1. संस्कार – इस अवस्था में शिशु की ज्ञानेन्द्रियां सक्रिय होती हैं जबकि कर्मेन्द्रियां विकासशील होती हैं। ज्ञानेन्द्रियों की सक्रियता के कारण उसका अन्तःकरण (मन, बुद्धि, अहंकार एवं चित्त) भी सक्रिय होता है। अन्तःकरण में भी मन, बुद्धि की अपेक्षा चित्त की सक्रियता अत्यधिक होती है। ज्ञानेन्द्रियों की सक्रियता के कारण वह जो कुछ भी अपने आसपास के वातावरण में देखता, सुनता है उसकी गहरी छाप सीधी उसके चित्त पर पङ जाती है और यही छाप भविष्य में संस्कार बन जाती है। अतः शिशु की इस स्वाभाविक विशेषता को ध्यान में रखते हुए माता-पिता एवं परिवार का यह दायित्व बनता है कि वे घर के वातावरण को संस्कारक्षम बनाएं।
  2. जिज्ञासा – रमन ने अपने ढाई वर्ष के बेटे पंकज को एक चाबी वाली लाल रंग की कार दिलवाई। कार के दरवाजें बन्द थे और खिङकियों पर गहरे रंग के प्लास्टिक के शीशे लगे हुए थे। रमन से वह बार बार उसमें चाबी भरवाने आता। रमन परेशान हो गयी और उसने कहा जाओ खुद ही चलाओ। थोङी देर बेटे की आवाज न आने पर उसने कमरे में जाकर देखा तो कार का दरवाजा और खिङकी टूटे हुए थे। उसने गुस्से से पूछा- यह क्या किया? पंकज ने सहमते हुए कहा – मैं देख रहा था कि इसमें ड्राइवर कहां बैठा है? पंकज ने अपनी आंखों (ज्ञानेन्द्रिय) से अपने पापा को कार चलाते देखा था। वह जानता था कि कार में चाबी लगाने के बाद भी पापा ही सीट पर बैठ कर कार चलाते हैं। उसकी कार चाबी से कैसे चल रही है? शिशु की बुद्धि इस समय सक्रिय नहीं होती। परन्तु अपनी ज्ञानेन्द्रियों से प्राप्त अनुभवों की जिज्ञासा को वह निरीक्षण-परीक्षण के आधार पर शांत करना चाहता है। इसलिए वह प्रश्न करता है और तोङ फोङ भी करता है। उसकी जिज्ञासा का समाधान ही उसके विकास का माध्यम बनता है।
  3. पुनरावर्तन अर्थात् एक ही क्रिया को बार बार करना – शिशु स्वावलम्बी बनना चाहता है। स्वावलम्बी बनने के लिए उसे अपनी कर्मेन्द्रियों (हाथ, पैर और वाणी) को सक्रिय करना है। इसका अर्थ है हाथ, पैर और वाणी से होने वाले सभी कार्यों का उसे अभ्यास करना है। और अभ्यास करने के लिए बार बार एक ही क्रिया को करना ही पङता है। यह पुनरावर्तन वह अन्तःप्रेरणा (self-inspiration) से ही करता है। जैसे- चलने का अभ्यास करने के लिए वह बार बार गिरता है परन्तु बार बार उठकर चलता है, जब तक वह अपना संतुलन बनाना और चलना नहीं सीख जाता। ऐसा ही अन्य क्रियाओं में भी सिद्धि (expertization) प्राप्त करने के लिए करता है। इसीलिए उसे सिद्ध अथवा योगी भी कहा जाता है।
  4. सक्रियता – शिशु कभी भी खाली नहीं बैठता। वह हर क्रिया को खेल ही समझता है और खेल खेल में ही अपना विकास स्वयं कर लेता है। उसके ऐसे गुण को सही दिशा देने के लिए माता-पिता को उसे उपयोगी क्रिया करने का सहज वातावरण एवं प्रेमपूर्ण सहयोग देना चाहिए। अपनी इच्छा के अनुरूप कोई भी क्रिया को जबरदस्ती उसे करने के लिए मजबूर नहीं करना चाहिए और न ही उसे लालच देना चाहिए। क्रिया उसे सहज लगेगी और वह खेल के रूप में उसे आनन्दित होकर करेगा तो उसका विकास अधिक होगा।
  5. निरुद्देश्य अथवा निष्काम क्रियाएं – शिशु क्रियाएं निष्काम और निरुद्देश्य करता ही रहता है। किसी क्रिया के पीछे उसका कोई स्वार्थ नहीं होता केवल वह अपने आनन्द के लिए ही विभिन्न क्रियाएं करता है। कार्य करने की इस अन्तःप्रेरणा में ही उसका विकास अन्तर्निहित है। इसलिए शिशु जो भी क्रिया कर रहा हो उसमें बाधक नहीं बनना चाहिए अपितु उसकी सुरक्षा का ध्यान रखते हुए उसे करने देना चाहिए। स्वयं भी उसके आनन्द में सम्मिलित होना चाहिए। इससे उसका मनोबल और बढ़ेगा और आप भी अपने बचपन को दोबारा जी पाएंगे।
  6. क्रमिक विकास – जिस प्रकार शिशु का विकास क्रमशः होता है उसी प्रकार उसकी क्रियाएं भी क्रमशः ही होती हैं। जब वह खङा होकर अपना संतुलन बनाना सीख लेता है, तब ही वह चलना शुरू करता है। ऐसे क्रमिक अभ्यास में उसकी शक्ति लगती है। कई बार गिरता है और उठता है। ऐसे में कभी भी माता-पिता को न स्वयं कमजोर बनना चाहिए और न ही शिशु को डराना अथवा कमजोर करना चाहिए। ऐसी स्थिति में सदैव प्रोत्साहित शब्दों का प्रयोग करना चाहिए। शिशु शब्दों के भावों को बहुत अच्छी तरह समझता है।

सामान्यत: अज्ञानतावश माता-पिता बड़ी अजीब सी बात कर देते हैं जैसे शिशु के गिरने पर कहेंगे – अरे चींटी मर गई हा…………….। दूध न पीने पर कहेंगे – पी ले नहीं तो बिल्ली को दूध दे दूंगी। खाना खा लो नहीं तो डॉक्टर से सुई लगवा दूंगी। सो जा नहीं तो भूत आ जाएगा। विचार करें जरा इन सब वाक्यों से हम शिशु को क्या संस्कार दे रहे हैं। गलत संस्कारों के साथ साथ उसकी वाणी का विकास भी गलत ही हो रहा है क्योंकि वह जैसा सुनेगा, वैसा ही बोलेगा।

शिशु का विकास एक प्राकृतिक प्रक्रिया है अतः प्रकृति द्वारा प्राप्त उसकी स्वाभाविक विशेषताएँ को समझ कर ही माता-पिता को घर के वातावरण को अनुकूल एवं संस्कारक्षम बनाना चाहिए ऐसा करने से शिशु का विकास यथा समय एवं सही दिशा में होगा।

(लेखिका शिशु शिक्षा विशेषज्ञ है और विद्या भारती उत्तर क्षेत्र शिशुवाटिका विभाग की संयोजिका है।)

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