एक महान नदी और नारी का मिलन स्थल महेश्वर

  – गोपाल महेश्वरी

परम पुरातन दिव्य सनातन देवभूमि भारत के मनोहर मध्य क्षेत्र को ही वर्तमान युगीन मध्य प्रदेश कहते हैं। मालवा और नीमाड़ इसी प्रदेश के दो महत्त्वपूर्ण उपखंड हैं। इतिहास और संस्कृति के अनेक अमर पत्र यहाँ रचे गए। मालवा की सर्वोच्च महिमा ज्योर्तिलिंग महाकालेश्वर और शक्तिपीठ हरसिद्धि के कारण विश्वश्रुत है तो प्रसिद्ध चार कुम्भस्थलों में से एक कुंभस्थल भी मालवा की सृष्टि में मोक्षदा सप्तपुरियों में से एक अवंतिकापुरी के पावन शिप्रातट पर ही स्थित है। भगवान श्रीकृष्ण और महाबलधाम श्री बलराम जी की पवित्र शिक्षास्थली और सम्राट विक्रमादित्य की राजधानी भी यहीं विशाला अर्थात् वर्तमान उज्जैन में थी। उज्जयिनी या उज्जैन ने मालवा के जो गौरव दिया उनके कारणों, उपदानों की सूची बड़ी लम्बी है। लेकिन अर्वाचीन इतिहास में यही मालवा एक और प्रातःस्मरणीय महीयसीनारी के कारण गौरवान्वित है, वे हैं पुण्यश्लोका, लोकमाता अहिल्याबाई होल्कर। वे मालवा के ही एक नगर इन्दूर की महारानी थीं। यह इन्दूर ही वर्तमान में मध्यप्रदेश का विशाल और प्रख्यात नगर इन्दौर है।

अब थोड़ी चर्चा निमाड़ की करते चलें। किंवदन्ती है, किसी समय सघन नीम के पेड़ों की बहुलतायुक्त भूमि के कारण इसका नाम नीमाड़ पड़ गया। यद्यपि वर्तमान में इसकी शीतल सघन हरीतिमा सीमित होती जा रही है। बारह ज्योतिर्लिंगों में एक सुप्रसिद्ध ओंकारेश्वर (अमरेश्वर) इसी पुण्यक्षेत्र में स्थित है। भारतीय सांस्कृतिक वांग्मय में गंगा, यमुना, सरस्वती, गोदावरी आदि सप्त सरिताएँ अत्यन्त पुण्या एवं मोक्षदायिनी मानी गई हैं। इन्हीं में एक है नर्मदा। मध्यप्रदेश के ही अनूपपुर जिले के पवित्र स्थल अमरकंटक से निकलकर अपने सुदीर्घ धारापथ के उभयतटों पर असंख्य तीर्थस्थली, अनेक नगरों को तृप्त करती नर्मदा का भरपूर आश्रय इस नीमाड़ को मिला है। ओंकारेश्वर तीर्थ इसी शिवतनया के सुन्दर तट पर स्थित है। यहीं है जगद्गुरु आदि शंकराचार्य के गुरु आचार्य गोविन्द भगवद् पाद की तपस्थली भी। इसी ओंकार क्षेत्र के समीपस्थ है ऐतिहासिक एवं पौराणिक महत्त्व का धनी महेश्वर। पुराण कथाओं में महाबली सहस्रार्जुन की राजधानी महिष्मती ही वर्तमान महेश्वर है ऐसी मान्यता है और देवी अहिल्याबाई होल्कर की भी यह राजधानी बनकर आधुनिक स्थान में सुचर्चित नगर है।

माँ अहिल्या के बारे में चर्चा आगे बढ़ाने से पहले उनसे विशेष रूप से जु़ड़े इन दो मालव व नीमाड़ क्षेत्रों की वार्ता के बाद थोड़ी बातें पुण्यतोया नर्मदा की भी आवश्यक है। भारत के सप्त पर्वतों में प्रतिष्ठित विन्ध्य और उसके सहोदर तुल्य सतपुड़ा के मध्य जो पर्वत क्षेत्र मैकल कहलाता है उसी के अंक में नर्मदा का प्रथम दर्शन होता है। गंगा की भाँति नर्मदा को भी स्वर्ग सरिता माना गया है। स्कन्दपुराण के अनुसार चन्द्रवंशीय चक्रवर्ती सम्राट् पुरुरवा के राज्य में एक बार भयंकर अकाल पड़ा। अन्न जल के बिना प्रजा तड़प-तड़पकर मरने लगी। तृण पल्लव नीर के अभाव में पशु पक्षी कालकवलित हो गए। त्राहि-त्राहि का आर्तस्वर सुन तपस्वी ऋषिगणों ने सम्राट् को उपाय सुझाया कि स्वर्ग में नर्मदा नामक कन्या निर्मल पावन जल प्रवाह बन कर प्रवहमान है। वह अत्यंत तेजस्वी है, यह तेज उसने घोर तपस्या करके अर्जित किया है। वह त्रिभुवन पावनी शक्ति से युक्त है। उसका भूतल पर आगमन ही उपस्थित भीषण अकाल के गाल से छूटने का एक मात्र उपाय है। ऋषियों ने बताया कि नर्मदा दृढ़निश्चयी है, हठीली है अतः उसे मनाना बड़ा कठिन होगा।

पुरुरवा यह जानकर व्याकुल हो रहे थे। अपनी प्रजा का त्रास देखना उनकी सहनशीलता की सारी सीमाएँ तोड़ चुका था। कैसे भी हो पर वे समाधान चाहते थे। तभी लोकानुग्रह के लिए ही सदैव पर्यटन करने वाले महामुनि नारद का संतहृदय द्रवित हुआ और वे पुरुरवा से कह उठे, “महाराज! नर्मदा एक तपस्विनी है, उसे तप करके ही अनुकूल करना संभव है। तप से सबसे शीघ्र प्रसन्न होने वाले तो आशुतोष शिवशंकर ही है। राजा ने नौ वर्ष निराहार तप कर औढरदानी शिव को प्रसन्न किया और वरदान में नर्मदा को भूलोक पर अवतरण की आकांक्षा प्रकट की। आगे की कथा गंगावतरण की कथा से मिलती जुलती है। शिव जी ने स्वयं कहा कि तप एवं तेज के प्रभाव से नर्मदा इतनी वेगवती है कि यह वह पृथ्वी पर आयी तो उसे फोड़कर त्राहि-त्राहि मचा देगी। उसके वेग को कौन संभाल सकेगा। गंगा को तो स्वयं शिव ने सम्हाला था पर नर्मदा के लिए पृथ्वी के प्रधान-प्रधान आठ पर्वतों से पूछा गया लेकिन अपरिमित वेगवती नर्मदा के वेग को कौन सहे। अचलों का मानस भय से विचलित हो उठा। अन्ततः शिवकृपा और पिता विन्ध्याचल की प्रेरणा से पुरुरवा की प्रजा का मंगल करने पर्यंक पर्वत ने यह दायित्व स्वीकारा। शिवाज्ञा से ही अपना हठ छोड़ नर्मदा विकट वेग व प्रचंड प्रवाह से धराधाम पर कूद पड़ी। उसके प्रलय तुल्य प्रवाह से भूमंडल भयभीत हो उठा। प्रजा भय से काँप उठी। पहले जल के बिना प्राण जा रहे थे अब जल ही प्राणांतक स्थिति उत्पन्न कर रहा था। तब करुणाकर भोलेनाथ ने ही नर्मदा को सौम्य शान्त प्रवाहमान बनने की आज्ञा दी।

इस पौराणिक आख्यान से तो नर्मदा का लोकोपकार हेतु धरती पर आना सिद्ध होता है। प्रत्यक्ष दर्शन में भी यह अमरकंटक से लेकर भृगुकृच्छ (भडूच, गुजरात) में सागर मिलन करने तक 1312 कि.मी. लम्बे यात्रापथ में असंख्य प्राणियों का जीवनोद्धार है। दोनों तटों पर सैकड़ों तीर्थ एवं विशाल वनवैभव से भूषित लोक में गंगा, यमुना, सरस्वती तुल्य पूज्यता प्राप्त यह नदी सुन्दरता के कारण सौन्दर्य की नदी, पावनता के कारण दूसरी गंगा, लोकोपकारिता के कारण मध्यप्रदेश की जीवनरेखा और सांस्कृतिक महत्ता के कारण संस्कृति धारा कहलाती है। युगों युगों से यह जनश्रद्धा का आगाध स्रोत है। लोग इसे नदी नहीं माँ मानते हैं। स्वयं जगद्गुरु आदि शंकर ने ‘त्वदीय पादपंकजम् नमामि देवि नर्मदे।’ कहते हुए माँ नर्मदा की वंदना की है।

नर्मदा अन्तःसलिला कही जाती है। ऊपर से शांत लेकिन अंदर ही अन्दर अत्यंत प्रवाहमयी। इसका एक नाम रेवा है, जिसका अर्थ है छलांग लगाना। नर्मदा का प्रवाहपथ देखें तो इस नाम की सार्थकता स्वयंसिद्ध हो जाती है। अल्हड़ आल्हाद से भरी यह शिव कन्या अनेक ऊँचे-नीचे पर्वतपथ से निकलती है तो फिसलती नहीं, उछलती हुई, कूदती हुई अनेक प्रपात निर्मित करती, कहीं अत्यन्त चौड़े और कहीं नितांत संकुचित स्वरूप में लगभग 400 गाँवों से गुजरती है। वस्तुतः ये गाँव नहीं तीर्थ हैं। इतने पावन कि प्रतिवर्ष असंख्य श्रद्धालु इनसे गुजरते हैं, माँ नर्मदा की परिक्रमा करते हैं। धराधाम पर मात्र एक ही नदी है, जिसकी परिक्रमा की जाती है। 2576 किलोमीटर कोई पैदल तो कोई वाहनों पर लेकिन सदियों से यह यात्रा अनवरत अखंड परम्परा के रूप में चल रही है।

नर्मदा शब्द का अर्थ है खेलने वाली, एक और अर्थ है आनन्द देने वाली। मनमाना पथ, मनमानी गति, स्वाधीन सरिता नर्मदा। देश की प्रायः सभी सरिताएँ पश्चिम से पूर्व दिशा में प्रवाहित होती हैं लेकिन नर्मदा पूर्व से चलती है, पश्चिम की ओर बहती जाती है। वैदिक काल से आजतक अक्षुण्ण महिमावाली, पावन इतनी की इसके प्रवाह का कंकर -कंकर शंकर कहलाता है। नर्मदा के शिवलिंग की प्राणप्रतिष्ठा नहीं करनी पड़ती। वह स्वयं शिवचैतन्यमय होता है। कहा जाता है कि ‘ग्रामे वा यदि वाऽरण्ये पुण्या सर्वत्र नर्मदा।’ गाँव हो या जंगल हो नर्मदा जहाँ भी हो, पुण्यप्रदा है। और तो और इसका दर्शनमात्र भी मुक्ति देता है। नर्मदा गाथा जितनी कही जाए, कम ही है। लेकिन अब बात नर्मदा सुता-देवी अहिल्या की। अपने कालजयी काव्य कामायनी में श्री जयशंकर प्रसाद से लिखा है-

नारी तुम केवल श्रद्धा हो, विश्वास रजत नग पग तल में,

पीयूष स्रोत सी बहा करो, जीवन के सुन्दर समतल में।

प्रसाद जी ने नारी को श्रद्धा-सरिता के रूप में विश्वास नग से अमृत प्रवाहिनी बन जीवन के सुन्दर समतल में बहने की भावना व्यक्त की है। श्रद्धा की साकार प्रतिमा बनकर लोकोपकार करती रही, ऐसी ही नदी है नर्मदा और नारी अहिल्या। लोक विश्वास नग से प्रवाहित लोकजीवन में वितरित लोक श्रद्धा की सरिता। हाँ, इनका जीवन पथ समतल नहीं, अत्यन्त उथल-पुथल भरा, उतार चढ़ाव वाला रहा पर लोकोपकार कर्तव्य से वे रंचमात्र भी विचलित नहीं हुई। आरम्भ में ही नर्मदा-कथा इसलिए कही कि माँ नर्मदा और पुत्री अहिल्या में अनेक गुणों की समता है, जैसी माँ बेटी में होती है। निर्मलता, निश्छलता, स्वाभिमान, संघर्षशीलता, निरंतरता, गतिमयता, अपना सर्वस्व निस्वार्थ भाव से लोक में वितरित करते रहने की तीव्रभावना, लोक से जुड़े रहकर भी एक अलग सा निजी एकांत, वैराग्य। कितना साम्य है इनकी अन्तर्बाह्य प्रवृत्तियों में और हो भी क्यों न, दोनों परम शिवभक्तिनी जो हैं। होलकर राजवंश के संस्थापक श्रीमन्त मल्हारराव होलकर पूना के निकट लगभग बीस कोस पर बसे होल गाँव के निवासी होने से होलकर कहलाए। मल्हारराव एक पशुपालक कृषक परिवार के कुलदीपक थे। परम्परागत पारिवारिक आजीविका यही थी पर वे अदम्य साहसी और पराक्रमप्रिय पुणे के पेशवा, छत्रपति शाहूजी महाराज के प्रधान सहायक थे। उनकी दृष्टि ने मल्हारराव की छुपी प्रतिभा पहचान ली और अवसर मिलते ही मल्हारराव ने अपनी प्रतिभा का प्रकट परिचय करा दिया। पेशवा ने उन्हें मालवा व खानदेश का सूबेदार बना दिया। उस समय इस क्षेत्र पर निजाम का अधिकार था पर मराठों का शौर्य उत्कर्ष पर था। अतः निजाम से छीन कर मल्हारराव ने इस क्षेत्र को मुक्त कराया तथा 20 जनवरी 1728 इन्दौर में होलकर राजवंश की स्थापना का मंगलदिन बना। होलकर परम शिवभक्त थे।

महाराष्ट्र के जामखेड़ अहमदनगर के निकट चौढ़ी नामक ग्राम में नदीतट पर बालुका से एक शिवलिंग बना कर उसकी पूजा में तल्लीन एक अत्यंत तेजस्विनी लेकिन सामान्य रूप, रंग, कदकाठी की बालिका को अपनी सहेलियों के आचरण के विरुद्ध सैनिक घुड़सवारों को देख भागते न देख शिवलिंग रक्षा में तत्पर देखा तो मल्हारराव उस बारह वर्षीय बच्ची पर मुग्ध हो उठे। परिचय प्राप्त किया तो ज्ञात हुआ कि पास ही गाँव में साधारण ग्रामीण कृषक श्री मनकोजी शिंदे की बेटी है यह, नाम है अहिल्या।

मानकोजी ने यह निर्भीक निश्छल और सतर्क आस्तिक बुद्धिमती कन्यारत्न स्वयं जगदम्बा की आराधना कर उनके आशीर्वाद से पाया था। कहते हैं जौहरी ही पाषाण रूप में मिट्टी में दबे हीरे की परख कर सकता है। मल्हारराव को यह कन्या अपने पुत्र खाण्डेराव के लिए सुयोग्य वधु जान पड़ी और वे उसे ब्याह करवा कर इन्दौर के राजवाड़े में ले आए।

बालिका रूप में आई इस अनगढ़ प्रतिमा को मल्हारराव ने ऐसा निखारा कि वह इस राजवंश की बहू ही नहीं बल्कि राजसभा की अभिन्न और महत्त्वपूर्ण सदस्य भी बन गई। वे बचपन से ही अत्यंत उदारमन की दयालु व सहयोगी वृत्ति की थीं। वे धार्मिक स्वभाव की थीं। आस्तिक थीं प्रतिदिन शिव-पूजा करतीं, दान धर्म करतीं लेकिन उनके विचारों में रूढ़िवादिता किंचित् भी न थी। वे प्रत्येक समस्या पर बहुजनहिताय एवं सर्वसुखाय चिंतन की पक्षधर थीं। सामाजिक सुधारों के लेकर उनका चिंतन बहुत क्रान्तिकारी था। इसका उन्हें बहुत विरोध भी सहना पड़ा पर उनके तर्कपूर्ण न्याय व नीतिसंगत दृढ़ निर्णयों की ही विजय हुई। उनके पति श्री खाण्डेराव कला संगीत एवं आमोद-प्रमोदप्रिय पर एक वीर योद्धा थे। वर्ष 1754 में अजमेर में जाटों के चौथ न देने कारण छिड़े युद्ध में खाण्डेराव वीरगति पा गए। वे मल्हारराव के एकमेव उत्तराधिकारी थे। उनका असामयिक निधन होलकर राजवंश पर वज्राघात था। युवावस्था में ही अहिल्या वैधव्यग्रसित हो गई। पति की चिता के साथ तब की रीति के अनुसार वे सती होना चाहती थीं। सामाजिक कुरीतियों की पक्षधर न होते हुए भी अहिल्या ने यह निर्णय अपने पति के प्रति दृढ़ प्रेम के कारण ही लिया था। लेकिन मल्हारराव राव भी अहिल्या के समान ही स्वतंत्रचेता विवेकी पुरुष थे। उन्होंने अहिल्या को उसका कर्तव्यबोध करा कर सती होने से रोक लिया।

खाण्डेराव और अहिल्या की दो संतानें थीं। पुत्र मालेराव व पुत्री मुक्ताबाई। अहिल्या उनका संगोपन राजोचित रीति से करने लगीं। वृद्ध होते श्वसुर मल्हारराव को राज्य संचालन में उनका अनन्य सहयोग प्राप्त होता था। यहाँ तक कि न केवल शास्त्रों अपितु शस्त्रों के संचालन में भी अहिल्या ने सिद्धता प्राप्त कर ली थी।

दुर्दैव से 1767 में मल्हारराव जब उत्तरी भारत के सैन्य अभियान पर थे, ग्वालियर के निकट आलमपुर में उनका स्वास्थ्य अचानक ऐसा बिगड़ा कि वे फिर रुग्ण शैया से उठ न सके और कुछ ही दिनों में वही उनकी मृत्यु शैया सिद्ध हुई। पहले पति फिर पितातुल्य श्वसुर के निधन से अहिल्या पर विपत्तियों का ही नहीं तो उत्तरादायित्वों का भी पर्वत आ गिरा। होने को पुत्र मालेराव ही स्वाभाविक उत्तराधिकारी था होलकर राज्य का, वह गद्दी पर बैठा भी पर वह विवेकहीन, दुराचारी व दुष्ट था। अहिल्याबाई के आदर्शों और मल्हारराव की क्षमता, योग्यता के विपरीत। ईश्वर इच्छा से वह मात्र नौ माह शासन कर सका और अकाल मृत्यु को प्राप्त हुआ। अब राजसिंहासन सर्वथा सूना हो चुका था। अहिल्या बाई सर्वथायोग्य थी, पर एक महिला राज्याधिकारिणी बने, यह राज्यसभा के अन्दर व बाहर अनेक लोगों को स्वीकार्य न था। मल्हारराव के समय से ही राज्य के प्रभावी परामर्शदाता पुरोहित गंगाधर पंत अहिल्या पर दबाब बना रहे थे कि वे दत्तकपुत्र ले लें लेकिन इस परामर्श के पीछे उनके मन में एक कुटिलता थी। वे जानते थे कि दत्तक उत्तराधिकारी उनकी अंगुलियों पर नाचने वाली कठपुतली भर होगा लेकिन अहिल्याबाई की प्रतिभा व बुद्धि के आगे उनकी कुछ भी नहीं चलेगी। कुटिल गंगाधर अपने अस्वीकृत परामर्श से तिलमिला उठा और उसने पेशवा के चाचा राघोबा को इन्दौर की गद्दी पर अधिकार हेतु उकसाया। वे लोभ में आ गए और इन्दौर की ओर बढ़ चले।

यह अहिल्या की विकट परीक्षा का अवसर था। कर्तव्यनिष्ठा और उद्यमशीलता की प्रतिमूर्ति अहिल्या ने सिंधिया, गायकवाड़ और भौंसले राजाओं को सहायता के लिए पत्र भेजा, अपनी सेना को भी तैयार होने की आज्ञा दे दी। अपने विश्वासपात्र वीर और रणकुशल सहयोगी तुकोजीराव को सेना का प्रमुख बनाया। विपक्षी सेना शिप्रा के तट पर  आ पहुँची। तुकोजी भी इस किनारे सेनासहित आ डटे थे। महारानी अहिल्याबाई ने तुकोजी को आगे भेजा पर स्वयं वह बैठी न रहीं। उन्होंने स्वयं भी रणवेश धारण कर स्त्रियों की सेना तैयार कर ली। उधर से पेशवा और भौंसलों की सेना भी रानी की सहायता को चल पड़ी। राघोबा के उत्साह पर पानी फिर गया। बिना लड़े ही वह शोक प्रकट करने के बहाने कुछ दिन इन्दौर के राजबाड़े में रहकर लौट गया। नियति अहिल्या सुरक्षित करने को नर्मदा की गोद में धकेल रही थी। इन्दौर के आसपास ठगां, डाकुओं, पिण्डारियों के उत्पात बढ़ चले थे। पड़ोसी राज्यों में पारस्परिक संघर्ष हो रहे थे। रानी ने दृढ़ता से उपद्रवों को शांत किया। राज्य की सीमा कतिपय वनवासिनी जातियों के आतंक से ग्रस्त थी। अहिल्या ने पहले तो उन्हें समझाया, न समझने पर उनपर बल प्रयोग कर कठोर अनुशासन किया। लेकिन वह यहीं न रुकी, समस्या का सर्वथा निर्मूलन करने के लिए उनके प्रति सुधारात्मक नियत से उनके उजड़े घर गाँव निर्माण किए और रोजगार उपलब्ध करवाया कि जिससे वे लूटपाट के लिए कभी भी विवश न हों। इतना ही नहीं उन जातियों को ही राज्य के आसपास के पथों की सुरक्षा का काम सौंप दिया, बदले में उन्हें वहाँ से गुजरने वाले व्यापारियों से थोड़ा कर मिलने की व्यवस्था बनाई, जो भीलकोड़ी के नाम से प्रसिद्ध हुई।

असाधारण बुद्धिमत्ता, अनुपम औदार्य व अतुल्य प्रजावत्सलता ने उन्हें लोकमाता के रूप में जन-जन का श्रद्धाभाजन बना दिया।

होलकर राजवंश में उस समय सोलह करोड़ रुपये राजकोष में थे। लेकिन श्वेत वस्त्रधारिणी, नैष्ठिक, शिवभक्तिनी अहिल्या एक साध्वी राज्ञी थी। माँस,मदिरा, भोग, विलास से सर्वथा दूर एक संयमी, सादा जीवन और प्रतिपल प्रजाहित का चिंतन। यहाँ तक कि सारा राजकोष शिवार्पण कर उससे एक कोड़ी भी स्वयं के लिए खर्च न करने का व्रत लिया था उन्होंने। संकल्प था यह सारा धन धर्म, परोपकार एवं प्रजा कल्याण के कार्यों में व्यय करूँगी।

सूचना पेशवा तक पहुँची तो लोभवश वे इसमें से कुछ धन की अपेक्षा प्रकट कर बैठे। रानी ने निर्भीक उत्तर भेजा, यह धन तो मैं शिवार्पण कर चुकी हूँ। उसमें से एक मुद्रा भी निकालने का मेरा क्या अधिकार है? हाँ आप ब्राह्मण हैं दान चाहते हों तो आपको कुछ देने का संकल्प करूँ। पेशवा क्रोध से सुलग उठे। “मैं दान लेने वाला नहीं, तलवार चलाने वाला ब्राह्मण हूँ;” कहलाकर तलवार के बल पर यह धन लेने का संदेश भेज दिया। अहिल्या का प्रत्युत्तर था, “मेरे जीते जी तो इसे छू नहीं सकते हैं”।

पेशवा ने इन्दौर पर चढ़ाई कर दी। विराट् सेना के सम्मुख अहिल्या की सेना अत्यल्प थी। अहिल्या ने पाँच सौ स्त्रियों की एक छोटी सी टुकड़ी तैयार की और रणांगण में जा पहुँचीं। जानती थी यह असमान युद्ध होगा, पर रानी ने धैर्य न छोड़ा। पेशवा को संदेश भेजा- “शास्त्रों में स्त्रियों पर शस्त्रप्रयोग निषिद्ध है। अधर्म है यह आप जानते हैं। प्रहार होने पर प्राण रहते हमारा लौटना असंभव है”। स्त्रियों को सामने देख पेशवा बिना लड़े लौट गए।

व्यापारिक एवं सामरिक कारणों से अहिल्याबाई ने मल्हारराव के निधनोपरांत राजधानी महेश्वर को बनाया था। नर्मदा के पुराण प्रसिद्ध तट पर उनका खुला दरबार सजता था। जिसमें कोई राजसी रास-विलास नहीं था, होती थी प्रजा समस्या के समाधान की बातें या धर्मचर्चा।

महेश्वर हैहयवंश के प्रतापी राजा सहस्रार्जुन की राजधानी महिष्मती का ही आधुनिक नाम है, ऐसी मान्यता है। एक रोचक पुराण कथा के अनुसार एक बार सहस्रार्जुन अपनी 500 रानियों सहित अपने हजार हाथों से नर्मदा की धारा को रोककर जल विहार कर रहा था कि वहाँ से गुजरते हुए रावण ने इसे अपनी शिव पूजा में बाधा मानकर ललकारा तो महाबली सहस्रार्जुन ने उसे बंदी बना लिया। महेश्वर तब से राजराजेश्वर तीर्थ बन गया। सहस्रार्जुन की पत्नियाँ रावण के दस मस्तकों पर रख कर दीप जलाती थीं तभी से यहाँ आज भी दीप जलाने की परम्परा चली आ रही हैं। यहीं भगवान परशुराम ने सहस्रार्जुन का युद्ध हुआ था। युद्ध समाप्त न होते देख कर भगवान दत्तात्रेय ने सहस्रार्जुन को समझाया और वे राजराजेश्वर के रूप में मंदिर के शिवलिंग में समा गए। पुराण गाथाओं में प्रायः विविधताएँ मिलती हैं। प्रसिद्धि तो यह भी है कि विश्वविजय करने निकले आदि शंकराचार्य का मण्डन मिश्र से शास्त्रार्थ भी इसी महेश्वर में हुआ था।

महेश्वर का यह पौराणिक इतिहास इतना महिमामंडित रहा है कि यह मध्यप्रदेश की काशी कहा जाने लगा। नर्मदा का विस्तीर्ण पाट सुंदरघाट, अप्रतिम प्राकृतिक दिव्य सौन्दर्य संभवतः ये प्रमुख कारण रहे कि माता अहिल्या ने यहीं एक दुर्ग का निर्माण करवाकर शिवसाक्षी व नर्मदा की सन्निधि में 29 वर्षतक राज्य चलाया। उनके लोकोपकारी व धार्मिक काम केवल मालवा-नीमाड़ या मध्यप्रदेश तक नहीं तो सारे भारतवर्ष, उत्तर से दक्षिण तक देवालयों का जीर्णोद्धार, धर्मशालाओें, कुएँ, बावड़ियां और उनमें संचालित धर्माचरणों व सदावर्तां के रूप में आज भी यह प्रमाणित करते हैं कि लोकमाता अहिल्या का राज्य मात्र होलकर राज्य की सीमा से विस्तृत, बहुत विस्तृत था, कालातीत था कि वह आज भी सुस्थापित है।

महेश्वर साक्षी है कि केवल रण या धर्माचरण ही नहीं तो न्यायप्रियता, सदाचार और साथ ही साथ व्यापार और व्यवसाय-कृषि, जल-प्रबंधन आदि पर भी कितनी कार्यकुशल व व्यापक तथा दूरदर्शिता से अहिल्या नीति क्रियान्वित होती थी। महेश्वर से कपास व रेशम के धागों से बुनी साड़ियाँ आज माहेश्वरी साड़ियों के रूप में सर्वत्र प्रसिद्ध हैं। स्थानीय कामगारों के कला-कौशल का विकास, यह श्रेष्ठ उदाहरण है।

महेश्वर के तीर्थ बनने के कारणों में उसके पौराणिक प्रसंगों के साथ-साथ एक महत्त्वपूर्ण कारण नवीन युग में जुड़ा तो वह है देवी अहिल्या की राजधानी रहना। होलकरों की राजधानी तो इन्दौर भी रहा पर तीर्थ बना महेश्वर क्योंकि यह अहिल्या माँ साहेब का स्वनिर्मित स्वपोषित राज्य था जिसे उन्होंने औपनिषदिक सूक्ति – ‘तेन त्यक्तेन भुंजीथा’ के आधार पर चलाया। नर्मदा साक्षी है तबसे अबतक के हर युग में इन तथ्यों की।

महेश्वर के घाट, नर्मदा की चंचल तरंगों पर तैरती नौकाएँ, अहिल्या माता का किला, उनकी राजगद्दी, राजराजेश्वर का मंदिर, शंकर-मंडन मिश्र के शास्त्रार्थ का स्मृति स्थल, कितना कुछ है यहाँ, पग-पग पर जो आपको आमंत्रित करे, माँ अहिल्या के ममतामयी आँचल की शीतल छाँव का अनुभव करने। इन्दौर महानगर से 100 कि.मी. पर अहिल्यातीर्थ महेश्वर आपको बुला रहा है, बुला रहा है…।

(लेखक इंदौर से प्रकाशित ‘देवपुत्र’ बाल मासिक पत्रिका के संपादक है।)

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