स्तनपान बच्चे के अलावा माँ के लिए भी वरदान


–  आभा जैन 

माँ का दूध ऐसी बहुमूल्य संपदा है, जिससे समाज का कोई वर्ग वंचित नही हो सकता है । बच्चे के लिए माँ का दूध सर्वोत्तम है । यह एक ऐसा प्राकृतिक आहार है, जो बच्चे के पैदा होने के तुरंत बाद ही माँ को उतरने लगता है । यह पहला दूध अर्थात् खीस, जो पीला रंग लिए होता है शिशु के लिए पूर्ण आहार है । बच्चे को स्वस्थ रखने के लिए माँ का दूध उतना ही जरूरी है जितना जीवन के लिए ऑक्सीज़न । हजारों महिलाएं इसके प्रति जागरूक नहीं हैं । सर्वे में स्पष्ट हुआ है कि स्तनपान कराने से शिशु की मृत्यु दर कम हो सकती है । बेस्ट फ्रीडिंग प्रमोशन नेटवर्क ऑफ इंडिया द्वारा किए गए सर्वे में माँ के दूध को सर्वोत्तम पौष्टिक आहार माना गया है । स्तनपान से माताओं में होने वाली खून की कमी, स्तन व अंडाशय के कैंसर जैसे रोगों से मुक्ति भी मिलती है ।

भारतीय बाल चिकित्सा अकादमी के अनुसार मां का दूध प्रकृति प्रदत्त निःशुल्क पौष्टिक आहार है । यदि बच्चे के पैदा होने के बाद यह न मिला तो उसके मस्तिष्क को आघात पहुंचने का भय रहता है ।

यूनिसेफ का मानना है कि बच्चों को मां का दूध पिलाने का बढ़ावा मिलने से हर वर्ष 10 लाख बच्चों को मरने से बचाया जा सकता है तथा बच्चों का विकास रोकने वाली अन्य अनेक बीमारियों को भी नियंत्रित किया जा सकता है ।

भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद के राष्ट्रीय पोषण संस्थान में किए गए अध्ययन से पता चलता है कि शिशु के लिए मां का दूध न केवल पोषक होता है बल्कि वह संक्रमण के विरूद्ध उसकी रक्षा करने की क्षमता रखता है । अध्ययन में भारत के कुछ क्षेत्रों में व्याप्त इस भ्रांति को भी निराधार सिद्ध किया है कि बच्चे के लिए मां का शुरू का दूध नहीं दिया जाना चाहिए बल्कि परीक्षणों से वह बात सामने आई कि पहले दिन से दूध से संक्रमण के विरुद्ध बच्चों की रक्षा करने वाले तत्व अधिक मात्रा में विद्यमान रहते हैं ।

विश्व स्वास्थ्य संगठन तथा यूनिसेफ की रिपोर्ट के अनुसार स्तनपान करने बालक शिशु अधिक शारीरिक चंचलता वाले होते है तथा अपने पैरों पर शीघ्र चलना शुरु कर देते हैं ।

कुछ वर्षों पूर्व शिशु रोगों पर हुए अन्तर्राष्ट्रीय सम्मेलन में डॉ. इंदिरा नारायण ने अपना पेपर पढ़ते हुए कहा था कि मां का दूध पीने में अमाश्य पित्त तथा गुर्द शीघ्र परिपक्व होकर कार्य करने लगते है । अविकसित तथा कम वजन आने वाले शिशुओं को उनकी माता के दूध से न केवल बीमारियों एवं संक्रमण से बचाया जा सकता है बल्कि उनके जीवन में उल्लेखनीय वृद्धि भी हो जाती है ।

मां का दूध पीने में बच्चे को थोड़ा जोर लगाना पड़ता है, जिससे कि उसके जबड़ें की मासपेशिया मजबूत बनती हैं । बच्चे के स्वभाव विकास के लिए मां के दूध में पाचन के रूप में प्रोटीन, आयोडिन, वसा, आयरन, कुछ एजाइम्स और विटामिन जैसे पोषक तत्व विद्यमान होते है, जिनकी वजह से बढ़ते हुए बच्चे की अनेक प्रकार की बीमारियों से लड़ने की विशेष क्षमता हासिल हो जाती है । अर्थात बच्चे के शरीर में रोग प्रतिरोधी क्षमता का विकास होता है । मां का दूध कृमि और कीटाणुओं से रहित होता है इसे बच्चा सरलता और सहजता से हजम कर लेता है ।

मां का दूध पीने से बच्चा हष्ट-पुष्ट मजबूत तथा स्वस्थ बनता है व अनेक संक्रमणों से भी बचा रहता है । मां का दूध पीने वाले बच्चों में कुपोषण, सूखा रोग, निर्जलीकरण बुहत कम होता है ।

मां के दूध में अन्य विषेषता यह है कि इसमें कोई मिलावट नहीं होती है । बाजार के दूध में तरह-तरह की मिलावट होती है । पानी की मिलावट तो साधारण बात होती है । कई बार दूषित जल मिलाने से शिशु के स्वास्थ्य पर खराब प्रभाव पड़ता है ।

स्तनपान से मां और बच्चे दोनों के बीच अधिक प्यार उमड़ता है, जो दोनों के लिए अच्छा है ।

स्तनपान कराते समय ध्यान रखने की बातें

स्तनपान कराते समय मां को पहले हाथ और स्तन अच्छी तरह से साफ कर लेना चाहिए, इससे पसीने का मैल बच्चों के दूध में नहीं जाएगा ।

पूर्ण विश्राम की अवस्था में ही बच्चे को गोदी में ले व तसल्ली से दूध पिलायें ।

हर तीन घंटे के अंतराल पर बच्चे को दूध पिलायें । वैसे तो दूध पीने का समय होते ही बच्चा चिल्लाने लगता है कि माता अनुमान लगा लेती है कि बालक के दूध पीने का समय हो गया है ।

स्तनपान कराते समय मन में किसी प्रकार का तनाव, चिंता या घबराहट न रखें । दूध पिलाते समय बच्च का सिर उसके शरीर से थोड़ा से ऊंचा रखें । यह भी सावधानी रखे कि बच्चे की नाक स्तन से दूर रहे मां को जिस स्थिति में सुविधा हो उसी में दूध पिलाना चाहिए लेकिन वह ध्यान रहें कि शिशु को दूध पीने में किसी प्रकार की दिक्कत न हो ।

दूध कितने समय तक पिलाया जाए यह इस बात पर निर्भर करता है, कि बच्चा किस गति से दूध पीता है । कुछ बच्चे तो 10-15 मिनट में ही पेट भर लेते है । कुछ 25-30 मिनट तक पीते है । अतः शिशु की आदत के अनुसार ही पिलाएं । वैसे तो बच्चा भूख शांत होने पर स्वंय ही दूध पीना बंद कर देता है ।

बच्चे को कभी लेटे-लेटे दूध नहीं पिलाना चाहिए । दोनों स्तनों से बराबर दूध पिलाना चाहिए ।

स्तनपान की शुरू से ही ऐसी आदत डालें कि बालक रात के 10 बजे से सुबह पांच बजे तक दूध की मांग न करें ।

दूध पिलाने के बाद बच्चे को डकार दिलवाने के लिए उसे कंधे से लगाकर उसकी पीठ धीरे-धीरे थपथपायें ।

स्तनपान के समय खानपान

 

 

स्तन पान के समय महिलाओं को दूध, घी, हरी सब्जियां, फलों व दालों आदि का पर्याप्त मात्रा में सेवन करना चाहिए एवं पानी खूब पीना चाहिए ।

मिर्च-मसाले तथा प्याज व नशीली दवाओं का सेवन कदापि नहीं करना चाहिए । बिना चिकित्सा व परामर्श के किसी प्रकार की दवाई का सेवन नहीं करना चाहिए । अन्यथा शिशु के स्वास्थ्य पर गलत प्रभाव पड़ सकता है । मां को दूध कम आता हो या नहीं आता हो, तो बाल चिकित्सक से राय लेनी चाहिए ।

यदि शिशु को दूध की पर्याप्त मात्रा नहीं मिल रही तो चार-पाँच मास बाद गाय व बकरी का दूध साथ ही फलों का रस दिया जा सकता है ।

अनेक माताओं को यह भय रहता है कि शिशुओं को दूध पिलाने से वह कमजोर हो जाएगी या उनके शरीर सौंदर्य में कमी आ जाएगी । किंतु यह निराधार बात है । प्रकृति ने जो अंग जिस लिए बनाया है उसका उपयोग उसी प्रकार होना चाहिए । अतः हर माता का यह दायित्व है कि बच्चे को अवश्य दूध पिलाएं ।

विशेषज्ञों का मानना है कि जो माताएं जन्म से अपने बच्चों को दूध नहीं पिलाती, वे पूर्वाग्रह से ग्रस्त होती हैं । ऐसे में बच्चे का शाारीरिक विकास रुक जाता है । महिलाओं में आम धारणा है कि स्तनपान कराने से शारीरिक दोष उत्पन्न होते है, जबकि ऐसा नहीं होता है । उन्होंने बताया कि मां के दूध का कोई विकल्प नहीं है ।

मां का दूध न सिर्फ बच्चे की सेहत और विकास के लिए फायदेमंद है बल्कि मां का दूध ब्लड प्रेशर भी ठीक रखता है । वेस्टर्न सिडनी यनिवर्सिटी के शोधकर्ताओं ने यह दावा किया है कि जो महिलाएं अपने बच्चे को लम्बे समय तक अपना दूध पिलाती है, वे लम्बे समय तक हाई बी.पी की रोगी नहीं होती हैं, शोध के दौरान पाया कि बच्चे को लम्बे समय तक दूध पिलाने वाली महिलाएं प्राय: 64 साल की आयु में भी हाई बी.पी का शिकार नहीं होती ।

(साभार संस्कारम)

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