॥ नमस्ते रुद्ररूपिण्यै॥
चिताभस्मालेपो गरलमशनं दिक्पटधरो,
जटाधारी कण्ठे भुजगपतिहारी पशुपति:।
कपाली भूतेशो भजति जगदीशैकपदवीं,
भवानि ! त्वत्पाणिग्रहणपरिपाटी फलमिदम् ॥
(देव्यपराधक्षमापनस्तोत्रम् /७॥
अंगों में चिता भस्म लपेटे, विषपायी, नग्न, मस्तक पर जटाएं और गले में सर्प, हाथ में कपालरूपी भिक्षापात्र, ऐसे भूतनाथ, पशुपति को ‘जगदीश’ की पदवी का महत्व कैसे मिला? हे देवि! यह तुम्हारे साथ हुए पाणिग्रहण का फल है!
अद्भुत रूपक! विनोद में लिपटी हुई भक्ति!! और उसके मूल में बसी भारत की शिक्षा दृष्टि का आधार हमारी अनोखी परिवार परम्परा। अन्य देशों में तो शायद संभव नहीं और भारतीय समाज की सोच और व्यवहार में गतिपूर्वक हो रहे परिवर्तन के कालखण्ड में, जब परिवार संस्था का क्षरण हो रहा है, सनातन संस्कृति को व्यक्त करने वाले इस श्लोक में विद्यार्जन के उद्देश्यों का ही समावेश है।
जिस प्रकार हिन्दू जीवन दर्शन में पुरुषार्थ चतुष्टय को जीवन का परम लक्ष्य माना गया है वैसे ही तीन प्रकार के ऋण की भी अवधारणा है – पितृऋण, ऋषिऋण तथा देव ऋण। अपने जीवन काल में, अपने प्रयासों से इन तीनों ऋणों का उन्मोचन करने को जीवन के परम लक्ष्य के रूप में बताया गया है।
संतान अपने पितृकुल का प्रतिनिधित्व करती है। सृष्टि रचना के अंतर्गत वंश-क्रम को सातत्यपूर्वक चलाए रखना प्रत्येक संतान का कर्तव्य माना गया है। पितृवंश अर्थात पिता से पूर्व की सात पीढ़ी और माता की पांच पूर्ववर्ती पीढ़ी के वंशानुगत गुण-दोष संतान की प्रकृति में आते हैं जिन्हें आज की वैज्ञानिक भाषा में डी एन ए कहा जाता है। यह एक प्रकार से व्यक्ति पर अपने पूर्वजों का ऋण है जिससे उऋण होने का उपाय है, संतानोत्पत्ति करना, समाज को अपने वंशज देना, सृष्टि की सृजन परम्परा को सतत चलाए रखना।
श्रीमद् भगवद्गीता के प्रथम अध्याय के श्लोक 37 से 44 में अर्जुन अपनी यही चिंता श्रीकृष्ण के सम्मुख व्यक्त करता है, “युद्ध के परिणामस्वरूप कुल का नाश होगा, सनातन काल से चला आ रहा कुलधर्म नष्ट हो जाएगा, धर्म के नष्ट होने से संपूर्ण कुल को पाप लगेगा, पाप के बढ़ जाने से कुल की स्त्रियां दूषित हो जाएंगी और संतान वर्णसंकर उत्पन्न होगी। वर्णसंकर संतान द्वारा पितरों को दिए गए जल और पिंडदान से पितृ भी अपने स्थान से भ्रष्ट हो जाएंगे।”
अर्जुन की चिंता केवल अपने परिवार के संबंध में नहीं है। समाज की संरचना को व्यवस्थित रूप से युगानुयुग चलाए रखने के लिए सृष्टि के क्रम को सतत रखना प्रत्येक मनुष्य का कर्तव्य है। सृष्टि के अन्य प्राणी, जीव – जंतु, वृक्ष – वनस्पति, कीट- पतंग भी अपनी वंश वृद्धि की प्राकृतिक प्रक्रिया को अपनाते हैं जिस कारण युगों से यह सृष्टि समाप्त नहीं हुई है।
अर्जुन की चिन्ता को वर्तमान समाज में पाश्चात्य सभ्यता के प्रभाव के कारण आ रही विकृतियों के संदर्भ में विचार करना प्रासंगिक होगा। बिखरते हुए परिवार, टूटते हुए सम्बन्ध, बढ़ते हुए विवाह- विच्छेद, एकल परिवार, बच्चों के केवल माता या पिता होना (single parents), लिव-इन रिलेशनशिप और DINK परिवार अर्थात पति-पत्नी दोनों अर्थार्जन तो करेंगे परंतु संतानोत्पत्ति नहीं करेंगे आदि को सहजता से स्वीकार कर रही समाज की वर्तमान स्थिति सृष्टि के क्रम को जारी रखने और पितृ ऋण के उन्मोचन के लिए किस प्रकार उपाय कर सकती है?
सृष्टि की व्यवस्थाओं को समुचित रूप से चलाए रखने के लिए केवल संतान उत्पत्ति से नहीं चलता। जिस संतान को जन्म दिया उसको सुयोग्य बनाने का उत्तरदायित्व भी वर्तमान पीढ़ी का है।जैसे व्यक्ति के ऊपर अपने पितरों का ऋण है, उसी प्रकार जिनसे व्यक्ति ने जीवन चलाने के लिए योग्य बनने की शिक्षा प्राप्त की, उन गुरुजनों का भी प्रत्येक व्यक्ति के ऊपर ऋण होता है। भारत की परंपरा में इसे ऋषि ऋण कहा गया है।ज्ञान का सृजन करने वाले ऋषियों-मनीषियों के योगदान के बिना जिस प्रकार यह पीढ़ी अपने जीवन में सफल नहीं हो सकती थी, उसी प्रकार की योग्यता अगली पीढ़ी को देना अर्थात उनको सुशिक्षित -सभ्य तथा दायित्ववान् बनाना, यह इस पीढ़ी का कर्तव्य है। इसे ही ऋषि ऋण का उन्मोचन कहा गया है। भारत की समृद्ध ज्ञान परंपरा इसी ऋषि ऋण को अगली पीढ़ी को हस्तांतरण के माध्यम से निर्मित और विकसित हुई है। जिस प्रकार ऊपर पितृ कुल का उल्लेख आया है उसी प्रकार जीवन में गुरुकुल भी महत्वपूर्ण है जहां से प्राप्त ज्ञान को हमें अगली पीढ़ियों को हस्तांतरित करना होता है।
ऋण का तीसरा प्रकार है देव ऋण। ‘देव’ अर्थात देने वाला। हमारा जीवन विभिन्न दैवीय शक्तियों की कृपा से संचालित होता है। यहां दैवीय शक्तियों का अर्थ मंदिरों अथवा चित्रों में दिखाई देने वाली प्रतिमाओं से नहीं है। हिंदू संस्कृति में सृष्टि के समस्त तत्वों को देवता माना गया है। पञ्च महाभूतों में पृथ्वी को देवी और माता तथा अग्नि -जल -वायु आदि को देवता कहा गया है। यह केवल नामकरण नहीं है और न ही किसी प्रकार का अंधविश्वास। वास्तव में, सृष्टि की रचना और हमारे शरीर की रचना भी इन्हीं पांच तत्वों से मिलकर हुई है और इसलिए इन देवताओं का ऋण भी हमारे ऊपर है।
प्रकृति प्रदत्त संसाधनों के अतिरिक्त यह समाज भी जीवन में हमें अनेक प्रकार से सहयोग करता है। यह मनुष्य के ऊपर समाज देवता का ऋण ही है जिसका उन्मोचन करने का एकमात्र उपाय है कि जितना हम इन दैवीय शक्तियों से प्राप्त करते हैं उतना ही परिश्रम उनके संरक्षण- संवर्धन और उनको उपयोगी बनाए रखने के लिए हमको करना होगा। हिंदू तत्त्वचिंतन में इसीलिए पर्यावरण संरक्षण पर अलग से ग्रंथ लिखने या गुरुकुल/ विद्यापीठ के पाठ्यक्रम में सम्मिलित करने की आवश्यकता नहीं हुई क्योंकि पर्यावरण संरक्षण हमारे जीवन व्यवहार का अंग था। ईशावास्योपनिषद् के प्रथम श्लोक में कहा गया –
ईशावास्यमिदं सर्वम् यत्किंचित् जगत्यांजगत्।
तेन त्यक्तेनभुञ्जीथा मागृध: कस्यस्विद्धनम्॥
सृष्टि के कण -कण में व्याप्त परमेश्वर की अनुभूति और त्यागपूर्वक भोग करना अर्थात् जितना आवश्यक है उतना ही लेना। प्रकृति प्रदत्त संसाधनों का आवश्यकता अनुसार दोहन करना, शोषण नहीं करना। सदुपयोग करना, नष्ट-भ्रष्ट नहीं करना।
ऐसा विचारवान् मनुष्य निर्माण करना, यही भारत में शिक्षा का मूलभूत उद्देश्य है। इसके लिए वांछित शिक्षा केवल विद्यालय के कक्षा कक्षों में, एक निर्धारित पाठ्यक्रम तथा पाठ्य-पुस्तकों के माध्यम से नहीं हो सकती। शिक्षक और अभिभावक अर्थात् परिवार परस्पर सहयोगात्मक संयुक्त प्रयास से ही ऐसा समाज गढ़ सकते हैं।
हम स्वयं ऐसे बन सकें और अपनी अगली पीढ़ियों को ऐसा गढ़ सकें, ऐसी सामर्थ्य वह आद्य परिवार – जटाधारी, निर्वस्त्र, श्मशानवासी, वीतरागी भगवान विश्वनाथ और ‘ नानाभरणशोभाढ्या नानारत्नोपशोभिता’ माता भगवती हमें प्रदान करें, यही प्रार्थना।
भारतीय ज्ञान परम्परा का जिज्ञासु और आपका सहयात्री,
– अवनीश भटनागर
(लेखक विद्या भारती के अखिल भारतीय उपाध्यक्ष है।)