सा विद्या या विमुक्तये
– नम्रता दत्त
गत सोपान में शिशु की स्वाभाविक विशेषताओं को जाना था कि वह किस प्रकार अन्तःप्रेरणा के द्वारा अपना विकास स्वयं ही करता है। माता पिता जोर जबरदस्ती से उसे कुछ भी सीखा नहीं सकते। उनको तो केवल शिशु की स्वाभाविक विशेषताओं को समझते हुए उपयुक्त वातावरण देना चाहिए। इस उपयुक्त वातावरण को देने के लिए उन्हें शिशु की मानसिक आवश्यकताओं का ध्यान भी रखना होगा।
मानसिक आवश्यकताएं
प्रकृति की गोद में वह माता के गोद जैसा ही आनन्द लेता है। इसलिए मिट्टी और पानी में खेलना उसको अच्छा लगता है। परन्तु आजकल के माता पिता तो मिट्टी में खेलना तो दूर उसको नंगे पैर मिट्टी में चलने तक नहीं देते। उन्हें इसमें इनफैक्शन का डर लगता है। इस तरह वह शिशु के विकास में बाधक बनते हैं। मिट्टी (माता की गोद) में खेलने से इनफैक्शन नहीं होता बल्कि इम्युनिटी बढती है। तब ही तो मिट्टी में खेलने वाले बच्चे तन्दरूस्त होते हैं और मिट्टी से दूर रहने वाले बच्चों को इन्फैक्शन जल्दी होता है। उदाहरण के लिए गांव और शहर के बच्चों की तुलना करके जान सकते हैं। जैसे आया की गोद में पलने वाला बच्चा मां को नहीं जानता ऐसे ही मिट्टी से दूर रहने वाला बच्चा देश से नहीं जुङ पाता। ऐसी ही पालना में पलने वाले बच्चों को विदेश में जाकर देश की याद नहीं आती।
बच्चा गाय/कुत्ते आदि के बच्चों से निडर होकर खेलता है और वे भी उसके सहज स्वभाव के कारण उसे कोई नुकसान नहीं पहुंचाते। परन्तु आज माता पिता स्वयं ही डरते हैं क्योंकि उनके माता पिता ने भी उनको ऐसे खेलने का अवसर नहीं दिया। माता पिता को सुरक्षा का ध्यान रखते हुए बच्चे को ऐसे खेलने देना चाहिए। ऐसे ही वह इस सृष्टि से जुङना सीखता है।
प्रेम, सहयोगी, स्वतंत्र और सहज वातावरण में शिशु को सहजता का अनुभव होता है और वह स्वयं को आनन्दित अनुभव कर निडरता के साथ अपने विकास की सीढीयों पर स्वतः ही बढता जाता है। प्रेम मिलने पर वह भविष्य में प्रेम बांटना सीख जाता है। निडर बनने से उसका आत्म विश्वास बढता जाता है जो भविष्य में उसे चुनौतियों का सामना करने के लिए तैयार करता है।
माता पिता को चाहिए कि वे उसकी शारीरिक आवश्यकताओं की पूर्ति का ध्यान रखते हुए, उसकी मानसिक आवश्यकताओं की पूर्ति का ध्यान भी अवश्य ही रखें। तब ही उसका विकास सही दिशा में होगा। यह चरण शिशु शिक्षा के ही चरण हैं। अतः इसके मर्म को उन्हें अवश्य जानना और समझना चाहिए।
(लेखिका शिशु शिक्षा विशेषज्ञ है और विद्या भारती उत्तर क्षेत्र शिशुवाटिका विभाग की संयोजिका है।)
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