बाल केंद्रित क्रिया आधारित शिक्षा-20 (संगीत शिक्षा)


संगीत का जीवन में विशेष महत्व है। फ़ाइन आर्ट शब्द हमने सुना होगा। फ़ाइन आर्ट में तीन विषय आते है – कला, संगीत और साहित्य। उन्हें फ़ाइन आर्ट क्यों कहते है क्योंकि यह जीवन को फ़ाइन बनाते है। संगीत जीवन से जुड़ा है। शिशु जब रोता है तो उसे लोरी सुनाओ या धीरे-धीरे सीटी बजाओ तो रोना बंद हो जाता है। व्यक्ति अच्छा संगीत सुने तो मन आनंदित हो जाता है।

शिक्षा में संगीत विषय यह केवल उत्सव पर सांस्कृतिक कार्यक्रमों के लिए ही नहीं है बल्कि इसका सभी विषयों से जुड़ाव है। सामान्यतः विद्यालय में संगीत मंचीय कार्यक्रमों के लिए होता है और कहीं-कहीं 11वीं, 12वीं कक्षा में ऐच्छिक विषय के रूप में पढ़ाया जाता है जो कि प्रायोगिक कम करवाया जाता है। एक बात और कई स्थानों पर आती है कि संगीत आचार्य नहीं मिलता और कभी मिलता है तो संगीत का तज्ञ नहीं होता। अधिकांश स्थानों पर संगीत विद्यालय के कुछ प्रतिशत विद्यार्थियों के लिए ही होता है। प्राथमिक कक्षाओं अथवा अधिकाधिक कक्षा 8 के विद्यार्थियों में संगीत के प्रति रूचि रहती है। जैसे-जैसे कक्षा बढ़ती है वैसे-वैसे पाठ्यक्रम का दवाब बढ़ने के कारण मुख्य विषयों में पर ध्यान अधिक रहता है और संगीत को गौण मानकर रूचि व ध्यान घटता जाता है।

क्यों आवश्यक है संगीत शिक्षा : विद्यालय में संगीत विषय का क्रियान्वयन बालक के सर्वांगीण विकास में गति बढ़ाता है। संगीत अभ्यास से एकाग्रता बढ़ती है। संगीत बालक के शैक्षणिक स्तर को बढ़ाने में सहायक है। पंचकोशीय विकास में मनोमय कोश का विकास संगीत से अधिक होता है। जीवन को आनन्दमय बनाने की दृष्टि से संगीत के महत्व के प्रति जागृति, संगीत की रुचि जगाना, संगीत के प्रभाव की जानकारी आदि विद्यालयीन शिक्षा में आवश्यक है। विशेष ध्यान देकर संगीत शिक्षा विद्यालय में क्रियान्वित होगी तो लाभ दिखेगा और विद्यार्थियों के जीवन पर दूरगामी प्रभाव होगा।

कैसे करें क्रियान्वयन : कक्षा एक से दस तक साप्ताहिक न्यूनतम एक कालांश प्रत्येक कक्षा को दिया जाए। यदि संगीत आचार्य विद्यालय में है तो अच्छा है। यदि संगीत आचार्य विद्यालय में नहीं है तो आचार्य परिवार में इस कालांश का आवंटन हो। विद्यालय में संगीत कक्ष है तो कक्षा संगीत कक्ष में जाए, यदि संगीत कक्ष नहीं है तो कक्षाकक्ष में ही संगीत का कालांश लगे।

प्रारंभ में बालकों को अच्छा संगीत सुनाया जाएँ। अच्छा संगीत वाद्य बजाकर, गाकर या डिजिटल भी हो सकता है। आचार्य स्वयं बजाएगा या गाएगा तो प्रेरणा व उत्साहवर्धन अच्छा होगा। बालकों में किस प्रकार के संगीत में रूचि है इस पर ध्यान देकर पहचान करने की आवश्यकता है। जिस प्रकार के संगीत में उनकी रूचि है उन्हें उसी प्रकार का संगीत सुनने के लिए प्रेरित करें। व्यक्ति जैसा श्रवण करता है वैसा ही आचरण में आता है। देशभक्ति गीत सिखाने के लिए प्रारंभ में बालकों को गीत के शब्द बोलने आएं एवं उन्हें  शब्दों का अर्थ व भाव बताया जाए। गीत का भाव समझ में आने से उसे कंठस्थ कर गाने का उत्साह मिलता है।

वंदना (प्रार्थना) सभा में अधिकाधिक विद्यार्थियों को अग्रेसर बनने का मौका दे। उसके लिए कक्षाशः कालांश में जिन विद्यार्थियों का गायन अच्छा है और वादन में रूचि है उनका चयन करें व टोली बनाएं। उन्हें अभ्यास कर परिष्करण के लिए प्रेरित करे। ठीक स्तर होने पर वंदना में अवसर दे। जितनी अधिक टोली बनेगी संगीत विषय उतना अधिक प्रभावकारी होगा। एक विद्यालय में ध्यान आया कि वहां कक्षाश: एवं कक्षा क्रमांक अनुसार सभी को क्रमशः मौका देते है। ऐसा अच्छा प्रयोग है।

गायन के साथ-साथ सभी को ताल सिखाएं। ताली, चुटकी, थाप से ताल देना सिखा सकते है। वाद्य सिखाने की दृष्टि से छोटे ताल वाद्य सिखाने से प्रारम्भ करे। छोटे ताल वाद्य डपली, खंजरी, मंजीरा, करताल आदि हो सकते है। छोटे ताल वाद्य आने से ढोलक, तबला आदि सिखाना सरल होगा। शिशुवाटिका व प्राथमिक कक्षाओं में गीत अभिनय के साथ करवाएं। इससे नृत्य की रूचि बढ़ेगी। नृत्य अच्छा सिखाने के लिए ताल के साथ स्टेप सिखाएं। हारमोनियम में प्रारंभ में ‘स’ को अच्छे से सिखाएं ताकि स्वरों व वादन के विषय में आधार दृढ़ हो सके।

संगीत अभ्यास का विषय है। जितना अधिक अभ्यास होगा, उतना निखार आएगा। बालक जब यह सोचे कि घर पर तो वाद्य उपलब्ध नहीं है, मैं कैसे अभ्यास करूँ? और संगीत का कालांश सप्ताह में एक बार आता है। ऐसे में बालक को बताया जाए कि घर में मेज बजा सकते है, थाली-गिलास-चम्मच से अभ्यास कर सकते है। ऐसा करने से उनके हाथ खुलेंगे और वाद्य पर जल्दी पकड़ बना सकेंगे।

गायन, वादन और नृत्य में से किसी न किसी विधा में बालक की रूचि मिल ही जाती है। बालक की रूचि पहचान कर उसी विधा में आगे बढाएं। बालक को अवसर मिलते रहने से विधा विकसित होगी।

कक्षा शिक्षण में मुख्य विषयों के साथ संगीत को जोड़ेंगे तो विषयों में रोचकता बढ़ेगी। भाषा में काव्य रचनाओं को गाकर अभ्यास करवाएँगे तो आनंद भी बढ़ेगा और अधिगम भी। गणित में गिनती, पहाड़े ताली के साथ गाकर अभ्यास करवाया जाए। इतिहास के विषय में काव्य पंक्तियाँ, गीत, शायरी आदि आते है उन्हें गायन से करवाया जा सकता है।

हर एक को मौका कैसे मिल सकता है, इसका विचार करे। संगीत के कालांश में प्रत्येक के हाथ में छोटा-बड़ा वाद्य हो। विभिन्न कार्यक्रमों व गतिविधियों में सभी को आगे आने का मौका दे। सभी के मन में जिज्ञासा बनी रहे कि मेरा नम्बर कब आएगा। सतत अभ्यास के लिए प्रेरित करते रहे। विद्यालय वार्षिकोत्सव में कक्षाशः कार्यक्रम तैयार करवाएं ताकि सभी को अवसर मिले एवं परस्पर सहयोग की भावना खड़ी हो।

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