“21वीं सदी में विद्यालय एवं शिक्षकों से अपेक्षाएं”

– विपिन राठी

21वीं सदी की शिक्षा प्रणाली का उद्देश्य विद्यार्थी को केवल ज्ञान देना नहीं बल्कि उसमे ऐसी अभिक्षमताओं को विकसित करना है जिनके द्वारा वह आज के युग में होने वाले पूर्वानुमानित या अप्रत्याशित परिवर्तनों से उत्पन्न चुनौतियों का सामना कर सके व एक कुशल नागरिक बन अपने समाज को दिशा देने में सहायक हो सकें।

भारत में शिक्षा का प्रारूप एक उदाहरण प्रस्तुत करने वाला रहा है। एक समय था, जब शिक्षक, शिक्षक का ज्ञान, शिक्षक का अनुभव ही स्वयं में परिपूर्ण तथा अचूक हुआ करता था। आज के बदलते अविश्वसनीय परिवर्तनों तथा परिस्थितियों में विद्यार्थी के जीवन को सुगम व बेहतरीन बनाने के लिए 21वीं सदी के 12 विभिन्न कौशलों के समायोजन की आवश्यकता है। हमें इस बात को समझना चाहिए कि हमारे विद्यार्थियों को आज ऐसी परिस्थितियों का सामना करना पड़ रहा है तथा करना होगा, जो पूर्वानुमानित नहीं है। जो पूर्ण रूप से अप्रत्यक्ष है, ऐसी परिस्थितियों को साधारण रूप से समझना कठिन है।

आधुनिक शिक्षा का लक्ष्य

आधुनिक शिक्षा का उद्देश्य बच्चों को श्रेष्ठ निर्णायक, समस्या निवारक तथा सक्षम बनाना है। आज के विद्यार्थी को चाहिए कि वह विद्यालय से ज्ञान तो प्राप्त करे साथ ही अपने अन्दर ऐसी अभिक्षमताओं को विकसित करे जो उसे जीवन में आने वाली चुनौतियों का सामना करने में भी सक्षम बनाये। यह जरूरी नहीं कि हर परिस्थिति का समाधान हो परंतु बदलते समय में विभिन्न परिस्थितियों में सही दिशा में अग्रसर रहना उससे आना चाहिए।

सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण यह है कि विद्यार्थी को विभिन्न कार्य क्षेत्र में विभिन्न प्रकार के व्यक्तियों के साथ सामूहिक रूप से कार्य करना आना चाहिए। जैसे एक विद्यार्थी को अगर खेल का क्षेत्र चुनना है तो उसे एक सर्वश्रेष्ठ खिलाड़ी बनने के लिए एक अच्छे मनोवैज्ञानिक, प्रशिक्षक तथा अच्छी  तकनीक की आवश्यकता होगी। उसे इन सब के साथ सामंजस्य स्थापित करना होगा। इस प्रकार का कार्य टीम की तरह होता है।

उज्ज्वल भविष्य के लिए कौशल पूर्ण शिक्षा का महत्व

शिक्षा सिर्फ पाठ्यक्रम पूर्ण कराने पर ही आधारित नहीं होनी चाहिए अपितु वह एक विद्यार्थी को जीवन में आने वाले विभिन्न प्रकार के उतार-चढ़ावों, चुनौतियों व कठिनाइयों पर जीत दिलाने में सक्षम बनाने वाली व जीवन कौशल को सुधारने वाली होनी चाहिए। आधुनिक युग में शिक्षक व विद्यार्थी का संबंध तेजी से बदलता जा रहा है। शिक्षक व विद्यार्थी के बीच एक मित्रता का भाव होना चाहिए। शिक्षक के प्रति विद्यार्थी के मन में किसी भी प्रकार का भय उदासीनता व निराशा जैसे नकारात्मक भाव नहीं होने चाहिए।

एक कक्षा है, उसमें सारे चयनित विद्यार्थी चुपचाप बैठे हैं तथा एक शिक्षक जो विद्यार्थी के सामने ज्ञान बांट रहा है। ऐसी शिक्षण की परिपाटी व परंपरागत तरीका विद्यार्थी को पूर्णतया विफलता की ओर ले जाता है। शिक्षा मूल रूप से पाठ्यपुस्तक पर आधारित न होकर अनुग्रहित ज्ञान को जीवन में उपयोग में लाने वाली हो। पाठ्यपुस्तक पढ़ा कर आखिर में उनका सिर्फ एक मूल्यांकन करना पूर्ण रूप से विद्यार्थी को बहुत भारी नुकसान व विफलता की ओर ले जाना है। मूल्यांकन एक सतत प्रक्रिया है। यह निरंतर होती रहनी चाहिए।

शिक्षा में लचीलापन, जीवन को कौशल युक्त बनाना, विद्यार्थी के सीखने पर केंद्रित शिक्षा तथा भरपुर प्रौद्योगिकी का उपयोग ये सभी बिंदु एक नए ‘शिक्षा सिद्धांत’ 4.0 को जन्म देते हैं।

आधुनिक शिक्षा  की कार्यप्रणाली 

आधुनिक शिक्षा की कार्यप्रणाली विश्लेषणात्मक कौशल व चिंतन पर आधारित है। अर्जित ज्ञान का अपने जीवन में सही प्रकार से रूपांतरण व उपयोग करना ही बेहतर कैरियर व उज्ज्वल भविष्य की नींव है।

इस प्रक्रिया में प्रोजेक्ट बनाना, प्रयोगशालाओं में काम करना, कक्षा को कक्ष तक ही सीमित न रखकर दैनिक कार्य में आई समस्याओं को समझने के लिए मैदान में कक्षा की व्यवस्था करना तथा सीमित वातावरण में ही विभिन्न चुनौतियों का सामना करना, अपनी भावनाओं व मन को संतुलित व एकाग्र करना, सभी का पूर्ण महत्व है। यह सभी सफलता पाने की आधार शैली है। इन सभी तथ्यों को अपनाकर पाठ्य ज्ञान व वास्तविक ज्ञान का अंतर खत्म हो जाता है तथा विद्यार्थी सर्वांगीण विकास के पथ पर आगे बढ़ता है।

आधुनिक शिक्षण प्रणाली में प्रत्येक विद्यार्थी का उसके स्तर से मूल्यांकन करने का दृष्टिकोण व तरीका भी बेहतर हुआ है। 

सीखने की प्रक्रिया में प्रौद्योगिकी का उपयोग

शिक्षाविदों के मध्य परस्पर संबंधों में सुधार प्रौद्योगिकी की वजह से ही आया है। आज सीखने की प्रक्रिया में प्रौद्योगिकी का उपयोग एक मुख्य बिंदु बन गया है। हमारे दैनिक कार्यों में प्रौद्योगिकी की अहम भूमिका है। इस प्रकार शिक्षा में प्रौद्योगिक का समावेश न हो ऐसा असंभव है।

आज एक बहुत बड़ा अंतर देखने में यह मिलता है कि जब विद्यार्थी एक परंपरागत तरीके से शिक्षा ग्रहण करके विभिन्न क्षेत्रों में जाता है, तब वह आधुनिक प्रौद्योगिकी के ज्ञान से वंचित होने के कारण असफल रहता है।

कक्षा में भी प्रौद्योगिकी का भरपूर उपयोग होना चाहिए। प्रौद्योगिकी शिक्षा का एक अभिन्न अंग है। कृत्रिम बुद्धिमता (आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस),  संवर्धित वास्तविकता (ऑगमेंटेड रियलिटी), स्वचालन (ऑटोमेशन), रोबोटिक आभासी वास्तविकता (वर्चुअल रियलिटी) व डिजिटल मार्केटिंग इन सभी का एकीकरण 21वीं सदी की शिक्षा प्रणाली में मुख्य भूमिका निभाता है तथा यह संपूर्ण शिक्षा जगत में एक नवीन क्रांति को जन्म देता है।

प्रौद्योगिकी का सही प्रकार से उपयोग व प्रयोग विषय को आन्तरिक रूप से सीखने व उसके नवीनीकरण में ईंधन की भूमिका निभाता है। प्रौद्योगिकी का सही प्रकार से उपयोग शोधकर्ताओं के समय को भी बचाता है।

अंत में हम सभी को यह समझना होगा कि उपरोक्त सभी विभिन्न तथ्यों के बावजूद शिक्षक की अपनी अहम भूमिका रहती है। कुछ परामर्शदाताओं का कहना है कि सीखने की संपूर्ण प्रक्रिया में एक शिक्षक की कोई भूमिका नहीं रहती है। यह बिल्कुल गलत तथ्य है। विद्यार्थी के लिए शिक्षक एक सहायक व आदर्श प्रतिरूप है।

आज शिक्षण प्रणाली, शिक्षक व विद्यार्थी के पारस्परिक संबंधों में परिवर्तन लाने की आवश्यकता है न कि शिक्षक को प्रौद्योगिकी से विस्थापित करने की। बदलते आधुनिकरण व वैश्वीकरण को देखते हुए सिर्फ शिक्षण प्रणाली व शिक्षक–शिष्य के संबंधों में बदलाव लाने की आवश्यकता ही नहीं अपितु उन्हें अधिक मित्रवत व सौहार्दपूर्ण बनाने की भी आवश्यकता है।

(लेखक दुर्गावती हेमराज टाह स. वि. म. नेहरु नगर, गाजियाबाद-उ०प्र० में प्राचार्य है।)

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