॥ॐ नमः विश्वेश्वरीम्॥
शारदेय नवरात्रि के तृतीय दिवस पर ज्ञान-विज्ञान रूपिणी माँ भगवती को प्रणाम तथा सभी स्नेहीश्री ज्ञानसाधकों को सादर नमस्कार।
ॐ विशुद्धज्ञानदेहाय त्रिवेदीदिव्यचक्षुषे।
श्रेय:प्राप्तिनिमित्ताय नमः सोमार्धधारिणे॥
(श्रीदेवीकीलकम्/१)
विशुद्ध ज्ञान ही जिनकी देह है, तीन वेद तीन दिव्य नेत्र हैं, जो कल्याण के निमित्त हैं तथा मस्तक पर अर्द्धचंद्र धारण करते हैं ऐसे भगवान सदाशिव और देवी शिवा को प्रणाम।
विशुद्ध ज्ञान तथा उसका आदि स्रोत वेद, यह किस प्रकार किसी की देह अथवा नेत्र हो सकते हैं? सांकेतिक रूप में इसका अर्थ ज्ञानार्जन की प्रक्रिया के करणों से जुड़ा हुआ है। कोई भी व्यक्ति कुछ भी सीखता है तो उसके शरीर में स्थित कर्मेन्द्रियों (अर्थात् हाथ, पैर, वाणी, उपस्थ तथा पायु) एवं ज्ञानेंद्रिय (अर्थात् आँख-नाक-कान-जिह्वा और त्वचा) का प्रयोग किए बिना सीखना संभव नहीं है। शरीर के ये अंग प्रत्यक्ष दिखाई देते हैं अत: इन्हें बहि:करण या बाह्यकरण कहा गया। कर्मेंद्रियों द्वारा कर्म करके तथा ज्ञानेंद्रियों से प्राप्त अनुभूति (दृश्य-श्रवण-घ्राण-स्पर्श-स्वाद के आधार पर अर्थात् देखकर-सुनकर-सूंघकर-छूकर-चखकर) के आधार पर ज्ञान अर्जन की प्रक्रिया संपन्न होती है; परंतु इस प्रक्रिया की पूर्णता में दूसरा पक्ष मनुष्य शरीर के अंदर स्थित अंत:करण चतुष्टयहै, जिसके बिना जुड़े यह प्रक्रिया पूर्ण नहीं होती।
अंत:करण के चार रूप हैं – मन-बुद्धि-अहंकार और चित्त। इन चारों के कार्यों का विवरण इस श्लोक में है –
मनोबुद्धिरहंकारश्चित्तं करणमन्तरम्।
संशयो निश्चयो गर्व: स्मरणं विषया इमे॥
मन से वितर्क, संशय और संकल्प -विकल्प होता है। बुद्धि निश्चयात्मक होती है, वह अवलोकन-अनुमान-तुलना-तर्क-संश्लेषण तथा विश्लेषण के माध्यम से निष्कर्ष तक पहुंचती है। अहंकार के माध्यम से गर्व अर्थात् अहंभाव की अभिव्यक्ति होती है। चित्त का कार्य स्मरण करना है। इसी चित्त पर सभी प्रकार के संस्कार स्थिर होते हैं जो कालांतर में हमें विभिन्न विषयों का सम्यक् ज्ञान कराते हैं। इस अंत:करण चतुष्टय के माध्यम से आत्मा के प्रकाश में ज्ञानार्जन प्रक्रिया संपन्न होती है।
श्रीमद्भगवद्गीता के तृतीय अध्याय में श्रीकृष्ण कहते हैं –
इन्द्रियाणि पराण्याहुरिन्द्रियेभ्य: परं मन:।
मनसस्तु परा बुद्धिर्यो बुद्धे परतस्तु स:॥(३/४२)
अर्थात शरीर की तुलना में इंद्रियां ‘पर’ अर्थात श्रेष्ठ, बलवान और सूक्ष्म हैं। इन इंद्रियों से भी ‘पर’ मन है। मन से भी ‘पर’ बुद्धि है और जो बुद्धि से भी अत्यंत ‘पर’ है, वही ‘वह’ अर्थात मनुष्य में विराजमान परमात्मा का अंश आत्मा है। बुद्धि से पर अर्थात सूक्ष्म, बलवान और श्रेष्ठ अपनी आत्मा को जानकर और बुद्धि के द्वारा मन को वश में करके व्यक्ति ज्ञान प्राप्त करता है।
भगवान सदाशिव, देवी भगवती शिवा और लीला पुरुषोत्तम श्रीकृष्ण हमारी बुद्धि को शुद्ध रखकर मन को उसके नियंत्रण में रखने की सामर्थ्य प्रदान करें, यही विनय।
ज्ञान मार्ग में आपका सहयात्री,
– अवनीश
(लेखक विद्या भारती के अखिल भारतीय उपाध्यक्ष है।)