“पालकों, शाला जाओ” – अभिभावक विद्यालय में जाकर क्या करे?


 – दिलीप वसंत बेतकेकर

शीर्षक पढ़कर आप भी चौंक गए? आश्चर्य का झटका लगा?  शाला में पढ़ने जाओ, ऐसा अर्थ नहीं, देखने जाईये! जानकारी लेने हेतु जाईये! अपने बच्चे शाला में क्या करते हैं, कैसे और क्या पढ़ते हैं, कैसा व्यवहार करते हैं यह सब समझने के उद्देश्य से शाला जाईये!

आजकल कुछ स्थानों पर पालक-शालाएं (Parenting Coaching) भी देखने में आती हैं, उसमें सहभागी बनने में अनुचित कुछ भी नहीं। यदि पसंद न आये तो छोड़ दें। परन्तु बच्चों की प्रगति देखने के लिये, जानकारी लेने तो जायेंगे न?

कुछ पालकों को तो बच्चे किस कक्षा में पढ़ रहे हैं, यह भी जानकारी नहीं होती है, विशेषकर ग्रामीण क्षेत्र में!

शहरों में विपरित दृश्य दिखाई देते हैं। शाला के कार्यों में अनचाहे घुसपैठ कर और समय नष्ट करने वाले पालकगण भी होते हैं।

“अच्छा, अच्छा, ठीक है, शाला में कभी कभार जाना चाहिये ये बात तो समझ गये, परन्तु वहां जाकर हम करें कया?” ऐसा प्रश्न तो मन में उभरा न? वही अब हम देखेंगे।

“कैसी चल रही है मेरे बच्चों की पढ़ाई? शैतानी-मस्ती तो नहीं करता है वह शाला में?” आदि दो-चार साधारण से प्रश्न शिक्षकों से अथवा मुख्य अध्यापक से पूछकर वस्तुस्थिति की जानकारी नहीं मिलेगी। इस हेतु अधिक गहराई से, विस्तृत रूप से प्रश्न पूछना आवश्यक है। शिक्षकों के साथ विस्तार से बातचीत करनी चाहिये। अपना बालक नियमित रूप से शाला में उपस्थित हो रहा है अथवा नहीं? समय बद्धता का पालन जीवनभर के लिए महत्त्वपूर्ण है। बाल्यावस्था में ये आदत गढ़ना आसान हैं। बड़े होने पर यह आदत बनना कठीन हो जाता है। यह आदत शालेय जीवन से ही बनती है तो सभी के समय की बचत हो जाती है।

कक्षा अध्यापक से बातचीत के दौरान यह बात अवश्य जान लें कि अपना बच्चा कक्षा में किस स्थान पर बैठता है। कुछ बच्चे पीछे की बेंच पर बैठना पसन्द करते हैं। यदि पीछे बैठने की आदत बन जाये तो उससे अनेक समस्याएँ निर्मित होती हैं।

यह पीछे बैठने की आदत केवल शारीरिक दृष्टि से पीछे रहना न होकर सभी बातों में पीछे रहना बन जाता है, वैसी आदत बन जाती है। कुछ शालाओं में बच्चों को कक्षा में स्थान बदल-बदल कर बैठाने की व्यवस्था की जाती है। कल आखिरी बैंचों पर बैठे बालकों को आगे की पंक्ति में, आगे की प्रथम पंक्ति वाले बालकों को दूसरी पंक्ति में, दूसरी पंक्ति वाले को तीसरे में बैठाया जाता है। शिक्षकों द्वारा पूछे जाने वाले प्रश्नों को टालने के लिए कुछ बच्चे जान बुझकर पीछे की पंक्ति में बैठना पसंद करते हैं। कुछ बालक मस्ती-शैतानी करना आसान रहेगा इस उद्देश्य से पीछे बैठना उचित समझते हैं। इसीलिये पालकों को बच्चों का कक्षा में बैठने का स्थान जानना आवश्यक हो जाता है। दृष्टि दोष अथवा श्रवण दोष युक्त बच्चों को आगे की पंक्ति में स्थान दिया जाना उचित रहेगा। ऐसी समस्या शिक्षकों के ध्यान में ला देना आवश्यक है।

कक्षा में शिक्षक के पढ़ाने के समय अपना पाल्य ठीक से ध्यान देता है क्या? सुनता है या समझता हैं? सुनना और श्रवण करना (समझना) इसमें बहुत अंतर है। सुनना केवल एक शरीरिक क्रिया है तो जो कान करता है, श्रवण करने हेतु कान, आँखें और मन का एकत्र होना आवश्यक है। इन तीनों का समायोजन होना ही श्रवण क्रिया है और श्रवण होना ही समझना है। अनेक बार बच्चे केवल सुनते हैं, श्रवण नहीं करते। अंग्रेजी में भी दो शब्द हैं ‘हियरिंग’ (Hearing) और ‘लिसनिंग’ (Listening)। कुशल शिक्षक बच्चे की आखों को देखकर ही समझ जाता है कि बच्चा केवल सुन रहा है अथवा श्रवण कर रहा है।

पैंतीस-चालीस मिनट की अवधि में कक्षा में शिक्षक बोलता है, इसी दौरान कभी श्यामपट पर लिखता है, कभी मित्र बनता है। बोला जाने वाला प्रत्येक शब्द श्यामपट पर लिखना संभव नहीं होता। कुछ बच्चे श्यामपट पर लिखी बातें ही अपनी नोटबुक में उतार लेते हैं। कुछ तो शिक्षक के ‘लिखो’ कहने पर ही लिखते हैं, और कुछ लिखने का कार्य करते ही नहीं।

जो बातें शिक्षक श्यामपट पर नहीं लिखते, केवल व्याख्यान रूप में बोलते हैं, उसमें से मुख्य बातें चुनकर कॉपी में उतार लेना आवश्यक है। परन्तु ऐसा करने वाले विद्यार्थियों की संख्या कम ही होती है। इस पूर्ण प्रक्रिया को ‘नोट टेकिंग’ कहते हैं। स्वयं अध्ययन करते हुए भी इसी प्रकार नोट्स बनाना महत्त्वपूर्ण प्रक्रिया है जिसकी आदत डालना उपयोगी है। अपने बच्चे यह सब करते हैं अथवा नहीं, शिक्षक से जानकारी लेना पालक का कर्तव्य है। पालक को कुछ जानकारी तो बालक की कॉपी देखकर भी मिल सकती है।

कोई कक्षा समाज का छोटा रूप, छोटा प्रतिबिम्ब ही होती है। समाज में जैसी वृति-प्रवृत्तियां होती हैं वे सब लघुरूप में कक्षा में भी दिखाई देती हैं। सामंजस्य रखने वाले, सहायता करने वाले, मिलनसार प्रवृत्ति के, झगड़ालू, दंगा फसाद करने वाले, सभी प्रकार के बच्चे किसी भी एक कक्षा में रहते हैं। कुछ बच्चे अपने घर पर शांत, अनुशासित होते हुए जब अपने मित्र समूह से मिलते हैं। तब उनका व्यवहार भिन्न प्रकार का हो जाता है।

‘समूह’ का मनोविज्ञान एक अलग प्रकार का शास्त्र है। अपना पाल्य भी समूह में किस प्रकार का व्यवहार करता है यह पालक को जानना आवश्यक है। शाला में अनेक विषय पढ़ाए जाते हैं। प्रत्येक बालक को प्रत्येक विषय में रुचि होना आवश्यक नहीं। अपने बच्चे को कौन से विषयों में रूचि है, किस विषय में रूचि नहीं, कौन से विषय कठिन लगते हैं, किस विषय की कक्षा में वह अधिक ध्यान देता है, ये सब जानकारी विद्यार्थी को सहायता देने की दृष्टि से महत्त्वपूर्ण है। उसके भावी जीवन में, उच्च शिक्षा की दृष्टि से भी यह जानकारी उपयुक्त होती है। बच्चे का शिक्षक के प्रति कैसा दृष्टिकोण है, यह जानने पर विषय में रुचि अथवा अरुचि के बारे में जानना आसान हो सकता है। सामान्यतः देखा गया है कि जो शिक्षक बच्चे को अच्छा लगता है उस शिक्षक के द्वारा पढ़ाया जाने वाला विषय भी बच्चा पसंद करता है। अधिकतर विषय में रुचि उस विषय को पढ़ाने वाले शिक्षक को बच्चे द्वारा पसन्द करना अथवा न करना पर निर्भर करती है। विद्यार्थी की देहबोली (Body Language) से इस बात की जानकारी मिल सकती है। शिक्षकों से भी इस सम्बन्ध में जानकारी लेनी चाहिए।

शिक्षकों के अतिरिक्त भी बच्चे का सम्बन्ध अन्य कुछ व्यक्तियों से होता है, जैसे- प्रयोगशाला सहायक, कार्यालय के कर्मचारीगण, पुस्तकालय कर्मचारी, चौकीदार आदि। इन लोगों से भी जानकारी प्राप्त की जा सकती है।

पुलिस अधिकारी अथवा गुप्तचरों द्वारा की जाने वाली जांच-पड़ताल के समान जानकारी लें, ऐसा अर्थ नहीं है फिर भी बच्चे के बारे में बिल्कुल अनजान रहना भी उचित नहीं। अपने पाल्य के बारे में सही जानकारी लेना उसी के हित में है।

पालक-शिक्षक संघ की बैठकों में अब पालकों की उपस्थिति पूर्व की अपेक्षा अधिक दृष्टिगोचर हो रही है। परन्तु यह उपस्थिति केवल औपचारिक न रहे। बच्चे के सर्वांगीण विकास हेतु आवश्यक सक्रियता रखते हुए बैठक में उपस्थित हों। पालकों की यह शाला भेंट, शिक्षक भेंट, शिक्षक-पालकों में एक परस्पर पूरक मित्रता का नाता निर्मित कर सकता है।

तो पालक मित्रों, जाएंगे न आप शाला में?

(लेखक शिक्षाविद् है और विद्या भारती अखिल भारतीय शिक्षा संस्थान के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष है।)

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