शिशु शिक्षा 22 ( जन्म से एक वर्ष के शिशुओं की माताओं का शिक्षण 2)

 – नम्रता दत्त

शिशु के विकास में सहायक सही आदतें

जन्म से एक वर्ष का शिशु पूर्णतः परावलम्बी अर्थात् दूसरों पर आश्रित होता है। अन्य प्राणियों की तुलना में मनुष्य का नवजातक ही स्वावलम्बन में सर्वाधिक समय लेता है। परन्तु यह परमात्मा की सर्वोत्तम कृति है। सर्वप्रथम तो उसके पालन पोषण का दायित्व प्रकृति मां का ही होता है। इसीलिए प्रकृति ने उसे कुछ स्वाभाविक विशेताएँ दी हैं। इन स्वाभाविक विशेषताओं का चिन्तन गत सोपान में किया गया है। शिशु की सबसे बङी स्वाभाविक विशेषता है कि वह अन्तःप्रेरणा से सीखता है। उसके विकास में सहायक यह प्रकृति उसे स्वतः ही अन्तःप्रेरित करती है जिससे उसके विकास का कार्य भी स्वतः ही होता जाता है।

शिशु के विकास में अवरोध उस समय उत्पन्न होता है जब माता-पिता/परिवार उसके प्राकृतिक स्वभाव को समझते ही नहीं और उसके विपरीत कार्य करते हैं। ऐसे स्थिति में वे शिशु के विकास में सहायक बनने के बजाए बाधक बन जाते हैं। अतः शिशु की स्वाभाविक विशेषताओं एवं विकास में सहायक अच्छी आदतों के विषय में जानकारी होना अत्यन्त अनिवार्य है क्योंकि प्रकृति तो अपना कार्य सुचारू रूप से करेगी ही परन्तु उसके लिए वातावरण बनाने का कार्य तो माता-पिता को ही करना है। आधुनिक युग के माता-पिता अज्ञानतावश शिशु के विकास की विपरीत दिशा में ही कार्य करते हैं।

वर्तमान माता पिता शिशु के लाड-प्यार के वशीभूत उसके आहार-विहार, कपङे, दवाइयां, निद्रा, व्यायाम आदि के विषय में विपरीत क्रियाएं ही करते नजर आते हैं। उदाहरण के लिए सारी सृष्टि पंचमहाभूत तत्वों से बनी है और हमारा शरीर भी उसी से बना है। सूर्योदय से पूर्व ही समस्त सृष्टि (जीव-जन्तु/पशु-पक्षी/पेङ-पौधे आदि) जाग जाती है और सूर्यास्त होते होते सृष्टि सोती सी प्रतीत होती है। परन्तु कितने मनुष्य हैं जो सूर्योदय से पूर्व जागते हैं और सूर्यास्त पर सो जाते हैं। इन प्राकृतिक नियमों का पालन न करने के कारण उनकी दिनचर्या, आहार-विहार आदि परिवर्तित हो जाता है। परिणाम स्वरूप वे शारीरिक एवं मानसिक बीमारियों के शिकार हो जाते हैं। अपने स्वभाव के अनुरूप ही वे शिशु को भी ढालने का प्रयास करते हैं।

प्राकृतिक रूप से शिशु का यह संस्कार होता है कि वह सूर्योदय से पूर्व ही जाग जाता है। प्रकृति के नियम पालन के साथ साथ उसके स्वास्थ्य के लिए भी यह अच्छा संस्कार है। शुद्व प्राणवायु एवं सूर्य की कोमल किरणों से वह स्वस्थ एवं निरोगी रहता है। परन्तु अपनी दिनचर्या में देर से सोने और देर से उठने वाले माता-पिता शिशु को भी थपकी देकर सुला देते हैं या यूं कहें कि उसके स्वास्थ्य लाभ से उसे वंचित कर देते हैं। शिशु में अच्छी आदतों के निर्माण के लिए माता पिता को भी अपने संस्कार ठीक करने होंगे।

जन्म से तीन माह तक शिशु अधिक समय तक सोता है। अतः उसको तेल मालिश कर, ऋतुअनुसार गर्म/ठंडे पानी से स्नान कराकर, ऋतुअनुसार ही वस्त्र पहनाकर, साफ बिछौने/बिस्तर पर सुलाना चाहिए। सोते और जागते समय लोरी/प्रभाती/मधुर संगीत भी बजाना/सुनाना चाहिए। सुखद नींद के लिए आजकल माताएं डॉयपर लगा देती हैं। यह भी महा अज्ञानता है। गीला होने पर शिशु रोता है क्योंकि उसकी स्पर्शेन्द्रिय (sense organ) गीले का अनुभव करती है। ज्ञानेन्द्रिय का कार्य ही है अनुभव देना। डॉयपर लगाने से उसकी अनुभव (realisation) करने की क्षमता  समाप्त (loss of sense) हो जाती है जिसके कारण वह बङा होने पर भी मल मूत्र का त्याग कपङों में/बिस्तर में ही करता रहता है। अतः उसे प्रारम्भ से ही मल मूत्र त्यागने की अच्छी आदतें डालनी चाहिए।

जन्म के पश्चात् शिशु के लिए बाह्य सारा वातावरण ही नया है। अतः इसमें सामंजस्य बिठाने में बदलते मौसम के साथ उसे कुछ शारीरिक बीमारियों जैसे- खांसी, जुकाम, बुखार आदि हो जाती हैं। उसकी आंतरिक संरचना प्राकृतिक रूप से कोमल है। अतः ऐसे में उसका उपचार प्राकृतिक औषधि (घरेलू उपचार) से ही करना चाहिए। कृत्रिम रसायन से बनी एलोपैथी दवाइयों का विपरीत प्रभाव उसके शरीर को प्रभावित करता है परिणाम स्वरूप बीमारी ठीक तो हो जाती है परन्तु उसके साइड इफैक्ट के कारण उसके विकास पर गलत प्रभाव पङता है। अज्ञानतावश तुरन्त प्रभाव के कारण माता-पिता उसे एलौपैथिक दवाइयों की आदत डाल देते हैं। बदलते मौसम में उसे उचित वातावरण में रखें ताकि मौसम का प्रभाव उस पर पङे ही नहीं। यदि अधिक आवश्यकत लगे और घरेलू उपचार की जानकारी भी न हो तो आयुर्वैदिक उपचार करना चाहिए।

दांत निकालते समय शिशु को दस्त लग जाते हैं। यह प्राकृतिक प्रक्रिया है। इससे घबराना नहीं चाहिए। शहद से उसके मसूङो की मालिश करनी चाहिए। अधिक दस्त होने पर उसे नमक, चीनी का घोल तथा अन्य घरेलू पेय पदार्थ पिलाने चाहिए। छोटा शिशु माता का दूध पीता है अतः उसकी बीमारियों का इलाज स्वयं माता के हाथ में है। यदि माता उसके स्वास्थ्य को ध्यान में रखते हुए भोजन ग्रहण करेगी तो उसको ऐसी परेशानियों से बचाया जा सकता है।

आधुनिक माताएं अपनी परम्पराओं से अधिक विश्वास डॉक्टर की बात पर करती हैं। अतः बुजुर्गों द्वारा बताई गई बातों को वे मान्यता नहीं दे पातीं। प्रातः शिशु की तेल से मालिश कर उसे कुछ देर सूर्य की रोशनी में लिटाने से उसका रक्त संचार ठीक रहेगा, चर्म रोग भी नहीं होंगे और शरीर बलवान बनेगा। रात्रि में सोते समय उसकी आंखों में घर में बनाया हुआ ताजा काजल डालने से उसकी आंखें सुन्दर तो होंगी ही साथ ही उनका प्रकाश भी बढेगा और निरोगी होंगी। परन्तु डॉक्टर के द्वारा इन बातों को मना करने के कारण माताएं ऐसा नहीं करतीं जिसके कारण उसका विकास बाधित होता है।

एक वर्ष की अवस्था में ही शिशु पैरों पर खङा होकर चलने का अभ्यास करता है। इसके लिए उसे अपने पंजों के दबाव/पकङ को मजबूत बनाकर अपना संतुलन बनाने का अभ्यास करना पङता है। वर्तमान समय में माता पिता इस समय में उसे पहियों वाले वॉकर में बिठा देते हैं। जिसके कारण न पंजों के दबाव का पता चलता है और न ही संतुलन बनाना आता है। वॉकर के पहिए उसे किसी भी तरफ लुढका देते हैं। जिसके कारण उसकी अन्तःप्रेरणा बाधक होती है। निडरता के स्थान पर वह भयभीत होता है। यह भय उसके विकास में बाधक बनता है।

शिशु के दांत नहीं है लेकिन उसके मुंह के अन्दर की सफाई का ध्यान रखना चाहिए। शिशु अधिकांशतः अपने हाथों को मुंह में डालता रहता है अतः शिशु के नाखूनों को समय समय पर काटना चाहिए तथा उसके हाथों को भी थोङी थोङी देर में धोते रहना चाहिए। एक ही चम्मच से दो बच्चों को भोजन न कराएं। विकास की प्रथम शर्त स्वस्थ्ता एवं स्वच्छता ही है और ये श्रेष्ठ संस्कार इसी अवस्था में डालने होंगे।

आयु जितनी छोटी होगी, उतने ही बङे संस्कार आसानी से दिए जा सकते हैं। ध्यान रखें कि संस्कारों का चित्र चित्त पर बनता है और इस अवस्था में चित्त की सक्रियता ही अधिक होती है। अतः इस समय परिवारक वातावरण संस्कारक्षम होना चाहिए। शिशु का लालन पालन प्रेम और सुरक्षा से स्वयं के सानिध्य में प्रोत्साहित करके करना होगा। किसी भी प्रकार की भयभीत करने वाली ध्वनि अथवा बात न करें। अपनी परम्पराओं के प्रति निष्ठावान बनें। अपनी परम्पराओं से विमुख हो कर आज हम शारीरिक एवं मानसिक रूप से असन्तुष्ट ही हैं। हमारे सामाजिक सम्बन्ध कैसे हो गए हैं। चारों ओर अशांति ही फैली हुई है। प्रकृति को भी हमने प्रभावित कर दिया है। अतः स्वयं में परिवर्तन लाएं और आने वाली पीढी को भी तन-मन से स्वस्थ बनाएं।

इस श्रंखला के अगले सोपान में नवजात शिशु के रोग एवं घरेलू उपचार के विषय में विस्तृत चर्चा करेंगे।

(लेखिका शिशु शिक्षा विशेषज्ञ है और विद्या भारती उत्तर क्षेत्र शिशुवाटिका विभाग की संयोजिका है।)

और पढ़ें : शिशु शिक्षा 21 (जन्म से एक वर्ष के शिशुओं की माताओं का शिक्षण-1)

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