बाल केन्द्रित क्रिया आधारित शिक्षा-18 (कला विषय शिक्षण)

 – रवि कुमार

सामान्यतः कला विषय के प्रति उदासीनता रहती है। छोटी कक्षाओं में कला विषय का कार्य करवाया जाता है तो विद्यार्थियों को आनंद आता है। जैसे-जैसे कक्षा बढ़ती है वैसे-वैसे ये आनंद कम होता जाता है और धीरे-धीरे समाप्त प्राय: हो जाता है। जबसे अंक केन्द्रित शिक्षा का रुझान बढ़ा है और सभी डॉक्टर-इंजीनियर बनना चाहते है तो मुख्य विषय पर ही फोकस रहता है, शेष सब गौण होते जाते है।

कला जीवन में आनंद लाती है। किसी उत्सव या शुभ कार्य के समय घर में साज-सज्जा होती है तब करने वाला व देखने वाला आनंदित हो जाता है। साज-सज्जा की विभिन्न परम्पराएं अपनी संस्कृति को सजोने का कार्य कर रही है। ऐसे में कला से विमुख होना भविष्य के लिए खतरे की घंटी है क्या? क्या विद्यार्थी को संस्कृति से दूर होने क्या ठीक है? इस पर शिक्षा जगत में गहन चिंतन की आवश्यकता है। विद्यार्थियों में कला विषय की रूचि बनी रहे एवं बड़ी कक्षाओं में भी वे कला विषय पढ़े इस पर विशेष कार्य करने की आवश्यकता है।

विषय नहीं गतिविधि के रूप में पढाएं : कला को जब विषय के रूप में पढ़ाते है तो गृहकार्य, टेस्ट-परीक्षा आदि जुड़ जाते है। जैसे-जैसे कक्षा बढ़ती है तो मुख्य विषयों का दवाब विद्यार्थी पर बढ़ता है। कला विषय का भी ऐसा होगा तो रूचि कम होना स्वाभाविक है। कला को विषय की बजाय गतिविधि के रूप में पढाएं अर्थात् कोई गृहकार्य नहीं, कोई टेस्ट-परीक्षा नहीं। जो भी कार्य होगा कालांश के दौरान ही होगा। ऐसे में पुस्तक की भी आवश्यकता नहीं होगी। ऐसा होने से आनंद बढ़ने के साथ रूचि भी बनी रहेगी।

मूल अवधारणा स्पष्ट हो : मूल अवधारणा Basic concept की बात तो विज्ञान व गणित में आती है, फिर कला विषय में ऐसा क्यों? ऐसा इसीलिए कि सामान्यतः आचार्य जब कला विषय पढ़ाता है तो सब बातें विद्यार्थी पर छोड़ देता है। वो सोचता है कि ये हुनर तो भगवान से भेंट स्वरुप मिलता है। इसीलिए मूल अवधारणा व तकनीकी बातों को स्पष्ट करने पर ध्यान नहीं देता। इसीलिए भी रूचि नहीं बढ़ती। बिना स्केल के सीधी रेखा कैसे बनती है, फ्री हैण्ड स्केच कैसे बनता है, शेडिंग कैसे होती है, रंगों की पहचान, रंग समायोजन, दो अथवा तीन रंगों को मिलाकर नया रंग कैसे बनता है, चेहरा कैसे बनेगा, रंगों की सामग्री के प्रकार, ब्रश के प्रकार आदि ऐसी अनेक बाते हैं जिनके विषय में स्पष्टता होनी आवश्यक होती है।

घर की दैनदिन सज्जा के साथ जोड़े : घर में विभिन्न अवसरों पर क्या सज्जा की जा सकती है, घर के मुख्य द्वार पर बंदनवार किस-किस प्रकार की बनाई जा सकती है, मुख्य द्वार पर रंगोली बनाई जा सकती है, प्रवेश द्वार को सजाया जा सकता है, कक्ष की सज्जा, सजावट की सामग्री आदि के विषय में सिखाएँगे तो रूचि स्वतः बढ़ेगी। विद्यार्थी को विद्यालय परिसर की सज्जा में सहभागी बनाकर अच्छा सिखाया जा सकता है।

जीवन मूल्य भी सिखाएं : नई पीढ़ी के लिए आवश्यक है कि उन्हें कला के साथ जीवन मूल्य भी सिखाएं जाएँ। उदाहरण स्वरुप कोई प्रकृति दृश्य बनाना सिखाया तो उस पर चर्चा करते हुए प्रकृति संरक्षण की बात सिखा सकते है। दीपावली के आसपास राम का चित्र बनाना सिखाया तो राम के चरित्र की चर्चा सिखाने से पूर्व कर सकते है।

विवेकानंद शिला स्मारक कन्याकुमारी में जिस शिल्पकार को स्वामी विवाकानंद की विशाल मूर्ति बनाने के लिए निश्चित किया गया, उसने कहा कि मुझे स्वामी विवेकान्द की जीवनी लाकर दीजिए पहले मैं उनके जीवन को पढूंगा, उनके चरित्र को समझूंगा तभी मूर्ति बनाऊंगा। यदि उनके चरित्र को बिना समझे मूर्ति बनाऊंगा तो वो कैसी बनेगी यह कह नहीं सकता। जीवनी पढकर, चरित्र समझकर बनाऊंगा तो वैसे भाव मूर्ति में डाल सकूँगा।

लोक परम्परा अवश्य सिखाएं : आज लोक परम्पराएं विलुप्त होती जा रही है। लोक परम्पराओं के साथ हमारा इतिहास जुड़ा हुआ है। उसमें जीवन की कोई न कोई सीख होती है। इन लोक परम्पराओं से नई पीढ़ी को जोड़ना आवश्यक है। अहोई अष्टमी, गोवर्धन पूजन, सांझी, थापा आदि हरियाणा की लोक परम्परा से जुड़े है। इसी प्रकार भारत के हर प्रान्त में लोक परम्परा से जुड़ा हुआ कुछ न कुछ रहता है। इन उत्सवों पर पारंपरिक सज्जा विद्यार्थियों को सिखाकर लोक परम्परा

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