दीनदयाल उपाध्याय की विचार-दृष्टि और दर्शन – 4

 – डॉ. अनिल दत्त मिश्र

उपाध्याय जी का एकात्म मानव दर्शन आज समय की आवश्यकता है और यह दर्शन न केवल भारत का मार्गदर्शन करने में सक्षम है बल्कि समस्त पाश्चात्य समाज और विश्व को भी नई दिशा दिखाने में समर्थ है। अगर हम एकात्म मानववाद के आधार पर चलें तो भारतीय संस्कृति के शाश्वत मूल्यों के साथ राष्ट्रीयता, प्रजातंत्र, समता और विश्व-एकता के आदर्शों को एक समन्वित रूप से एकीकृत कर सकेंगे। इनके बीच विद्यमान अंतर्निहित विरोध समाप्त होकर ये तत्व परस्पर पूरक की भूमिका निभाएंगे। इस प्रकार मानव अपनी खोई हुई प्रतिष्ठा और जीवन का उद्देश्य को प्राप्त कर सकेगा।

एकात्म मानववाद के माध्यम से राष्ट्र को सबल, समृद्ध और सुखी बनाने का संकल्प लेकर चलना होगा। हमारा ध्येय संस्कृति का संरक्षण नहीं, अपितु उसे गति देकर सजीव, सक्षम और समर्थ बनाने का होना चाहिए। इस दृष्टि से हमें अनेक रूढ़ियाँ खत्म करनी होगी, बहुत से सुधार करने होंगे, जो मानव का विकास और राष्ट्र की एकात्मता की वृद्धि में पोषक हो और जो भी इस ध्येय में बाधक तत्व हो, उसे हटा दिया जाए। कहने का तात्पर्य यह है कि ईश्वर ने जैसा शरीर दिया है, उसमें मीन-मेख निकालकर अथवा आत्मग्लानि लेकर चलने की आवश्यकता नहीं है। पर शरीर में फोड़ा होने पर उसका ऑपरेशन तो आवश्यक है। सजीव और स्वस्थ अंगों को काटने की जरूरत नहीं है। आज यदि समाज में छुआछूत और भेदभाव घर कर गए हैं, जिनके कारण लोग मानव को मानव समझकर नहीं चलते और जो राष्ट्र की एकता के लिए घातक सिद्ध हो रहे हैं, उन्हें खत्म करना हमारी प्राथमिकताओं में है।

हमें ऐसी संस्थाओं का निर्माण करना होगा, जो हमारे अंदर कर्म-चेतना पैदा करें, हम स्व-केंद्रित एवं स्वार्थी बनने के स्थान पर राष्ट्रसेवी बनें, अपने बंधुओं के प्रति केवल सहानुभूति पूर्ण दृष्टिकोण ही नहीं रखें, अपितु उनके प्रति आत्मीयता और प्रेम भाव पैदा करें। जो हम से छूट गये हैं उनका हाथ पकड़ उन्हें समाज की मुख्य धारा में लायें। इस प्रकार से हम समतामूलक समाज का निर्माण कर सकते हैं। सुलभ इसका जीता-जागता उदाहरण है। सुलभ-संस्थापक डॉ. विन्देश्वर पाठक ने पंडित दीनदयाल उपाध्याय के दर्शन को व्यवहारिकता के धरातल पर उतारा तथा यह सिद्ध कर दिया कि एकात्म मानववाद सिर्फ कोरी कल्पना ही नहीं, बल्कि प्राप्त की जा सकने वाली सच्चाई है। अलवर, टोंक और वृंदावन के प्रयोगों ने समाज में एक नई अलख जगाई है। सुलभ ने एक नए प्रकार का आंदोलन प्रारंभ कर सामाजिक कुरीतियों को जड़ से मिटाने का प्रयास किया है भविष्य में जब भी निष्पक्ष इतिहास लेखन होगा, सुलभ और इसके संस्थापक डॉ. विन्देश्वर पाठक का नाम स्वर्णक्षरों में लिखा जाएगा।

(प्रसिद्ध गांधीवादी विचारक, ‘दीन दयाल उपाध्याय : एक अध्ययन’ के लेखक एवं सुलभ इंडिया के संपादक है।)

Facebook Comments

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *