नवरात्र और भारतीय ज्ञान परंपरा-४

॥ॐ महादेव्यै नमः॥

भारत में अध्यात्म ज्ञान को विद्या का आधार कहा गया है और आध्यात्मिक भाव के जागरण को ही विद्या का अंतिम निकष माना गया है।

अध्यात्म की सरलतम व्याख्या है, सर्वत्र ईश्वर की उपस्थिति की अनुभूति और उस विश्वास के परिणमस्वरूप जीवन में तामसिक आचरण का परित्यागऔर दैवीय गुणों का विकास। आद्य शंकराचार्य ने कहा, “विद्या फलं स्यात् असतोनिवृत्ति:”।

ज्ञानार्जन के करणों की सक्रियता भी बिना दैवीय शक्तियों की कृपा हुए संभव नहीं होती। नवरात्र में माँ भगवती के साधक जिन स्तोत्रों का पाठ करते हैं, उनमें भी मनुष्य के ज्ञानार्जन के करणों के संरक्षण की प्रार्थना की जाती है। श्रीदेव्या: कवचम् में ज्ञानेंद्रियों से जिनकी अनुभूतियां अर्जित की जाती हैं, उन तन्मात्राओं तथा उनसे उत्पन्न होने वाले सत्-रजस्-तमस् गुणों की रक्षा की प्रार्थना की गई है –

रसे रूपे च गन्धे च शब्दे स्पर्शे च योगिनी।सत्त्वं रजस्तमश्चैव रक्षेन्नारायणी सदा॥ ३८॥

जिव्हा से प्राप्त रस या स्वाद, आंखों से देखा जाने वाला रूप, नाक से अनुभूत गन्ध, कानों से सुनाई देने वाले शब्द और त्वचा से अनुभव किए जाने वाले स्पर्श की क्षमताओं की रक्षा यदि दैवीय शक्तियां नहीं करेंगी तो मनुष्य के अपने सामर्थ्य से संभव नहीं हो सकता।

शरीर को संचालित करने वाली प्राणशक्ति है। प्राण न रहने पर शरीर शव हो जाता है। शव के सभी अंगों के होने पर भी किसी का उपयोग नहीं किया जा सकता, जैसे बिजली चले जाने पर कोई विद्युत उपकरण काम नहीं कर सकता। शरीर के विभिन्न भागों में स्थित पञ्चवायु (प्राण-अपान-व्यान-उदान-समान) की देह संचालन में अलग-अलग भूमिका होती है। इन्हें ही पञ्चप्राण कहते हैं जिनकी सुरक्षा की प्रार्थना देवी मां से की जाती है –

प्राणापानौ तथा व्यानमुदानं च समानकम्।

वज्रहस्ता च मे रक्षेत्प्राणं कल्याणशोभना॥३७॥

शरीर में स्थित कर्मेंद्रियों की सक्रियता और ज्ञानेंद्रियों में संवेदनशीलता प्राणशक्ति के प्रबल होने पर ही संभव है। परन्तु इन बहि:करणों द्वारा अर्जित ज्ञान की ग्रहणशीलता तथा परिपक्वता तो अन्त:करण की क्षमताऔर सक्रियता पर ही निर्भर है।अंत:करण चतुष्टय धर्माधारित हो, इसके लिए भी दैवीय शक्ति की कृपा आवश्यक है –

अहंकारं मनो बुद्धिं रक्षेन्मे धर्मधारिणी॥३६॥

मां पराम्बाशक्ति हमारी कर्मेंद्रियों-ज्ञानेन्द्रियों को सबल, प्राणशक्ति को प्रबल, मन को शांत-एकाग्र-अनासक्त, बुद्धि को विवेकपूर्ण, अहंकार को सकारात्मक और चित्त को संस्कारयुक्त बना कर हमारे वास्तविक आत्मस्वरूप का दर्शन करने में सक्षम बनने का आशीर्वाद दें, इसी प्रार्थना के साथ,

ज्ञान मार्ग के पथिक के रूप में आपका सहयात्री,

– अवनीश भटनागर

(लेखक विद्या भारती के अखिल भारतीय उपाध्यक्ष है।)

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