गाँधी जी की बुनियादी शिक्षा की वर्तमान में प्रासंगिकता 


  –  डॉ० कुलदीप मेहंदीरत्ता

‘आने वाली नस्लें शायद ही यकीन करे कि हाड़-मांस से बना हुआ कोई ऐसा व्यक्ति भी इस धरती पर चलता-फिरता था।’

महात्मा गांधी के बारे में महान वैज्ञानिक अलबर्ट आइंस्टीन के विचार

विश्व के सबसे बुद्धिमान व्यक्ति माने जाने वाले महान वैज्ञानिक अलबर्ट आइंस्टीन के महात्मा गाँधी के बारे में कहे गये ये शब्द महात्मा गाँधी के व्यक्तित्व का परिचय कराने के लिए पर्याप्त हैं। महात्मा गाँधी को विश्व के सबसे प्रभावशाली नेताओं में गिना जाता है। अपने जीवन काल में उन्होंने मानव समाज के जीवन के विभिन्न पहलुओं पर विस्तार से लिखा। महात्मा गाँधी के ये विचार 97 खंडों में संकलित किये गये हैं। राजनीतिक व्यस्तता के बावजूद महात्मा गाँधी द्वारा इतनी भारी मात्रा में स्तरीय लेखन उनकी मानसिक-बौद्धिक क्षमता को दर्शाता है। मानव, समाज, देश और विश्व के सन्दर्भ में गाँधी जी ने समय समय पर अपने विचारों को प्रकट किया। समाज की विभिन्न समस्याओं, आवश्यकताओं और अपेक्षाओं पर उनका चिंतन महत्त्वपूर्ण है।

शिक्षा में आमूलचूल परिवर्तन के उद्देश्य को लेकर गाँधी जी ने आधुनिक भारत के लिए ‘शिक्षा की वर्धा योजना’ या अपनी ‘बेसिक शिक्षा’ की योजना प्रस्तुत की थी, जिसे बोलचाल की भाषा में बुनियादी शिक्षा भी कहा जाता है। अगर इसे आधुनिक युग में भारत की राष्ट्रीय शिक्षा प्रणाली का पहला ब्लू प्रिंट कहा जाये तो गलत नहीं होगा। वास्तव में एक बुद्धिजीवी विचारक के रूप में उनका अनुभव था कि ब्रिटिश प्रणाली भारत की सामाजिक-आर्थिक सरंचना के अनुरूप नहीं है। क्योंकि ब्रिटिश अथवा पाश्चात्य शिक्षा प्रणाली न केवल रोजगार की दृष्टि से भारत की विशाल जनसंख्या के अनुकूल नहीं थी, बल्कि सांस्कृतिक दृष्टि से भारतीयों को भारत से अलग कर उन्हें काले अंग्रेजों में परिवर्तित कर रही थी। ऐसे वातावरण में गाँधी जी ने बुनियादी शिक्षा का सिद्धांत दिया। यह सिद्धांत एक भारतीय द्वारा, भारतीयों के लिए, भारत और भारतीयों को केंद्र में रखते हुए दिया गया था। देश के कल्याण और सामाजिक-आर्थिक चुनौतियों को लेकर उन्होंने ‘वर्धा शिक्षा योजना’ का निर्माण किया। सन् 1937 में गांधीजी ने वर्धा में हो रहे ‘अखिल भारतीय राष्ट्रीय शिक्षा सम्मेलन’ जिसे ‘वर्धा शिक्षा सम्मेलन’ कहा गया था। उसमें अपनी बेसिक शिक्षा की नयी योजना को प्रस्तुत किया।

बुनियादी शिक्षा का सिद्धांत भारत जैसे विकासशील देश में शिक्षार्थियों को शिक्षा प्राप्त करने के साथ-साथ कुछ धनोपार्जन का भी उद्देश्य रखता है। एक युगदृष्ट शिक्षाविद के रूप में गाँधी जी ने भारत की जनसंख्या की तात्कालिक और भविष्य की स्थिति को समझा और उसी अनुरूप शिक्षा के साथ-साथ विद्यार्थी को व्यावसायिक कौशल सिखाने का विचार प्रस्तुत किया। गाँधी जी भली भांति इस बात से परिचित थे कि प्रत्येक हाथ को काम और प्रत्येक पेट को अन्न तभी मिल सकता है जब सब लोग किसी न किसी कौशल को विकसित कर काम करेंगे। गाँधी जी ने इसीलिए मशीन आधारित उत्पादन तथा औद्योगिकीकरण का विरोध किया क्योंकि इससे लोगों का रोजगार छिन जाता। आज के समय में जिस earn while learn योजना को प्रगतिशील, व्यावहारिक और विकसनशील शिक्षा की प्रवृति माना जाता है, उसके बीज महात्मा गाँधी की वर्धा योजना में निहित हैं। उनका विचार था कि शिक्षा बालकों के जीवन, घर, ग्राम, लघु कुटीर उद्योगों, हस्तशिल्पों और व्यवसाय से एकाकार हो।

आत्मनिर्भर बनना हमारा उद्देश्य नहीं, बल्कि कर्तव्य है। यह दृष्टि गाँधी जी की बुनियादी शिक्षा का महत्वपूर्ण तत्त्व है। प्रत्येक विद्यार्थी कल का नागरिक है, उसे दूसरों पर या सरकार पर आश्रित होने की बजाये आत्मनिर्भर होना चाहिए। वर्तमान में अगर देखा जाये तो हमारे युवा वर्ग के समक्ष जहाँ एक ओर रोजगार का संकट है वहीं दूसरी ओर रोजगार के लिए सरकार की ओर निरंतर देखते रहना उसकी मानो नियति बन गया है। वास्तव में अगर देखा जाये तो जनसंख्या के लगभग तीन प्रतिशत से ऊपर सरकारी नौकरी नहीं है। गाँधी जी ने एक भविष्यदृष्टा की भांति इस समस्या को न केवल पहचाना बल्कि इसके समाधान के सूत्र भी प्रस्तुत किये। स्वरोजगार का सूत्र उनकी बुनियादी शिक्षा का मूल सिद्धांत है। देश के वर्तमान प्रधानमन्त्री का स्वरोजगार और आत्मनिर्भर भारत के लिए आह्वान निश्चित ही गाँधी जी के विचारों की प्रतिध्वनि है।

‘श्रम में शर्म नहीं’ तथा प्रत्येक श्रम का सामजिक सम्मान भी गाँधी जी की बुनियादी शिक्षा में निहित एक अत्यंत महत्वपूर्ण पक्ष है। यह हमारे समाज का दुर्भाग्य रहा है कि इसमें एक गलत सामाजिक मनोवृति का विकास हो गया कि कुछ कार्य निकृष्ट हैं और कई कार्य उत्तम। हमारे समाज की विडम्बना है किसी रोजगार को छोटा समझा जाता है और किसी काम को बड़ा। गाँधी जी ने इस बात का प्रयास किया कि विद्यार्थी किसी काम को छोटा या बड़ा न समझें। बल्कि विद्यार्थी न केवल प्रत्येक कार्य की उपयोगिता समझें, बल्कि प्रत्येक काम को समान समझें और सम्मान दें। बुनियादी शिक्षा में प्रत्येक विद्यार्थी के लिए शारीरिक श्रम अनिवार्य था, ताकि विद्यार्थी श्रमवान बने, स्वस्थ रहे और समाज के श्रमिक वर्ग का पर्याप्त सम्मान करना भी सीखें।

मातृभाषा में शिक्षा उनकी बुनियादी शिक्षा का अभिन्न अंग है। वर्तमान में विश्व के प्राय: सभी देश अपनी- अपनी मातृभाषा में ही शिक्षा दे रहे हैं। मातृभाषा किसी देश के मूल्यों और संस्कारों की वाहक होती है। गाँधी जी इस बात को अच्छी तरह समझते थे कि मातृभाषा से विद्यार्थी न केवल बढ़िया तरीके से समझ पायेगा बल्कि मातृभाषा में निहित सामाजिक और आध्यात्मिक मूल्य भी विद्यार्थी जीवन का अभिन्न भाग बन जायेंगे। इसलिए महात्मा गाँधी जी मातृभाषा में शिक्षा दिए जाने के प्रति अनन्य आग्रही थे। उनका विचार था कि 7 से 14 वर्ष के बालकों एवं बालिकाओं को निःशुल्क एवं अनिवार्य शिक्षा दी जाए जिसमें शिक्षा का माध्यम मातृभाषा हो। हिंदी भाषा का अध्ययन बालकों तथा बालिकाओं के लिए अनिवार्य है।

बुनियादी शिक्षा के पाठ्क्रम को गाँधी जी ने प्रत्येक समुदाय की आवश्यकताओं के आधार पर निर्मित किया। स्थानीय परिस्थितियों, अपेक्षाओं और आवश्यकताओं के आधार पर शिक्षा में स्थानीय तत्वों को सम्मिलित किये जाने पर उन्होंने बल दिया। बुनियादी शिक्षा के पाठ्यक्रम में उन्होंने स्थानीय आवश्यकतानुसार आधारभूत शिल्प जैसे- खादी, कताई-बुनाई, कृषि कार्य, लकड़ी के काम, मिट्टी का काम, मछली पालन, फल व सब्जी की बागवानी आदि का प्रावधान किया। वहीं गाँधी जी ने बालिका शिक्षा में गृहविज्ञान तथा स्थानीय एवं भौगोलिक आवश्यकताओं के अनुकूल शिक्षाप्रद हस्तशिल्प का प्रावधान किया।

शिक्षण विधि को व्यावहारिक क्रिया-कलापों और अनुभव आधारित होना चाहिए। गाँधी जी इस बात के आग्रही थे कि शिक्षा को यथासम्भव व्यावहारिक क्रिया-कलापों और अनुभव आधारित होना चाहिए। क्योंकि शिक्षा जितनी अधिक क्रिया-कलाप तथा व्यावहारिक अनुभव पर आधारित होगी, विद्यार्थी उतना शीघ्र सीखेंगे। केवल यही नहीं, विद्यार्थियों का अधिगम न केवल मात्रा में अधिक होगा बल्कि स्थायी तथा दीर्घकालिक भी होगा। इसके साथ- साथ गाँधी जी ने बुनियादी शिक्षा में मातृभाषा, गणित, सामाजिक अध्ययन एवं सामान्य विज्ञान, कला, हिंदी, शारीरिक शिक्षा आदि का प्रावधान रखा।


गाँधी जी शिक्षा के उद्देश्य में विद्यार्थी के नैतिक और आध्यात्मिक विकास को शामिल करते हैं। गाँधी जी के नाम के साथ महात्मा शब्द का जुड़ाव उनके गुणों, व्यक्त्तित्व और जीवन शैली के कारण हुआ। गाँधी जी न केवल सत्य और अहिंसा के स्वयं अन्वेषी थे बल्कि आध्यात्मिक रूप से भारत का उन्नयन उनकी दृष्टि में वांछनीय था। यह एक विडम्बना है कि मैकालेवादी शिक्षा ने हमारे बुद्धिजीवी वर्ग के बहुत बड़े भाग के दिमाग में यह अवधारणा बिठा दी है कि नैतिक मूल्यों को सिखाया नहीं जा सकता। लेकिन सत्य यह है कि बहुत से शिक्षकों के आचरण ने ही विद्यार्थियों का जीवन बदल कर रख दिया। गाँधी जी ने भारत और भारतीयों के आध्यात्मिक उत्थान के लिए नैतिक मूल्यों को बुनियादी शिक्षा का अनिवार्य अंग माना।

इस प्रकार गाँधी जी ने वास्तविक युगदृष्टा के रूप में भारत की आनेवाली समस्याओं को पहचान लिया था। समान शिक्षा, समानता के लिए शिक्षा, सामाजिक समरसता, नैतिक और अध्यात्मिक उन्नयन के माध्यम से विद्यार्थी के सम्पूर्ण चरित्र और व्यक्तित्व विकास का लक्ष्य, हर पेट को रोटी और हर हाथ को काम, सबको व्यवसायिक कौशल सिखा कर आत्मनिर्भर नागरिक निर्माण से आत्मनिर्भर भारत के निर्माण का प्रयास, हमारे भारत के इक्कीसवीं सदी के लक्ष्य हैं। इन सबकी प्रस्तावना गाँधी जी की बुनियादी शिक्षा में है, आवश्यकता है तो इस बात की, कि गाँधी जी को केवल राजनीति करने का विषय न बनाकर जीवन दर्शन के रूप में और व्यावहारिक रूप से अपनाया जाए,तभी भारत को जगद्गुरु और आत्मनिर्भर बनाने का लक्ष्य प्राप्त हो सकेगा।

(लेख शिक्षाविद है और चौ० बंसीलाल विश्वविद्यालय भिवानी (हरियाणा) में सहायक प्रोफेसर है।)

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