राष्ट्र निर्माण में शिक्षक की भूमिका

– दिलीप बेतकेकर

कार्य सभी महत्वपूर्ण तथा मूल्यवान ही होते हैं, कोई भी कार्य निम्न स्तर का नहीं। फिर भी शिक्षक का कार्य अनोखा है। चीनी भाषा की एक कहावत है, जिसका अर्थ है, “आपको यदि एक दो साल के लिये व्यवस्था करनी है तो अनाज बीज दो, दस-पन्द्रह साल की व्यवस्था बनानी है तो वृक्षारोपण करो। किन्तु यदि सौ वर्ष की व्यवस्था करनी है तो मनुष्य की निर्मित करो।” कितनी अर्थपूर्ण है कहावत।

‘मनुष्य’ निर्मिति का कार्य शिक्षक करता है। उसे करना चाहिए ऐसी अपेक्षा की जाती है। “भारत के भविष्य का निर्माण कक्षाओं में आकार ले रहा है” इस आशय का मौलिक विधान, जिम्मेदारी और संज्ञान लेते हुए, ‘कोठारी शिक्षा आयोग’ द्वारा किया गया है। देशभर के हज़ारों विद्यालय, महाविद्यालय के शिक्षार्थी कल के उज्ज्वल भारत के निर्माता होने चाहिये, ऐसी आशा-अपेक्षा सभी शिक्षा आयोगों द्वारा की गई है।

पूर्व राष्ट्रपति डॉ॰ कलाम की अपेक्षा थी कि सभी विद्यार्थी विकसित भारत का स्वप्न देखें। दिवास्वप्न नहीं, कवि कल्पना नहीं, वरन् एक शास्त्राज्ञ का स्वप्न। इसे साकार करना होगा। ‘भारत 2020’ नामक ग्रंथ में उन्होंने, अत्यंत तर्कयुक्त पद्धति से, ‘विकसित भारत’ निर्मित होने हेतु अपने पास उपलब्ध साधन सामग्री, मानवशक्ति, नैसर्गिक संपत्ति आदि का किस प्रकार उपयोग करें इस विषय पर विस्तृत चर्चा की है।

सभी उपलब्ध संपत्तियों में प्रथम स्थान है ‘मानवशक्ति’ का। विशेषकर ‘युवाशक्ति’ को देश का महत्वपूर्ण और लाभकारी अंग माना गया है। इस शक्ति का द्विधारी तलवार के समान उपयोग हो सकता है। ये शक्ति नक्सलवाद आत्मसात कर विध्वंसक बन सकती है, या आज के चलनानुसार भोग-विलासवादी प्रवृत्ति का शिकार होकर नष्ट हो सकती है, और यही शक्ति अपने बुद्धि-कौशल्य और जीवन-मूल्यों के सहारे भारत को अधिक बलशाली बना सकती है।

यह युवाशक्ति अनुपयोगी नहीं है। उस शक्ति का सदुपयोग होना और इस हेतु जो भी करने योग्य हो उसे करने को तैयार रहना, इस जिम्मेदारी को निर्वहन करने हेतु ईश्वर ने शिक्षक को कार्य सौंप दिया है। परमेश्वर द्वारा सौंपी गई है, इसीलिये यह भूमिका श्रद्धापूर्वक, भक्तिपूर्वक, निष्ठा से, आखिरी पल तक निभाने हेतु हम शिक्षक तैयार हैं अथवा नहीं यह महत्वपूर्ण प्रश्न है।

 ‘भारत 2020’ में डॉक्टर कलाम शिक्षकों के लिये कहते हैं –

“आप शिक्षक हैं इसलिये भावी पीढ़ियों को अच्छे से गढ़ने की महत्वपूर्ण और कठिन जिम्मेदारी आपकी है यह ध्यान रखें। कुछ समय पूर्व हमारे समाज में शिक्षक वंदनीय समझे जाते थे। दुर्भाग्य से वर्तमान में स्थिति में परिवर्तन आया है। शिक्षक को महत्वहीन समझा जा रहा है। अत्यंत विचित्र सी परिस्थिति में उन्हें अपने कार्य करने पड़ रहे हैं। हमें इस बात की कल्पना है। शिक्षकों की समस्याएं हल होनी चाहिए। फिर भी हम शिक्षकों को विनयपूर्वक दो बातें बताने के इच्छुक हैं। एक, अपने विद्यार्थियों के मन पर विकसित भारत का चित्र अंकित करें और दूसरा यह कि अपने ज्ञान भंडार को शिक्षक अद्यतन तथा परिपूर्ण रखें। आपकी प्रतिभा आपके विद्यार्थियों में सही अंकित होती है। इसलिये आपका ज्ञान अद्यतन, तब आपके विद्यार्थियों का ज्ञान भी अद्यतन, ये ध्यान रखें – आपका ज्ञान विद्यार्थियों तक पहुंचाएं, किन्तु अपने किसी नैराश्य की छाया उन पर न पड़े इस बात का ध्यान रखें। बच्चों को भव्य-दिव्य विचार मन में लाने और अच्छे स्वप्न देखने की आदत डालें। अपने पास के हुनर और कुशलता को सदैव आधुनिक रखने के लिये उन्हें प्रेरित करें।”

शिक्षकों के लिए डॉ॰ कलाम की एक और विनती –

“प्रत्येक माह में से कुछ दिन सुरक्षित रखें उन कामों के लिये जो रोजमर्रा के कामों से भिन्न हों और कुछ अन्य प्रकार के हों। कुछ ऐसे कार्य करें जिससे समाज का भला हो, गरीबों का दुःखहरण हो, और जिनसे स्वयं को संतोष हो, जिस कार्य के लिये गर्व की अनुभूति हो।”

केवल पाठ्यक्रम पूर्ण करके परीक्षा हेतु विद्यार्थी को तैयार कर अपना कार्य समाप्त हो गया ऐसा शिक्षक को नहीं समझना चाहिए। आजकल के माता-पिता-पालक बच्चे के कैरियर का ही विचार करते हैं। बच्चे के समक्ष डॉलर दिखने लगते हैं। केवल बुद्धि को ही केन्द्र बिन्दु मानकर न चलें, उसकी भावनाओं की ओर भी ध्यान दें। ‘बुद्धिमत्ता गुणांक’ (I.Q.) का जमाना अब पीछे छूट गया है, अब भावनात्मकता (E.Q.) को भी नज़र अंदाज नहीं कर सकते। इसलिये शिक्षक को भी इस ओर ध्यान देना आवश्यक है।

युवाओं के लिये अनेक अवसर दिखते हैं परन्तु उन अवसरों का सही उपयोग करने हेतु दो महत्वपूर्ण बातों पर ध्यान रखना आवश्यक है। प्रथम तो वह अवसर कैसा है यह देखना, उसको अच्छे से जानना। किसी अवसर के सम्बन्ध में स्पष्ट रूप से जानकारी न होने से गलत निर्णय होने की संभावना रहती है। केवल आंख से दिखना पर्याप्त नहीं है, पैनी दृष्टि से अवसर को परखना चाहिये। यह दृष्टि विकसित करने का कार्य शिक्षक कर सकता है। दूसरी बात अवसर प्राप्त होने पर धैर्य और साहस के साथ उस अवसर का उपयोग कर लेना चाहिये। इस हेतु जुझारू प्रवृत्ति होना आवश्यक है। अवसर तो पर्याप्त मिलेंगे, किन्तु जुझारू प्रवृत्ति हो तब अवसर का सही उपयोग हो पायेगा, अन्यथा अवसर मिलने पर भी निष्फल रहेगा।

बदलती जीवन शैली के कारण, भोग-विलासी संस्कृति के कारण, आज समाज में अनेक समस्याएं निर्मित हुई हैं। रोज समाचार पत्रों में पढ़ने को मिलता है। व्यसनाधीनता में वृद्धि हो रही है। देश सम्पन्न हुआ, बलशाली हुआ, किन्तु सामाजिक स्वास्थ्य में गिरावट हुई तो ये संपन्नता अधिक समय तक टिकने वाली नहीं। इसलिये अनेक विकसित देशों की स्थिति देखते हुए हमें भी सावधान रहकर उपाय योजना समय रहते करना चाहिये। बढ़ती व्यसनाधीनता और भोगविलासी प्रवृत्ति के चंगुल में युवाशक्ति न फंसे इस हेतु शिक्षक को उन्हें जागृत करने की भूमिका निभानी पड़ेगी। सामाजिक आरोग्य के रक्षक के रूप में शिक्षक को ही आगे आना पड़ेगा।

शिक्षक को तीन के प्रति प्रतिबद्धताओं का पालन करना पड़ता है –

(1) विद्यार्थी, (2) ज्ञान, (3) समाज। आचार्य विनोबा जी ने सुंदर शब्दों में कहा है – “विद्यार्थी शिक्षक परायण हों, शिक्षक विद्यार्थी परायण हों, दोनों ज्ञान परायण हों, और ज्ञान सेवा परायण हो।”

‘शिक्षक विद्यार्थी परायण हों’, अर्थात् शिक्षक का विद्यार्थी से स्वयं के पुत्र समान प्रेम रहे। वह केवल शिष्यों को पढ़ाने वाला शिक्षक न रहे। उसे विद्यार्थी का शिक्षक होना चाहिये। दोनों को ही ज्ञान पिपासु होना चाहिये। ध्यान ये रहे कि शिक्षक को भी निरंतर अध्ययनरत रहना आवश्यक है। बीस-पच्चीस साल पूर्व प्राप्त उपाधि से संतुष्ट न रहते हुए नया-नया ज्ञान प्राप्त करते रहना चाहिये। शिक्षक को सदैव ‘Update’ और ‘Upgrade’ शब्द आंखों के समक्ष रखने होंगे। जो कुछ पढ़ना था वह दस-पन्द्रह वर्ष पूर्व पढ़ लिया, अब क्या पढ़ें? इस प्रकार की उदासीन, पराभूत, पलायनवादी, नकारात्मक प्रवृत्ति को छोड़ना पड़ेगा।

ये सब ज्ञान प्राप्ति किसलिये? स्वयं के विकास और उन्नति के लिये तो है ही, परन्तु ये ज्ञान समाज के लिये, राष्ट्र के लिये भी उपयोग करना आवश्यक है। इस प्रकार का समाज के लिये कर्तव्य बोध स्वयं के साथ विद्यार्थी में भी अंकुरित करें, ये शिक्षक का कर्तव्य है।

भारतीय समाज को प्रबुद्ध समाज के रूप में देखा जाता है। यहां की बौद्धिक संपदा दुनिया के किसी भी देश की अपेक्षा कम नहीं है। डॉ॰ माशेलकर, डॉ॰ गोवारीकर, डॉ॰ काकोडकर, डॉ॰ विजय भाटकर आदि बुद्धिमान व्यक्ति हैं और सकारात्मक दृष्टि के धनी स्वयं तो सक्रिय हैं ही और अन्य को भी प्रेरणा देते हैं। ये सभी जो भी बात अच्छी हो उसकी जानकारी प्राप्त कर देश की प्रगति के लिये उसका कैसे उपयोग किया जा सकेगा उन बिन्दुओं पर गंभीरता से अध्ययन करते हैं।

अपने शास्त्राज्ञ, तंत्राज्ञ, ध्येयपूर्वक बहुत कार्य करते हैं। इन्हें जिस प्रकार के युवा, मानवशक्ति चाहिए तदनुसार उन्हें तैयार कर देने का कार्य शिक्षक को करना चाहिये। जरूरी नहीं कि सभी शिक्षक वुफशल और तज्ञ होंगे ही। किन्तु बढ़ती उम्र के साथ विद्यार्थी के पास विविध क्षेत्रों में पदार्पण करते हुए कुछ कौशल्य और जीवन-मूल्य भी हों जिनके द्वारा उच्च स्तर के शास्त्राज्ञ और तंत्राज्ञों को सहारा मिल सके। अतः ऐसा कार्य तो प्राथमिक, माध्यमिक और उच्चतर माध्यमिक विद्यालय स्तर तक के शिक्षकों को करना चाहिए।

अन्य किसी कार्य की अपेक्षा मानसिकता से सम्बन्धित कार्य करना अधिक कठिन और महत्वपूर्ण है। सवा सौ करोड़ देशवासी होते हुए भी अपेक्षा अनुसार मानवशक्ति उपलब्ध नहीं है यह यथार्थ है। स्वामी विवेकानन्द ने कहा था, ‘यदि हमें सौ युवक मिल जायें तो देश के चित्र को सुंदर रूप में परिवर्तित कर दिखाऊंगा’ अर्थात् जिस प्रकार के मनुष्य आवश्यक हैं उतनी संख्या में उपलब्ध नहीं होते हैं। इसीलिये ऐसे व्यक्तियों का गढ़न करना आवश्यक है। डॉ॰ कलाम द्वारा वर्णित ‘विकसित भारत’ के स्वप्न को साकार करने हेतु ऐसे मेहनती, जुझारू, देश को ही ईश्वर मानने वाले, राष्ट्रभक्त नवयुवकों की आवश्यकता है और इस प्रकार के युवकों का गढ़न कारखाने में नहीं, वरन् विद्यालयों की कक्षाओं में होता है और उनका गढ़न करने वाला होता है ‘शिक्षक’, एक श्रेष्ठ शिल्पकार।

शिक्षक अपने आपको दीन न समझे। स्वयं को देखते हुए, “Blessed is he who has found his work” ऐसी स्वानंदी भावना से देखें और राष्ट्रनिर्माण के पुनीत कार्य के लिये परमेश्वर ने हमें शिक्षक बनने का अवसर दिया है इसको कृतज्ञतापूर्वक स्वीकार करें।

(लेखक शिक्षाविद, स्वतंत्र लेखक, चिन्तक व विचारक है।)

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