दीनदयाल उपाध्याय की विचार-दृष्टि और दर्शन – 3

 – डॉ. अनिल दत्त मिश्र

भारतीय राज्य का आदर्श धर्मराज्य रहा है। धर्मराज्य से अर्थ कोई मजहबी राज्य नहीं हैं बल्कि यह एक असांप्रदायिक राज्य है । सभी पंथों और उपासना पद्धतियों के प्रति सहिष्णुता एवं समादर का भाव भारतीय राज्य का आवश्यक गुण है। अपनी श्रद्धा और अंत:करण की प्रवृत्ति के अनुसार प्रत्येक नागरिक को उपासना का अक्षुण्ण अधिकार है। राज्य के संचालन अथवा नीति निर्देशन में किसी भी व्यक्ति के साथ मत या संप्रदाय के आधार पर भेदभाव नहीं हो सकता, यही वास्तविक धर्म आधारित राज्य है। यह धर्मराज्य किसी व्यक्ति को अथवा संस्था को सर्वसत्ता- संपन्न नहीं मानता, इसमें प्रत्येक व्यक्ति नियमों और कर्तव्य से बंधा हुआ है। कार्यपालिका, विधायिका और जनता सबके अधिकार धर्माधीन ही है। अंग्रेजी की विधि के अनुसार शासन धर्मराज्य की कल्पना को व्यक्त करने वाला निकटतम शब्द है। निरकुंश और अधिनायकवादी प्रवृत्तियों को रोकने तथा लोकतंत्र को स्वच्छंदता में विकृत होने से बचाने में धर्मराज्य ही समर्थ है। राज्य की अन्य कल्पनाएं अधिकारमूलक है, किंतु धर्मराज्य में कर्तव्यभाव प्रधान है। भारतीय संस्कृति के प्रति निष्ठा लेकर चलने वाले भी कुछ पक्ष है। किंतु वे भारतीय संस्कृति की समानता को उसकी गतिहीनता समझ बैठे हैं और इसलिए बीते युग की पीढ़ियों अथवा यथास्थिति का समर्थन करते हैं। संस्कृति के क्रांतिकारी तत्व की ओर उनकी दृष्टि नहीं जाती।

वास्तव में समाज में प्रचलित अनेक कुरीतियां जैसे- छुआछूत, जाति-भेद, दहेज-प्रथा, मृत्यु-भोज, नारी-अवमानना इत्यादि तथा जमींदारी, जागीरदारी आदि व्यवस्थाएं भारतीय संस्कृति और समाज के स्वास्थ्य की सूचक नहीं, बल्कि रोग के लक्षण हैं। जातिगत भेदभाव जैसी प्रवृत्तियां तो व्यावसायिक श्रम विभाजन की परिस्थितियों में परिवर्तन के बाद भी चलती रहने पर रूढ़ियाँ बन जाती हैं। भारत के अनेक महापुरुष, जिनकी भारतीय परंपरा और संस्कृति के प्रति अनन्य निष्ठा थी, वे सब इन बुराइयों के विरुद्ध लड़े। अनेक अनुपयुक्त आर्थिक और सामाजिक विचारों का विश्लेष्ण किया जाये तो पाएंगे कि हमारी संस्कृति चेतना के क्षीण होने के कारण ये रूढ़ियाँ किसी विशेष आवश्यकता की पूर्ति के लिए उपाय अथवा विदेशियों द्वारा थोपी गई व्यवस्थाएं मात्र थी। भारतीय संस्कृति के नाम पर उन्हें जीवित रखना अपने निहित स्वार्थों की रक्षा के लिए हास्यास्पद प्रयत्न मात्र हैं।

संस्कृति का स्वरूप इतिहास से भिन्न है। हमारे दैनिक जीवन में अनेक अच्छी-बुरी बातें घटती हैं। जो अच्छा है, उसका पुरस्कार करना तथा शेष का परिष्कार अथवा तिरस्कार ही संस्कृति को सुसंस्कृत बनाता है। फिर भी सामाजिक जीवन की विसंगतियां, हिंदू दर्शन अथवा संस्कृति की विसंगतियां नहीं है, यह अच्छी तरह से समझना चाहिए। संस्कृति के रूपों और तत्वों में भेद करना आवश्यक है। कभी-कभी ऐसा प्रतीत होता है कि इस युग प्रवाह में हिंदू-जीवन-दर्शन और भारतीय संस्कृतिक परंपरा के कुछ अंग अर्थहीन और अनावश्यक हो गए हैं। आज के बदले हुए संदर्भों में रूपों का मोह नहीं करना चाहिए। हमें अपनी दृष्टि तत्वों की ओर केंद्रित करनी चाहिए।

कई लोग हमारा एक हजार वर्षों का गत इतिहास विदेशियों की विजय का और भारत की पराजय का इतिहास मानते हैं और यह परंपरागत हिंदू जीवन-दर्शन स्वाधीनता और राष्ट्रीय अखंडता की रक्षा के लिए असमर्थ है, ऐसा उनका दावा रहा है। परंतु एक हजार वर्षों का इतिहास केवल विदेशियों की विजय और हमारी पराजय का नहीं, अपितु प्रत्येक क्षेत्र में हमारे द्वारा किए गए सबल प्रतिरोध और अनेक बार विजय का भी रहा है। राजनीतिक पराजय को ही हम सबकुछ मानकर न चलें। हमारे जीवन दर्शन ने हमें सतत संघर्ष की प्रेरणा और क्षमता प्रदान की है। फिर भी जो कमी रही है, उसकी ओर आंखें मूंदने की आवश्यकता नहीं। भारत में एक सुदृढ़ केंद्रीय शक्ति की कमी से हम राजनीतिक दृष्टि से पराधीन हुए, इसकी ओर हमें ध्यान देना होगा।

हमारी संपूर्ण व्यवस्था का केंद्र मानव होना चाहिए, जो ‘यत् पिंडे तत् ब्रह्मांडे’ के न्याय के अनुसार, समष्टि का जीवमान् प्रतिनिधि एवं उसका उपकरण है। भौतिक उपकरण वास्तव में मानव के सुख के साधन नहीं हैं। जिस व्यवस्था में शरीर-मन-बुद्धि आत्मा-युक्त और अनेक इच्छाओं से प्रेरित पुरुषार्थी मानव के स्थान पर एकांगी मानव का ही विचार किया गया हो, यह अधूरी है। हमारा आधार एकात्म मानव है, जो अनेक एकात्म समष्टियों का एक साथ प्रतिनिधित्व करने की क्षमता रखता है। मानवतावाद या एकात्मवाद अथवा एकात्म मानवतावाद के आधार पर हमें संपूर्ण व्यवस्था का विकास करना होगा।

यूरोप के विचारकों तथा मानवेंद्रनाथ राय ने भी मानवतावाद का पुरस्कार किया है, किंतु उनका विचार भारतीय संस्कृति के चिंतन से अनुप्राणित ना होने के कारण मूलतः भौतिकवादी है मानव के नैतिक स्वरूप अथवा व्यवहार के लिए वे कोई तात्विक विवेचन प्रस्तुत नहीं कर पाते। आध्यात्मिकता को अमान्य कर मानव तथा मानव-समाज के संबंधों और व्यवहार की संगति नहीं बिठाई जा सकती। यह आवश्यक नहीं कि हम पाश्चात्य-जगत के ज्ञान से आंख मूंद लें। किंतु विचारों के क्षेत्र में यह स्पष्ट है कि एकात्म मानव विचार भारतीय और भारत-ब्राह्म सभी चिंतन धाराओं का सम्यक् आकलन करके चलता है, उनकी शक्ति और दुर्बलता को प्रखरता है और ऐसा मार्ग प्रशस्त करता है, जो मानव की अब-तक के उसके चिंतन-अनुभव और उपलब्धि से आगे बढ़ा सकेगा।

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