शिशु शिक्षा 18 (नव दम्पति शिक्षण 3 – श्रेष्ठ संतान के लिए योग, संकल्प और प्रार्थना)

 – नम्रता दत्त

श्रेष्ठ संतान की प्राप्ति की आकांक्षा प्रत्येक माता पिता को होती है क्योंकि वे मरने के बाद भी अपनी संतान के रुप में जीवित रहते हैं। श्रेष्ठ संतान से ही वंश के नाम, मान और शान में वृद्वि होती है। यदि श्रीराम, पिता की आज्ञा पालन कर वन को न जाते तो आने वाली पीढियां कैसे कहती – “रघुकुल रीति सदा चली आई , प्राण जाए पर वचन न जाई

लेकिन मात्र आकांक्षा से तो काम नहीं चलता। इसके लिए तो सुनियोजित योजना बनानी पङती है। संतान को जन्म देना कोई मात्र शारीरिक मनोरंजन करना नहीं है। यदि गर्भ धारण करना स्त्री और पुरुष बीज का मिलन मात्र ही है तो श्रेष्ठ संतान की आकांक्षा की पूर्ति नहीं हो सकती परन्तु यदि दोनों के प्राण, मन, संस्कार, भावना, बुद्वि तथा आत्मा का मिलन होता है तो निश्चित रूप से श्रेष्ठ संतान की प्राप्ति होगी।

मानव जीवन का उद्देश्य है – मोक्ष प्राप्ति और शिक्षा का उद्देश्य भी है – मोक्ष प्राप्ति। मानव को जन्म भी मानव ने ही देना है और शिक्षा भी मानव ने ही देनी है तो दोनों (जन्म और शिक्षा) के लिए उसे ही सुपात्र एवं सुयोग्य बनना पङेगा। यह योग्यता दम्पति में योग, संकल्प और प्रार्थना से आएगी। तो आइए क्रमशः संक्षेप में इस पर ही विचार कर लेते हैं-

योग (यम एवं नियम का पालन करना)

सामान्यतः योग को अध्यात्म से जोङा जाता है उसमें भोग का कोई स्थान नहीं है। फिर भी गृहस्थाश्रम में रहने वाले ऋषि मुनियों के नाम हम शास्त्रों में पढते हैं। वे ऋषि गृहस्थाश्रम में पवित्र जीवन व्यतीत करते हुए धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष के द्वारा आत्मतत्व को प्राप्त करते थे। अतः ऐसी स्थिति में संतानवान होना पुण्य का फल माना जाता है। इस प्रकार श्रेष्ठ संतान की प्राप्ति में योग का विशेष योगदान है। योग साधना (शरीर, मन और बुद्धि की पवित्रता) भी है और साध्य (अध्यात्म) भी है। योग के माध्यम से दम्पति में जैसे जैसे साधना (शरीर, मन और बुद्धि की पवित्रता) बढेगी, वैसे वैसे वे साध्य (अध्यात्म/देवत्व) की ओर स्वतः ही बढते जाएंगे और इस दैवी संपदा की वृद्वि से वे श्रेष्ठ संतान के अधिकारी बनते जाएंगे। योग ने अर्थ और काम को धर्म और मोक्ष (धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष) के बीच में रखा है। वास्तव में योग, जीवन जीने की एक शैली है। भौतिक साधनों में सुख ढूढने वालों के सुख थोङे समय के ही होते हैं। परन्तु स्थायी सुखों की अनुभूति करने के लिए यम और नियमों (अष्टांग योग से) का पालन करना चाहिए।

यम अर्थात् सत्य, अहिंसा, अस्तेय (चोरी नहीं करना), अपरिग्रह, (आवश्यकता से अधिक नहीं रखना) एवं ब्रह्मचर्य पालन।

ब्रह्मचर्य पालन से मनुष्य इन्द्रियों पर विजय प्राप्त करता है जिसके कारण उसमें ओज का संचार होता है और सद्गुणों का विकास होता है। सृष्टि को देखने की दृष्टि बदल जाती है। दम्पति एक दूसरे को काम वासना से नहीं अपितु श्रद्वा भाव/एकात्म भाव से देखेंगे तो शारीरिक आकर्षण के स्थान पर आत्मिक आकर्षण बढ़ेगा। इसके फलस्वरूप श्रेष्ठ संतान प्राप्त होगी।

नियम अर्थात् शौच, संतोष, तप, स्वाध्याय एवं ईश्वरप्राणिधान।

योगाभ्यास

प्रतिदिन की दिनचर्या में सूर्योदय से पूर्व जागना, सूर्य दर्शन करना, सूर्य को अर्ध्य देना, आसन एवं प्राणायाम करना, यज्ञ करना (साप्ताहिक) आदि भी योगाभ्यास ही है।

गुरू एवं घर के बङों की सेवा, गरीबों, गाय, वृक्षादि की सेवा करना। सबसे प्रेमपूर्वक व्यवहार करना, काम क्रोध जैसे विकारों का त्याग करना, आहार विहार का ध्यान रखना, यम-नियम का कढाई से जीवन में पालन करना अर्थात् उसे जीवन शैली बनाना ही योगाभ्यास करना है। इससे व्यक्तित्व पूर्णतः बदल जाएगा और दम्पति श्रेष्ठ संतान के पात्र बन जायेंगे।

संकल्प एवं प्रार्थना

जितना संकल्प बलवान होता है उतना फल भी बलवान होता है। जब मनुष्य स्व से ऊपर उठकर विश्व कल्याण के लिए दृढ संकल्प करता है तो यह समग्र सृष्टि संकल्प को पूरा करने में सहयोगी और साथी बन जाती है। देश, काल और परिस्थितियों के अनुसार माता पिता योग्य संतान को जन्म देने की क्षमता की पूर्ति अपने संकल्प मात्र से कर सकते हैं।

माता जीजाबाई इसका साक्ष्य हैं। माता जीजाबाई ने देश को विधर्मियों के चंगुल से छुङाने के लिए गुरु समर्थ रामदास स्वामी के मार्गदर्शन में तपस्या की। बालक शिवा को जन्म दिया, जिसने भारत माता को विधर्मियों की गुलामी से मुक्त कराया। भारत की जय जयकार हुई।

किसी भी चित्र को साकार करने से पहले वह कल्पना में जन्म लेती है। यह कल्पना ही मूलतः रचना का कारण बनती है। एक सूई से लेकर एक हवाई जहाज की रचना मन मस्तिष्क में ही कल्पना के रूप में उभरी थी। कल्पना को साकार करने के दृढ संकल्प ने उसे साकार करने में सहायता की। अतः –

1 पति पत्नी को कैसी संतान चाहिए यह सुनिश्चित कर ही संकल्प करना चाहिए।

2 अपने संकल्प की पूर्ति के लिए अपने आराध्य देवी देवता से श्रद्वापूर्ण प्रार्थना करनी चाहिए। प्रार्थना स्व के कल्याण के लिए नहीं, सर्व के कल्याण के लिए निःस्वार्थ भाव से करनी चाहिए।

3 पति पत्नी के आत्मीय भाव से की गई प्रार्थना से ही परमात्मा का शुद्व अंश आकर्षित होता है।

4 देह सुख के भाव से दूर श्रेष्ठ संतान प्राप्ति के भाव से प्रार्थना करनी चाहिए। इस प्रकार दम्पति के मिलन से श्रेष्ठ संतान Product एवं देहसुख by product बन जाता है।

5 गर्भाधान से पूर्व भी दम्पति को प्रार्थना करनी चाहिए कि परमात्मा ने श्रेष्ठ संतान देने के लिए उनका चयन किया है। गर्भाधान के पश्चात् भी धन्यवाद के रूप में प्रार्थना करनी चाहिए।

6 प्रार्थना शुद्व अंतःकरण से मन के सहज भावों के साथ करनी चाहिए।

7 शिशु को भगवान का रूप माना जाता है और भगवान को अपने घर बुलाने के लिए हम जैसे भी भाव पैदा करते हैं वैसी ही प्रार्थना उस भगवान रूपी शिशु के लिए करनी चाहिए।

आज मात्र देहसुख से बने माता पिता केवल डाक्टर, दवाइयां, डाइट और अस्पताल आदि का विचार ही करते हैं। तभी तो श्रेष्ठ संतान जन्म नहीं लेती। यदि हम अपने ऐतिहासिक महापुरूषों की जन्म तिथियों पर नजर डालें तो ध्यान में आएगा कि कितने वर्ष से महापुरूषों ने जन्म ही नहीं लिया। कारण है माता पिता की अज्ञानता और प्रेरणा देने वालों निःस्वार्थ लोगों की कमी। प्राचीन युग में ऋषि मुनि गृहस्थाश्रमों में जाकर ऐसी प्रेरणा एवं मार्गदर्शन देते थे और पुत्रेष्ठि यज्ञ आदि भी कराते थे। गर्भवती माताओं को संस्कार देने की दृष्टि से गुरुकुल में रखा जाता था और गुरु माता उनकी देखभाल करती थीं।

सौभाग्यवश बीज संरक्षण में लगे कुछ दम्पति आज भी ऐसी तपस्या में लगे हुए हैं।

बहिन रेश्मा ने गर्भाधान से पूर्व न केवल ब्रह्मचर्य का पालन किया वरन् प्राकृतिक घर में निवास किया, गाय के दूध से बने पदार्थों को अपने सात्विक भोजन का हिस्सा बनाया, योगाभ्यास, संकल्प, प्रार्थना, गर्भसंवाद आदि नियमित किया। गर्भधारण के समय शुभ मुहूर्त आदि का भी ध्यान रखा। प्रसव के पश्चात भी 40 दिन तक अंधेरे कमरे में दीपक के प्रकाश में रही। बच्चे की एक भी फोटो नहीं खींची। उसने एक मेधावी बेटी हरि श्री को जन्म दिया। समर्थ भारत प्रकल्प से जुङकर कई दम्पति श्रेष्ठ संतान को जन्म देने की तपश्चर्या में पुरूषार्थ कर रहे हैं। समाज, राष्ट्र और यह सृष्टि उनकी आभारी है।

(लेखिका शिशु शिक्षा विशेषज्ञ है और विद्या भारती उत्तर क्षेत्र शिशुवाटिका विभाग की संयोजिका है।)

शिशु शिक्षा 17 (नव दम्पति शिक्षण 2 – गर्भाधान के नीति नियम एवं पूर्व तैयारी)

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