जगदीशचंद्र बसु – विज्ञान के आकाश में भारतीय पुरोधा

✍ डॉ. पवन सिंह

‘पेड़ पौधों में भी जीवन होता है और उनमें भी अनुभूतियाँ होती है’ इस बात को वैज्ञानिक आधार पर सिद्ध कर दुनियां को चौकाने वाले वैज्ञानिक जगदीश चंद्र बसु का जन्म 30 नवंबर 1858 को मेमनसिंह गाँव,बंगाल (वर्तमान बांग्लादेश) में हुआ था। बसु जी प्रसिद्ध भौतिकवादी तथा पादपक्रिया वैज्ञानिक कहे जाते थे। बसु जी बचपन से ही बहुत विद्वान् और किसी न किसी क्षेत्र में रिसर्च करते रहते। जगदीश चंद्र बसु ने कई महान ग्रंथ भी लिखे हैं, जिनमें से कुछ निम्न है – ‘सजीव तथा निर्जीव की अभिक्रियाएँ’, ‘वनस्पतियों की अभिक्रिया’, ‘पौधों की प्रेरक यांत्रिकी’ इत्यादि।

जगदीश चंद्र बसु ने सिद्ध किया कि चेतना केवल मनुष्यों और पशुओं, पक्षियों तक ही सीमित नहीं है, अपितु वह वृक्षों और निर्जीव पदार्थों में भी समाहित है। उन्होंने कहा कि निर्जीव व सजीव दोनों सापेक्ष हैं। उनमें अंतर केवल इतना है कि धातुएं थोड़ी कम संवेदनशील होती हैं। इनमें डिग्री का अंतर है परंतु चेतना सब में है। जगदीश चंद्र सबसे प्रमुख पहले भारतीय वैज्ञानिकों में से एक हैं जिन्होंने प्रयोग करके साबित किया कि जानवर और पौधे दोनों में बहुत कुछ समान है। उन्होंने दिखाया कि पौधे गर्मी, ठंड, प्रकाश, शोर और विभिन्न अन्य बाहरी उत्तेजनाओं के प्रति भी संवेदनशील होते हैं।

जगदीश चन्द्र ने अपनी प्रारंभिक शिक्षा एक स्थानीय विद्यालय से प्राप्त की, क्योंकि उनके पिता का मानना ​​था कि अंग्रेजी जैसी विदेशी भाषा का अध्ययन करने से पहले बोस को अपनी मातृभाषा बांग्ला सीखनी चाहिए। उन्होंने बी.ए. कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय से डिग्री, लंदन विश्वविद्यालय से बीएससी की डिग्री और यूनिवर्सिटी कॉलेज लंदन से डीएससी की डिग्री की।

1896 में, बोस ने ‘निरुदेशेर कहिनी’ लिखी, जिसे बंगाली विज्ञान कथा की पहली कृतियों में से एक माना जाता है।

बसु के प्रसिद्ध प्रयोग

लंदन में रॉयल सोसाइटी का केंद्रीय हॉल 10 मई, 1901 को प्रसिद्ध वैज्ञानिकों से खचाखच भरा था। हर कोई यह जानने के लिए उत्सुक था कि बसु का प्रयोग कैसे प्रदर्शित करेगा कि पौधों में अन्य जीवित प्राणियों और मनुष्यों की तरह भावनाएँ होती हैं। बसु ने एक ऐसे पौधे को चुना जिसकी जड़ों को ब्रोमाइड के घोल वाले बर्तन में सावधानी से उसके तने तक डुबोया गया, जिसे जहर माना जाता है। उन्होंने प्लांट के साथ उपकरण में प्लग लगाया और एक स्क्रीन पर रोशनी वाले स्थान को देखा, जिसमें पौधे की गति दिखाई दे रही थी, जैसे कि उसकी नाड़ी धड़क रही थी, और स्पॉट एक पेंडुलम के समान गति करने लगा। मिनटों के भीतर, घटनास्थल हिंसक तरीके से हिल गया और अंत में अचानक बंद हो गया। सब कुछ लगभग एक जहरीले चूहे की तरह था जो मौत से लड़ रहा था। जहरीले ब्रोमाइड के घोल के संपर्क में आने से पौधे की मृत्यु हो गई थी। इस कार्यक्रम का बहुत सराहना और तालियों के साथ स्वागत किया गया।

उन्होंने क्रेस्कोग्राफ का आविष्कार किया, जो पौधों की वृद्धि को मापने के लिए एक उपकरण है। उन्हें पौधों के तिसुएस में माइक्रोवेव की क्रिया का अध्ययन करने वाले पहले व्यक्ति के रूप में जाना जाता है।बोस रेडियो तरंगों कापता लगाने के लिए सेमी कंडक्टर जंक्शन का उपयोग करने वाले पहले व्यक्ति थे और उन्होंने विभिन्न माइक्रोवेव घटकों का भी आविष्कार किया। उन्होंने ऑटोमैटिक रिकॉर्डर का निर्माण किया जो पौधों में भी मिनट की गतिवधियों को दर्ज कर सकते हैं।

मारकोनी नहीं बसु है ‘रेडियो तरंगों’ के प्रणेता

जगदीश चंद्र बसु ने सूक्ष्म तरंगों (माइक्रोवेव) के क्षेत्र में वैज्ञानिक कार्य तथा अपवर्तन, विवर्तन और ध्रुवीकरण के विषय में अपने प्रयोग आरंभ कर दिये थे। लघु तरंगदैर्ध्य, रेडियो तरंगों तथा श्वेत एवं पराबैंगनी प्रकाश दोनों के रिसीवर में गेलेना क्रिस्टल का प्रयोग बसु के द्वारा ही विकसित किया गया था। मारकोनी के प्रदर्शन से 2 वर्ष पहले ही 1885 में बसु ने रेडियो तरंगों द्वारा बेतार संचार का प्रदर्शन किया था। इस प्रदर्शन में जगदीश चंद्र बसु ने दूर से एक घण्टी बजाई और बारूद में विस्फोट कराया था। आजकल प्रचलित बहुत सारे माइक्रोवेव उपकरण जैसे वेव गाईड, ध्रुवक, परावैद्युत लैंस, विद्युतचुम्बकीय विकिरण के लिये अर्धचालक संसूचक, इन सभी उपकरणों का उन्नींसवी सदी के अंतिम दशक में बसु ने अविष्कार किया और उपयोग किया था।

बसु ने दुनिया के पहले ‘हार्न एंटीना’ की खोज की जो आज माइक्रोवेव आधारित सभी उपकरणों में इस्तेमाल किया जाता है। आज का रेडियो, टेलीविज़न, रडार, भूतलीय संचार रिमोट सेन्सिंग, माइक्रोवेव ओवन और इंटरनेट इन्हीं तरंगों के कारण चलते हैं। पौधों में वृद्धि की अभिरचना आज आधुनिक विज्ञान के तरीकों से सिद्ध हो गई है। पौधों में वृद्धि और अन्य जैविक क्रियाओं पर समय के प्रभाव का अध्ययन जिसकी आधारशिला बसु ने डाली, आज क्रोनोबायोलॉजी कही जाती है। अलग-अलग परिस्थियों में सेल मेम्ब्रेन पोटेंशियल के बदलाव का विश्लेषण करके वे इस नतीजे पर पहुंचे कि पौधे संवेदनशील होते हैं, वे दर्द महसूस कर सकते हैं।

जीवन बड़ा नहीं सार्थक होना चाहिए

समस्त विश्व की तरह महात्मा गाँधी भी उनसे बहुत प्रभावित थे। उनके जीवनीकारों में से एक पैट्रिक गेडेज लिखते हैं कि “जगदीश चंद्र बसु के जीवन की कहानी पर उन सभी युवा भारतीयों को गहराई और मजबूत विचारों के साथ गौर करना होगा, जिनका उद्देश्य विज्ञान या बौद्धिकता या सामाजिक भावना के महती लक्ष्यों को साकार करना है”। बोस एक अच्छे शिक्षक भी थे, जो कक्षा में पढ़ाने के लिए बड़े पैमाने पर वैज्ञानिक प्रदर्शनों का उपयोग करते थे। बोस के ही कुछ छात्र जैसे सतेन्द्र नाथ बोस आगे चलकर प्रसिद्ध भौतिकशास्त्री बने।

वर्ष 1917 में जगदीश चंद्र बोस को ‘नाइट’ (Knight) की उपाधि प्रदान की गई तथा शीघ्र ही भौतिक तथा जीव विज्ञान के लिए रॉयल सोसायटी लंदन के फैलो चुन लिए गए। बोस ने अपना पूरा शोधकार्य बिना किसी अच्छे (महगे) उपकरण और प्रयोगशाला के किया था। इसलिये जगदीश चंद्र बोस एक अच्छी प्रयोगशाला बनाने की सोच रहे थे। ‘बोस इंस्टीट्यूट’ (बोस विज्ञान मंदिर) इसी सोच का परिणाम है जो कि विज्ञान में शोधकार्य के लिए राष्ट्र का एक प्रसिद्ध केन्द्र है। बसु ने ही सूर्य से आने वाले विद्युत चुम्बकीय विकिरण के अस्तित्व का सुझाव दिया था जिसकी पुष्टि 1944 में हुई। जगदीश बसु ने मानव विकास की नींव डाली और मानव जीवन के लिए बहुत से सफल प्रयास किए। उनका 78 वर्ष की आयु में 23 नवंबर 1937 को गिरिडीह, भारत में निधन हो गया।

शुद्ध भारतीय परंपराओं और संस्कृति के प्रति समर्पित जगदीश चंद्र बसु आज भी हम सभी की प्रेरणा है।

(लेखक जे. सी. बोस विश्वविद्यालय, फरीदाबाद के मीडिया विभाग में एसोसिएट प्रोफेसर है)

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