भारतीय शिक्षा के सामाजिक-आर्थिक आधार – भाग दो

– डॉ. कुलदीप कुमार मेहंदीरत्ता

  1. आधुनिक भारत में शिक्षा : सामाजिक-आर्थिक आधार

ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य में आधुनिक भारत की शुरुआत सामान्यतः 1757 की प्लासी की लड़ाई से मानी जाती है। अंग्रेजों ने सत्ता पाते ही एक सुनियोजित रणनीति के तहत भारतीय समाज के आधारभूत सांस्कृतिक, शैक्षिक और बौद्धिक मूल्यों को परिवर्तित करना आरम्भ कर किया। 1835 में लॉर्ड मैकाले के कुख्यात ‘मिनट ऑन एजुकेशन’ के अनुसार शिक्षा का उद्देश्य एक ऐसे वर्ग का निर्माण करना था, जो ‘रक्त और रंग से भारतीय हो, किंतु विचार, वाणी और संस्कृति से पूर्णतः अंग्रेज’ हो। यह वर्ग भारतीय समाज में एक औपनिवेशिक मध्यस्थ अथवा उपकरण के रूप में कार्य करने के लिए प्रशिक्षित किया गया।

इस उद्देश्य की पूर्ति हेतु अंग्रेजों ने भारत की परंपरागत शिक्षा प्रणाली – जैसे गुरुकुल, पाठशालाएँ, आदि शिक्षण संस्थानों को क्रमिक रूप से हाशिए पर डालना आरंभ किया। इन संस्थानों की आत्मनिर्भर और सामुदायिक प्रकृति, स्थानीय आवश्यकताओं और सांस्कृतिक पहचान से गहरे जुड़ी हुई थी, जो औपनिवेशिक हितों के अनुकूल नहीं थी। अतः अंग्रेजों ने ऐसी शिक्षा व्यवस्था को बढ़ावा दिया जो मुख्यतः प्रशासनिक अधिकारियों, लिपिकों और सहयोगी वर्ग के निर्माण तक सीमित थी।

ब्रिटिश औपनिवेशिक शिक्षा नीति की आलोचना और भारत की स्वदेशी शिक्षा व्यवस्था के प्रामाणिक दस्तावेज़ों का गहन अध्ययन प्रो. धर्मपाल ने अपनी प्रामाणिक और वस्तुनिष्ठ पुस्तक “The Beautiful Tree: Indigenous Indian Education in the Eighteenth Century” में किया है। व्यापक शोध के आधार पर प्रो. धर्मपाल ने यह तथ्य विश्व के सामने प्रकट किया कि औपनिवेशिक शासन से पूर्व भारत में एक अत्यंत विस्तृत, विकेंद्रित और सामाजिक रूप से समावेशी शिक्षा प्रणाली विद्यमान थी, जो जाति, वर्ग, लिंग और क्षेत्रीयता के आधार पर किसी प्रकार का भेद नहीं करती थी। विद्यालय प्रायः ग्राम स्तर पर सक्रिय रहते थे, जहाँ विद्यार्थी गणित, खगोलशास्त्र, व्याकरण, तर्कशास्त्र, नैतिक शिक्षा तथा स्थानीय कौशलों में पारंगत होते थे।

धर्मपाल जी की पुस्तक में स्त्री शिक्षा के बारे में भी प्रमाण मिलते हैं। पुस्तक के अनुसार, 18वीं शताब्दी से 19वीं शताब्दी के प्रारम्भ तक स्त्री शिक्षा के लिए एक सुव्यवस्थित प्रणाली थी। ग्रामीण क्षेत्रों में लड़कियों की शिक्षा के लिए ‘कन्या पाठशालाएँ’ व ‘घर-आधारित शिक्षा’ का प्रचलन था। मद्रास प्रेसीडेंसी और बंगाल के ब्रिटिश सर्वेक्षणों (थॉमस मुनरो की रिपोर्ट, 1822) में उल्लेख है कि लगभग 30-40% स्कूली छात्राएँ थीं। ‘विधवा शिक्षा’ और ‘वयस्क स्त्रियों के लिए शिक्षण केंद्र’ भी मौजूद थे, जैसे बंगाल की ‘चतुष्पाठी’ परंपरा।

धर्मपाल की पुस्तक में मद्रास, बंगाल और पंजाब में शिक्षा सम्बन्धी प्रामाणिक आंकडें स्पष्ट करते हैं कि भारत की पारंपरिक शिक्षा प्रणाली समाज के व्यापक वर्गों तक पहुँच रखती थी और ‘विद्या सर्वेषां अधिकारः’ की भावना उस समय की शिक्षा में विद्यमान थी। ब्रिटिश शासन ने न केवल इस सामाजिक संतुलन को तोड़ा, बल्कि भारतीय शिक्षा की आर्थिक आत्मनिर्भरता को भी समाप्त कर दिया। गुरुकुलों और पाठशालाओं को मिलने वाला सामाजिक सहयोग और भूमिदान बंद हो गया, जिससे परंपरागत ज्ञान, शिल्प, उद्योग और जीवन-कौशल का स्थान सरकारी मान्यता प्राप्त औपनिवेशिक पाठ्यक्रम ने ले लिया। परिणामस्वरूप, शिक्षा का सामाजिक उत्तरदायित्व धीरे-धीरे सरकारी औपचारिकता में बदल गया।

औपनिवेशिक दमन के इस वातावरण में भारतीय समाज की सांस्कृतिक चेतना पूरी तरह विलुप्त नहीं हुई। स्वामी दयानंद सरस्वती के नेतृत्व में 1875 में स्थापित आर्य समाज ने परंपरागत वैदिक शिक्षा, संस्कृत और गुरुकुल प्रणाली के पुनरुत्थान के माध्यम से स्वदेशी दृष्टिकोण, आत्मनिर्भरता, सामाजिक समरसता और नैतिक मूल्यों के समावेश का संगठित प्रयास किया। समाज के सहयोग से स्थापित गुरुकुलों ने वैदिक ज्ञान के साथ-साथ आधुनिक विषयों का समन्वय प्रस्तुत किया और वंचित वर्गों को भी शिक्षा में भागीदार बनाने के लिए प्रेरित किया।

भारतीय उद्योगपतियों, राष्ट्रवादियों, और समाज सुधारकों द्वारा 1906 में राष्ट्रीय शिक्षा परिषद (National Council of Education) की स्थापना एक महत्वपूर्ण सामाजिक और आर्थिक पहल थी। इसका उद्देश्य भारतीय दृष्टि से तकनीकी, वैज्ञानिक, नैतिक और धार्मिक शिक्षा प्रदान करना था, जिससे भारतीय युवाओं में भारतीय जीवन मूल्य, आत्मनिर्भरता और सांस्कृतिक चेतना विकसित हो।

इसी प्रकार 1937 में महात्मा गांधी द्वारा प्रस्तावित बेसिक एजुकेशन प्रणाली (Basic Education) ने शिक्षा को भारत की सामाजिक-आर्थिक आवश्यकताओं से जोड़ने का महत्वपूर्ण प्रयास किया। इस प्रणाली का उद्देश्य केवल साक्षरता नहीं, बल्कि श्रम, कौशल, आत्मनिर्भरता और नैतिक जीवन मूल्यों पर आधारित समग्र शिक्षा देना था। गांधीजी का यह दृष्टिकोण समाज को न केवल शैक्षिक रूप से सशक्त करता था, बल्कि आर्थिक रूप से भी आत्मनिर्भर बनाने की क्षमता रखता था।

  1. स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात शिक्षा : सामाजिक-आर्थिक आधार

1947 में स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात भारत ने वैज्ञानिक दृष्टिकोण और औद्योगीकरण को प्राथमिकता देने वाली समाजवादी योजनाओं को अपनाया। इस क्रम में भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (IITs), अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (AIIMS) तथा अन्य उच्च तकनीकी संस्थानों की स्थापना की गई। हालाँकि यह प्रयास आर्थिक आत्मनिर्भरता और तकनीकी उन्नति की दिशा में महत्वपूर्ण था, किंतु इसके समानांतर भारत की पारंपरिक ज्ञान प्रणालियाँ – संस्कृत, आयुर्वेद, योग, भारतीय दर्शन, तथा शास्त्र आदि उपेक्षित रह गईं।

स्वतंत्र भारत की आर्थिक नीतियों ने नगरीय क्षेत्रों को वरीयता दी, जिससे शिक्षा के क्षेत्र में गहरी असमानता उत्पन्न हुई। महानगरों और बड़े शहरों में संसाधनों से युक्त उत्कृष्ट विद्यालय विकसित हुए, जबकि ग्रामीण क्षेत्रों के विद्यालय आधारभूत संरचना, योग्य शिक्षकों और शैक्षिक सामग्री की दृष्टि से उपेक्षित रह गए। इसका प्रत्यक्ष परिणाम यह हुआ कि ग्रामीण साक्षरता दर नगरीय क्षेत्रों की तुलना में अत्यंत निम्न रही, जिससे नगरीय अभिजात्य वर्ग की श्रेष्ठता और ग्रामीण वर्ग की सीमित सहभागिता के बीच की खाई और गहरी होती चली गई।

स्वतंत्रता के पश्चात शिक्षा व्यवस्था को सरकारी नियंत्रण में लाया गया, और व्यापक स्तर पर सरकारी विद्यालयों की स्थापना की गई। यद्यपि यह प्रयास व्यापक सुलभता के दृष्टिकोण से सकारात्मक था, किंतु शिक्षा का सामाजिक-आर्थिक उत्तरदायित्व धीरे-धीरे केवल सरकार तक सीमित होकर रह गया। परिणामस्वरूप, समाज की सहभागिता, जो पूर्व-औपनिवेशिक शिक्षा प्रणाली की आत्मा थी, समाप्त होती चली गई।

हालाँकि कुछ संस्थाएँ जैसे दयानंद एंग्लो वैदिक विद्यालय (DAV), विद्या भारती इत्यादि ने शिक्षा को समाज के नेतृत्व में और आर्थिक सहयोग से जोड़ने का प्रयास किया तथा आत्मनिर्भरता की दिशा में सार्थक पहल की। इन संस्थानों ने परंपरा और आधुनिकता का समन्वय करते हुए भारत की सांस्कृतिक चेतना को शिक्षा के माध्यम से पुनर्स्थापित करने का प्रयास किया। सरकार द्वारा ग्राम शिक्षा समितियाँ जैसी संस्थाएँ भी स्थापित की गईं, परंतु अधिकांश स्थानों पर ये केवल औपचारिक उपस्थिति तक ही सीमित रहीं और जमीनी स्तर पर समाज को शिक्षा के साथ गहरे जुड़ाव में लाने में अपेक्षित सफलता नहीं मिली।

गांधीजी ने शिक्षा को मातृभाषा में, श्रम की गरिमा और कौशल विकास के साथ जोड़ने की आवश्यकता पर बल दिया था। 1937 की ‘बुनियादी शिक्षा’ इसी विचार का मूर्त रूप थी। परंतु, दुर्भाग्यवश पश्चिमी मॉडल की अनुकरणीय शिक्षा को ही राष्ट्रीय विकास का मार्ग मान लिया गया। समाज के मूल्यों और सामाजिक-आर्थिक सहयोग से दूर यह शिक्षा प्रणाली विद्यार्थियों में आत्मगौरव की भावना उत्पन्न करने के स्थान पर, उपनिवेशी मानसिकता को और अधिक सुदृढ़ करती गई। भारतीय सांस्कृतिक मूल्यों, भाषाओं, चिकित्सा, आध्यात्मिक चेतना और परंपराओं की अनुपस्थिति आज भी हमारी शिक्षा प्रणाली की सबसे बड़ी आलोचना है।

  1. राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020: पुनर्संरचना की संभावनाएँ

सन् 2020 में घोषित राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP) उपनिवेशीय ढाँचे से बाहर निकलने का एक प्रयास है। यह नीति मातृभाषा में शिक्षा, त्रिभाषा सूत्र, भारतीय ज्ञान परंपरा, नैतिक शिक्षा, योग, आयुर्वेद, कृषि, और दर्शन जैसे विषयों के समावेश की बात करती है। साथ ही यह उद्यमिता, कौशल विकास, तकनीकी दक्षता और रोजगारोन्मुख शिक्षा को बढ़ावा देकर भारत को आत्मनिर्भर बनाने की दिशा में एक संगठित प्रयास प्रस्तुत करती है।

भारत के समृद्ध वर्ग और निजी क्षेत्र की भूमिका शिक्षा के नवाचार और विस्तार में अत्यंत महत्वपूर्ण हो सकती है। कॉर्पोरेट सोशल रिस्पॉन्सिबिलिटी (CSR) और सार्वजनिक-निजी भागीदारी (PPP) के माध्यम से गुणवत्तापूर्ण आधारभूत संरचना, शिक्षक-प्रशिक्षण, डिजिटल साक्षरता, और ग्रामीण क्षेत्रों में उच्च गुणवत्ता की शिक्षा सुनिश्चित की जा सकती है।

स्वदेशी कृषि, पर्यावरण-अनुकूल संसाधन प्रबंधन, हस्तशिल्प, ग्रामीण उद्योग आदि क्षेत्रों में भारतीय परंपराओं और ज्ञान प्रणाली के आधार पर स्थानीय अर्थव्यवस्था को पुनर्जीवित किया जा सकता है। राष्ट्रीय शिक्षा नीति इस दिशा में एक आशाजनक पहल है, किंतु इसके सफल कार्यान्वयन के लिए राज्य, समाज और निजी क्षेत्र – तीनों को समन्वित रूप से कार्य करना होगा। शिक्षा के माध्यम से भारत न केवल आत्मनिर्भर बन सकता है, बल्कि एक विशिष्ट भारतीय मॉडल का निर्माण भी कर सकता है जो वैश्विक शिक्षा व्यवस्था में एक सशक्त विकल्प प्रस्तुत कर सके।

और पढ़े: भारतीय शिक्षा के सामाजिक-आर्थिक आधार – भाग एक

(लेखक कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय, कुरुक्षेत्र हरियाणा में राजनीति शास्त्र के सहायक आचार्य है।)

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