भारतीय शिक्षा – ज्ञान की बात-3 (ज्ञान की महिमा जाने)


 – वासुदेव प्रजापति

पूर्व में हमने जाना कि परम चेतन तत्त्व ब्रह्म को जानना ही ज्ञान है। साथ में यह भी जाना कि ज्ञान अज्ञान से ढका हुआ है उस अज्ञान के कारण जीव मूढता को प्राप्त हो रहे हैं। स्वयं को कर्मों का कर्ता मान लेना ही मूढता है। परमात्मा ने मनुष्य मात्र को विवेक दिया हुआ है, उस विवेक के द्वारा इस मूढ़ता का नाश किया जा सकता है।

ज्ञान पवित्रतम है

जब व्यक्ति इस संसार की स्वतन्त्र सत्ता मानकर उससे सुख पाने की इच्छा करता है, तब सब प्रकार के दोष व पाप उत्पन्न होते हैं। किन्तु उस परमतत्त्व का ज्ञान होने से संसार की स्वतंत्र सत्ता नहीं रहती, सम्पूर्ण पापों का सर्वथा नाश हो जाता है और महान पवित्रता आ जाती है। इसलिए संसार में ज्ञान के समान पवित्र करने वाला दूसरा कोई साधन है ही नहीं। यह पवित्रता प्राप्त करने का अधिकार और अवसर मनुष्य के शरीर में ही है। ऐसा अधिकार किसी अन्य शरीर में नहीं है।

संसार में यज्ञ, दान, तप, पूजा, व्रत, उपवास, जप, ध्यान और प्राणायाम आदि जितने भी साधन हैं तथा गंगा, यमुना तथा गोदावरी आदि जितने भी तीर्थ हैं, वे सभी मनुष्य के पापों का नाश करके उसे पवित्र करने वाले हैं। परन्तु उन सबमें भी ज्ञान के समान पवित्र करने वाला कोई भी साधन नहीं है। क्योंकि वे सब तत्त्वज्ञान के साधन हैं और तत्त्वज्ञान उन सबका साध्य है।

विष्णु सहस्रनाम में परमात्मा के लिए ‘पवित्राणां-पवित्रम्’ कहा गया है, अर्थात् परमात्मा पवित्रों के भी पवित्र हैं। उन्हीं परम पवित्र परमात्मा का ज्ञान कराने वाला होने से तत्त्वज्ञान भी अत्यन्त पवित्र है। इसीलिए भगवान श्री कृष्ण गीता में कहते हैं ‘नहि ज्ञानेन सदृशं पवित्रमिह विद्यते।’

सभी कर्मों की परिसमाप्ति ज्ञान में होती है

श्रीमद्भगवद्गीता में बताया है कि जिन यज्ञों में द्रव्यों (पदार्थों) तथा कर्मों दोनों की आवश्यकता होती है वे द्रव्यमय यज्ञ कहलाते हैं। ऐसे द्रव्यमय यज्ञ से ज्ञान श्रेष्ठ है। क्यों श्रेष्ठ है? क्यों कि ज्ञानयज्ञ में द्रव्य और कर्म दोनों की आवश्यकता नहीं होती। इसीलिए सम्पूर्ण कर्म ज्ञानयज्ञ में परिसमाप्त हो जाते हैं। कर्मों की परिसमाप्ति ज्ञान में कैसे होती है? इसे हम इस प्रकार समझ सकते हैं। जब तक मनुष्य अपने लिए कर्म करता है तब तक उसका सम्बन्ध क्रियाओं और पदार्थों से बना रहता है। जब तक क्रियाओं और पदार्थों से सम्बन्ध बना रहता है, तब तक अन्तःकरण में अशुद्धि रहती हैं किन्तु जब कर्म अपने लिए नहीं किये जाते, लोक कल्याण हेतु किये जाते हैं तब अन्त:करण शुद्ध हो जाता है।

अपने लिए कोई भी कर्म न करने से अर्थात् संसार मात्र की सेवा के लिए ही कर्म करने से साधक के अन्तःकरण में स्थित दोनों दोष -मल और विक्षेप (चित्त की चंचलता) मिट जाते हैं। तब वह ज्ञान के द्वारा अज्ञान रूपी आवरण दोष को मिटाने के लिए कर्मों के स्वरूप से त्याग कर देता है। तब वह कर्मों व पदार्थों से ऊँचा उठ जाता है। अर्थात् कर्म और पदार्थ उसके लक्ष्य नहीं रहते, प्रत्युत् एक चिन्मय तत्त्व ही उसका लक्ष्य रहता है। इसे ही सम्पूर्ण कर्मों और पदार्थों का तत्त्वज्ञान में लीन होना या समाप्त होना कहा जाता है।

ज्ञानाग्नि सर्वकर्मों को भस्म कर देती है

जब हम चूल्हे में लकड़ी जलाते हैं तो अग्नि धीरे-धीरे पूरी लकड़ी को जला डालती है, केवल उसकी राख ही पीछे बचती है। ठीक वैसे ही ज्ञान रूपी अग्नि सम्पूर्ण पापों को इस प्रकार भस्म कर देती है कि उनका थोड़ा सा अंश भी शेष नहीं रहता।

हमारे यहाँ तीन प्रकार के कर्म माने गयें है संचित, प्रारब्ध और क्रियमाण। जैसे प्रज्ज्वलित अग्नि काष्ठ को भस्म कर देती है, वैसे ही तत्त्वज्ञान रूपी अग्नि उपर्युक्त तीनों कर्मों को भस्म कर देती है। जैसे अग्नि में काष्ठ का अत्यन्त अभाव हो जाता है, वैसे ही तत्त्वज्ञान में सम्पूर्ण कर्मों का अत्यन्त अभाव हो जाता है। तात्पर्य यह है कि ज्ञान होने पर कर्मों से अथवा संसार से सर्वथा सम्बन्ध विच्छेद हो जाता है। सम्बन्ध विच्छेद होने पर संसार की स्वतन्त्र सत्ता का अनुभव नहीं होता, प्रत्युत् एक परमतत्त्व ही शेष रहता है। ज्ञानाग्नि का सर्वकर्मों को भस्मसात करने का तात्पर्य यही है। हमारे शास्त्रों ने ज्ञान की ऐसी भारी महिमा बताई है। आओ! हम ज्ञान की महिमा बताने वाली कथा का मनन करें।

रत्नाकर की कथा

रत्नाकर नाम का एक व्यक्ति था। वह जंगल में आने-जाने वाले राहगीरों को तंग करता था। एक बार महर्षि नारद उस जंगल से गुजर रहे थे। रत्नाकर ने सदैव की भाँति नारदजी को भी रोका और कड़क आवाज में कहा कि जितना भी रुपया-पैसा तुम्हारे पास है, वह सब मुझे दे दो। नारदजी बोले मैं तो फक्क्ड़ हूँ मेरे पास तो कुछ भी नहीं है। रत्नाकर को उनके हाथ में वीणा दिखी तो पूछ लिया, हाथ में क्या है? यह तो वीणा है। क्या काम आती है? नारदजी ने बताया यह बजती है, मैं भगवान के भजन गाता हूँ और साथ में इस वीणा को बजाता हूँ। रत्नाकर के लिए वीणा नई चीज थी। उसने वीणा पहली बार देखी थी। अतः मन में जिज्ञासा उत्पन्न हुई। बोला मुझे भी बजाकर सुनाओ। नारदजी ने वीणा पर एक मधुर राग छेड़ा। उसे शब्द तो समझ में नहीं आये परन्तु मधुर संगीत का उसके मन पर प्रभाव हुआ। मन कुछ शान्त हुआ, कड़क आवाज में नरमी आ गई। वह शान्त स्वर में बोला, तुम कौन हो इससे मुझे कोई लेना-देना नहीं परन्तु मेरा नियम है कि मैं कुछ न कुछ लिए बिना किसी को भी यहाँ से जाने नहीं देता हूँ। तुम्हारे पास रुपये-पैसे नहीं है तो उनके बदले में यह वीणा ही दे दो। नारदजी बोले वीणा तो दे दूँगा परन्तु मुझे एक बात तो बता तू यह पाप कर्म करता ही क्यों है? वह बोला अगर यह नहीं करूँगा तो अपने माता-पिता, पत्नी व बाल-बच्चों को खिलाऊँगा क्या? अच्छा यह भी बता जिनके लिए तू यह पापकर्म करता है, क्या वे तुम्हारे इस पाप में भागी हैं? रत्नाकर सोच में पड़ गया, यह तो मैने कभी सोचा ही नहीं था। बिना घरवालों से पूछे क्या बताऊँ। तब नारद जी ने उसे सुझाया, जा घर जाकर सबसे पूछकर आ फिर मुझे बताना। रत्नाकर ने सोचा मैं पूछने के लिए घर जाऊँगा तो यह पीछे से भाग जायेगा। इसलिए उसने नारद जी को एक पेड़ से बाँध दिया और चल पड़ा घर की ओर।

घर जाकर माता-पिता, पत्नी और बच्चों से पूछा कि मैं तुम्हारे लिए उलटे-सीधे पापकर्म करता हूँ, क्या तुम सब मेरे इस पाप में भागीदार हो? सबने एक ही बात कही कि हमें खिलाना यह तुम्हारा काम है। तुम क्या करके हमें खिलाते हो, यह तुम जानों। हम तुम्हारे पाप में भागी नहीं होंगे। घरवालों का उत्तर सुनकर उसका सिर चकराया और चिन्ता में पड़ गया, इस पापकर्म का भागी मैं अकेला। परिवार का कोई भी इसमें मेरा भागीदार नहीं फिर मैं यह क्यों कर रहा हूँ। रत्नाकर भागा-भागा नारद जी के पास आया। उनके चरणों में गिरकर याचना करने लगा कि मुझे इस पाप से बचा लो।

नारदजी की कृपा से उसका अज्ञान रूपी आवरण हट गया और उसके अन्तःकरण में ज्ञान की किरण प्रस्फुटित हुई। ज्ञान होते ही पाप कर्मों से और इस संसार से सम्बन्ध छूट गया और परमात्मा के साथ सम्बन्ध जुड़ गया। यही रत्नाकर आगे चलकर ऋषि वाल्मीकि बने। रामायण जैसे श्रेष्ठ ग्रन्थ की रचना की। माता सीता इन्ही के आश्रम में रहीं, वहीं लव-कुश का जन्म हुआ। महर्षि वाल्मीकि का जीवन ज्ञान की महिमा का एक अनुपम उदाहरण है।

(लेखक शिक्षाविद् है, भारतीय शिक्षा ग्रन्थमाला के सह संपादक है और विद्या भारती संस्कृति शिक्षा संस्थान के सह सचिव है।)

और पढ़ें : भारतीय शिक्षा – ज्ञान की बात-2 (आओ, अज्ञान को भी जानें)

Facebook Comments