शिशु शिक्षा 28 – शिशु की मानसिक आवश्यकताएं

 – नम्रता दत्त

गत सोपान में शिशु की स्वाभाविक विशेषताओं को जाना था कि वह किस प्रकार अन्तःप्रेरणा के द्वारा अपना विकास स्वयं ही करता है। माता पिता जोर जबरदस्ती से उसे कुछ भी सीखा नहीं सकते। उनको तो केवल शिशु की स्वाभाविक विशेषताओं को समझते हुए उपयुक्त वातावरण देना चाहिए। इस उपयुक्त वातावरण को देने के लिए उन्हें शिशु की मानसिक आवश्यकताओं का ध्यान भी रखना होगा।

मानसिक आवश्यकताएं

  1. प्रेम एवं सुरक्षा – सामान्यतः माता पिता के मन में यह अवधारणा रहती ही है कि वे बङे हैं और इस नाते वे शिशु को डांटेगे नहीं तो वह बिगङ जाएगा। उनके विचार से प्रारम्भ से ही शिशु को जैसी आदत डाली जाएगी भविष्य में भी उसी का पालन करेगा। इस तरह वे न केवल उसकी स्वाभाविक विशषताओं को समझने में असफल रहते हैं बल्कि उसकी मानसिक आवश्यकताओं की पूर्ति भी नहीं कर पाते। वे उसकी शारीरिक आवश्यकताओं की पूर्ति करने को ही अपना विशेष दायित्व समझ लेते हैं। परन्तु हम सब जानते हैं कि अधिकांशतः मन की पीङा के कारण, तन अपने आप को अस्वस्थ महसूस करता है। बकरी को शेर के सामने बांधकर यदि सूखे मेवे भी खिलाए जाएं तब भी उसका शरीर हष्ट पुष्ट नहीं होगा क्योंकि वह हर समय शेर से भयभीत रहेगी। अतः प्रेम और सुरक्षा की अनुभूति शिशु के विकास में सहयोग का कार्य करती है। यह समय उसकी कर्मेन्द्रियों के विकास का है। अतः यदि वह स्वप्रेरणा से प्रेरित होकर कुछ गलत कर भी देता है तो उसे डांटे नहीं, बल्कि प्रेम से समझाएं। भयभीत वातावरण (अंधेरा, बादल का गरजना, बिजली का चमकना, दुःख/शोक/रोना-धोना आदि ) में भी उसे अपने सान्निध्य द्वारा सुरक्षा देनी चाहिए।
  2. आनन्द एवं सहजता – पंचमहाभूत तत्वों से ही यह शरीर बना होने के कारण शिशु उनके सान्निध्य में रहने में आनन्द की अनुभूति करता है। मिट्टी, जल, खुली हवा, सूर्य और आकाश तथा इस सृष्टि की प्रत्येक रचना के सान्निध्य में रहने में वह स्वयं को सहज और आनन्दित अनुभव करता है। हमारे अनुभव में भी आता ही है कि रोते हुए शिशु को जब बाहर ले जाते हैं तो वह चुप हो जाता है।

प्रकृति की गोद में वह माता के गोद जैसा ही आनन्द लेता है। इसलिए मिट्टी और पानी में खेलना उसको अच्छा लगता है। परन्तु आजकल के माता पिता तो मिट्टी में खेलना तो दूर उसको नंगे पैर मिट्टी में चलने तक नहीं देते। उन्हें इसमें इनफैक्शन का डर लगता है। इस तरह वह शिशु के विकास में बाधक बनते हैं। मिट्टी (माता की गोद) में खेलने से इनफैक्शन नहीं होता बल्कि इम्युनिटी बढती है। तब ही तो मिट्टी में खेलने वाले बच्चे तन्दरूस्त होते हैं और मिट्टी से दूर रहने वाले बच्चों को इन्फैक्शन जल्दी होता है। उदाहरण के लिए गांव और शहर के बच्चों की तुलना करके जान सकते हैं। जैसे आया की गोद में पलने वाला बच्चा मां को नहीं जानता ऐसे ही मिट्टी से दूर रहने वाला बच्चा देश से नहीं जुङ पाता। ऐसी ही पालना में पलने वाले बच्चों को विदेश में जाकर देश की याद नहीं आती।

बच्चा गाय/कुत्ते आदि के बच्चों से निडर होकर खेलता है और वे भी उसके सहज स्वभाव के कारण उसे कोई नुकसान नहीं पहुंचाते। परन्तु आज माता पिता स्वयं ही डरते हैं क्योंकि उनके माता पिता ने भी उनको ऐसे खेलने का अवसर नहीं दिया। माता पिता को सुरक्षा का ध्यान रखते हुए बच्चे को ऐसे खेलने देना चाहिए। ऐसे ही वह इस सृष्टि से जुङना सीखता है।

  1. स्वतंत्रता – यह हम सबका अनुभव है कि स्वतंत्र वातावरण में ही अर्न्तनिहित शक्तियों का विकास हो पाता है। दबाव के वातावरण कार्य के गलत होने की सम्भावना अधिक रहती है। अतः शिशु स्वयं से जो क्रिया करता है उस क्रिया से होने वाले विकास को ध्यान में रखते हुए उसका सहयोग करना चाहिए। यदि लगता है कि उसकी क्रिया से कोई नुकसान हो सकता है तो उसे प्रेमपूर्वक समझाएं। उसे दूसरी क्रिया में लगाकर उसके ध्यान को वहां से हटाया जा सकता है।
  2. सृजनात्मक वृत्ति – यह अवस्था कर्मेन्द्रियों (हाथ, पैर और वाणी) के विकास की है। अतः अन्तःप्रेरणा से प्रेरित शिशु हमेशा कुछ न कुछ करता ही रहता है। अपने से ही बात करता रहता है। वह अपनी कल्पना से कुछ कुछ निर्माण करता रहता है। ऐसे में उसे रोकना-टोकना नहीं चाहिए। इस निर्माण के कारण ही उसकी सृजन वृत्ति (creative nature) बनती जाती है। छोटी आयु में सृजन करने से विसर्जन की वृत्ति स्वतः ही समाप्त हो जाती है। माता-पिता की दृष्टि में यह सृजन बेकार का हो सकता है, परन्तु शिशु की कर्मेन्द्रियों में सहयोगी होने के साथ-साथ मानसिक विकास में भी सहायक सिद्ध होता है।

प्रेम, सहयोगी, स्वतंत्र और सहज वातावरण में शिशु को सहजता का अनुभव होता है और वह स्वयं को आनन्दित अनुभव कर निडरता के साथ अपने विकास की सीढीयों पर स्वतः ही बढता जाता है। प्रेम मिलने पर वह भविष्य में प्रेम बांटना सीख जाता है। निडर बनने से उसका आत्म विश्वास बढता जाता है जो भविष्य में उसे चुनौतियों का सामना करने के लिए तैयार करता है।

माता पिता को चाहिए कि वे उसकी शारीरिक आवश्यकताओं की पूर्ति का ध्यान रखते हुए, उसकी मानसिक आवश्यकताओं की पूर्ति का ध्यान भी अवश्य ही रखें। तब ही उसका विकास सही दिशा में होगा। यह चरण शिशु शिक्षा के ही चरण हैं। अतः इसके मर्म को उन्हें अवश्य जानना और समझना चाहिए।

(लेखिका शिशु शिक्षा विशेषज्ञ है और विद्या भारती उत्तर क्षेत्र शिशुवाटिका विभाग की संयोजिका है।)

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