भारत केन्द्रित राष्ट्रीय शिक्षा नीति वैश्विक उद्देश्यों की पूर्ति करेगी

 – देशराज शर्मा

आखिर 2015 से बहुप्रतीक्षित नई शिक्षा नीति को केन्द्रीय मंत्रीमण्डल द्वारा स्वीकृति प्रदान करने के साथ ही राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 का जन्म हो गया। 1986 में बनाई गई शिक्षा नीति 1992 के संशोधनों के उपरांत भी शिक्षा के उद्देश्यों को पूरा करने में अब अक्षम दिखाई दे रही थी। 34 वर्षों के लंबे समय उपरांत देश में राष्ट्रीय शिक्षा नीति नई संभावनाओं के साथ आई है। शायद देश में ही नहीं अपितु विश्व भर में यह एक ऐसा बड़ा विमर्श है जो ग्राम पंचायत से लेकर राष्ट्रीय स्तर, छात्रों, अध्यापकों, अभिभावकों, जनप्रतिनिधियों, राजनेताओं, सामाजिक कार्यकर्ताओं तथा शिक्षाविदों के सुझावों, चिन्तन, मनन का परिणाम है। इस ड्राफ्ट की प्रारम्भिक दृष्टि से पता चलता है कि यह समाज के प्रत्येक वर्ग, क्षेत्र तक ज्ञान पहुँचाने का संकल्प है।

1986 की शिक्षा नीति में तय मानव संसाधन विकास मंत्रालय अब शिक्षा मंत्रालय कहलाएगा तथा 10+2 के स्थान पर 5+3+3+4 शिक्षा प्रणाली लागू होगी। न्यूरो साइंस की रिसर्च अनुसार ऐसा कहा जाता है कि बच्चे के दिमाग का 85% विकास 6 वर्ष की आयु से पूर्व हो जाता है। इसी प्रतिभा को सँभालने के लिए पूर्व प्राथमिक अनौपचारिक शिक्षा को औपचारिक शिक्षा में जगह मिल गई है। कुल चार चरणों में विभाजित प्रणाली में 3 वर्ष आयु से 8 वर्ष आयु तक फाउंडेशन स्टेज जिसमें 3 साल की प्री-प्राइमरी तथा कक्षा 1 और कक्षा 2 को मिलाकर 5 वर्ष में खेलो, कूदो, नाचो, गाओ, पढ़ो के सिद्धांत से भाषा एवं गणित सिखाया जाएगा। कक्षा 3 से 5 में 8 से 11 वर्ष के बच्चों को प्रारंभिक चरण का नाम दिया गया है। 11 से 14 वर्ष के बच्चे कक्षा 6 से 8 में पढेंगे जो मिडल तथा 15 से 18 वर्ष के बच्चे कक्षा 9 से 12 में होंगे जो सेकेंडरी चरण कहलाएगा।

अब तक की व्यवस्था में बच्चों ने यदि साइंस ग्रुप में दाखिला लिया हो और इतिहास में भी रूचि रखते हों तो इस शौक, अभिरुचि के बावजूद भी वे इतिहास नहीं पढ़ सकते थे। नीति में आर्ट्स, साइंस, कृषि, कॉमर्स  वोकेशनल आदि संकायों में इच्छा एवं रूचि अनुसार विषयों को चुनने में छूट होगी। अब मल्टीप्ल डिसिपलनरी के अंतर्गत संकायों की जंजीरों को तोड़कर बच्चे मनपसंद विषय पढ़कर अपनी प्रतिभा का प्रदर्शन कर सकेंगे। नई व्यवस्था में वर्ष 2030 तक 3 से 18 साल के सभी बच्चों को मुफ्त तथा अनिवार्य शिक्षा प्रदान की जाएगी। इस नीति में निजी स्कूलों को सहयोग करने की बात कही गई है लेकिन अब निजी स्कूल पब्लिक स्कूल शब्द प्रयोग नहीं कर सकेंगे।

भाषा रचनात्मक, सकारात्मक, मौलिकता तथा नया सोचने का सशक्त माध्यम होता है। नीति के मसौदे में स्थानीय भाषा/मातृभाषा में शिक्षा बहुभाषिकता और भाषाओँ की शक्ति शीर्षक में भारतीय भाषाओं को बढ़ावा देने की बात कही गई है। संस्कृत और भारतीय भाषाओं पर ज़ोर देते हुए शिक्षा नीति में 1968 की प्रथम राष्ट्रीय शिक्षा नीति में निश्चित त्रिभाषा फ़ॉर्मूले को जारी रखते हुए प्रारंभ में तीन भाषाएँ तथा छठी कक्षा से एक क्लासिकल लैंग्वेज पढ़नी होगी। नौवीं कक्षा से विदेशी भाषा पढ़ने का प्रावधान भी है।

प्राथमिक कक्षाओं में पढ़ने का माध्यम मातृभाषा निश्चित किया गया है। नीति का महत्वपूर्ण पहलू है कि क्षेत्रीय भाषाओं की संपदा को सँभालने के लिएभारतीय अनुवाद और व्याख्या संस्थान (IITI)” की स्थापना का प्रस्ताव है। विशेषताओं की कड़ी में स्कूल को सभी स्तरों पर शारीरिक गतिविधियाँ, व्यायाम, खेल, योग, मार्शल आर्ट्स, नाच, शिल्प, संगीत, सामुदायिक सेवा आदि विषयों की सुविधाएँ प्रदान करनी होंगी जोकि स्वस्थ शरीर, रचनात्मक कार्यों, आलोचनात्मक चिन्तन तथा स्वस्थ मन के लिए उपयोगी सिद्ध होगी।

अब सह-क्रियाकलाप /अतिरिक्त सह-क्रियाएँ जैसी बहुचर्चित व्यवस्थाओं को समाप्त कर दिया गया है तथा इन्हें पाठ्यक्रम का हिस्सा बना दिया गया है। यह पुस्तकों के बोझ को कम करने का भी एक प्रयास है। पढ़ाई में पिछड़े विद्यार्थियों के लिए स्कूल समय से पहले व स्कूल के बाद 80 मिनट के पीरियड में रेमिडियल कक्षाओं की व्यवस्थाओं का प्रावधान है।

शिक्षा नीति की विशेषताओं में एक पहलू यह भी है कि इसमें शिक्षा का समग्र विचार किया गया है। स्कूली शिक्षा व उच्च शिक्षा के साथ कृषि, क़ानूनी, चिकित्सा जैसी व्यवसायिक शिक्षाओं को इसके दायरे में रखा गया है। छोटी आयु में ही व्यवसाय में कुशलता प्रदान करने की व्यवस्था है। कक्षा 9 से 12 के दौरान कम से कम एक पेशे में विद्यार्थी को शिक्षा लेनी होगी। इसका प्रारम्भ कक्षा 6 से कर दिया जाएगा जहाँ बच्चों को एक से अधिक क्षेत्रों में व्यवसायिक शिक्षा से परिचित करवाया जाएगा। सही मायनों में आत्मनिर्भर भारत के लिए यह एक नींव सिद्ध हो सकती है। शिक्षा नीति में 2025 तक 50% छात्रों को व्यवसायिक शिक्षा प्रदान करने का लक्ष्य है। अभी तक भारत में 19 से 24 वर्ष की आयु वर्ग के भारतीय कार्यबल में मात्र 5% बच्चे व्यवसायिक शिक्षा प्राप्त कर रहे हैं जबकि अमेरिका में इसका अनुपात 52 प्रतिशत, जर्मनी में 75 प्रतिशत तथा दक्षिण कोरिया में 96 प्रतिशत है। 464 पन्नों की शिक्षा नीति के

प्रारंभिक अध्ययन से प्रतीत होता है कि शिक्षा को रोजगारोन्मुख बनाकर छात्रों को भविष्य के नौकरी बाज़ारों में उतारने की सशक्त तैयारी है। प्रोफेशनल स्किल के साथ तर्कशक्ति, आलोचनात्मक चिन्तन, समस्या-समाधान का कौशल, सामजिक तथा भावनात्मक कौशल सिखाने की बात कही गई है। पुस्तकीय ज्ञान से अधिक व्यवहारिक ज्ञान पर बल देकर परीक्षा पद्धति को समेस्टर आधार पर सरल बनाया गया है। विद्यार्थी की दक्षताओं व क्षमताओं का परीक्षण किया जाएगा इसके लिए NCERT बोर्ड आफ असेसमेंट तथा परख मूल्यांकन केन्द्र की स्थापना का प्रस्ताव रखा गया है। कक्षा 9 से 12 तक दो बार बोर्ड परीक्षा देनी होगी, बाद में ऑनलाइन परीक्षाओं की व्यवस्था भी की जाएगी। यह कोचिंग/ट्यूशन संस्थानों की संस्कृति को समाप्त करने की दिशा में अहम कदम है।

उच्च शिक्षा में बहुत बड़ा बदलाव दिखाई दे रहा है। 2030 तक उच्च शिक्षण संस्थान अनुसंधान विश्वविद्यालय, शिक्षण विश्वविद्यालय और महाविद्यालय जैसी तीन श्रेणियों में विभाजित हो जाएँगे। मिशन नालंदा के अंतर्गत 100 अनुसंधान विश्वविद्यालय प्रारम्भ किए जाएँगे तथा देश के हर जिले में एक गुणवत्तापूर्वक शिक्षण विश्वविद्यालय होगा। नीति में एक महत्वकांक्षी योजना बच्चों को मल्टीप्ल एंट्री और एग्जिट व्यवस्था है इसके अंतर्गत एक वर्ष की पढ़ाई छोड़ने पर सर्टिफिकेट, दो वर्ष उपरांत डिप्लोमा, तीन वर्ष बाद डिग्री व चार साल की पढ़ाई उपरांत डिग्री के साथ रिसर्च फेल्लो माना जाएगा। एम.फिल समाप्त करके सीधा पी.एच.डी. करने का प्रावधान है। शिक्षा नीति में लम्बे समय से की जा रही मांग को पूरा करते हुए शिक्षा पर GDP का 4.43 प्रतिशत से बढ़ाकर 6 प्रतिशत खर्च करने का महत्वपूर्ण निर्णय है।

शिक्षा नीति के क्रियान्वयन के लिए शिक्षकों को अधिकार सम्पन्न बनाकर इस नीति की सफलता की उम्मीद की जानी चाहिए क्योंकि शिक्षकों को अधिकार प्रदान कर, उन पर भरोसा तथा उन्हें पेशेवर तौर-तरीकों से तैयार करने की बात कही गई है। शिक्षकों की योग्यता को बढ़ाने पर बल देते हुए उन्हें समाज में सम्मानपूर्वक, गौरवपूर्ण स्थान मिले ऐसे उपायों की चर्चा की गई है। शिक्षकों की पदोन्नति एवं नियुक्तियों के समय अधिकतर को उनके गृह नगर के विद्यालय में ही सेवा का अवसर दिया जाएगा। शिक्षकों के लिए शिक्षण में कंप्यूटर, लैपटॉप, मोबाइल के ज़रिए विभिन्न एप्स आदि तकनीक को शिक्षण में सहायक बनाने पर बल दिया जाएगा।

शिक्षा नीति में निजी शिक्षा संस्थानों की व्यापारिक सोच को समाप्त करने के लिए प्रत्येक राज्य में स्वतंत्र स्कूल रेगुलेटरी ऑथोरिटी बॉडी स्थापित की जाएगी। नई शिक्षा नीति को क्रियान्वयन किया जा सके इसके लिए प्रधानमंत्री की अध्यक्षता में राष्ट्रीय शिक्षा आयोग बनाने का प्रावधान है। यह शिक्षा के विकास, मूल्यांकन और नीतियों को लागू करने का कार्य करेगा। प्रत्येक राज्य में भी इस प्रकार का शिक्षा आयोग बनाया जाएगा। इस आयोग में शिक्षाविदों को महत्वपूर्ण स्थान मिलना चाहिए जोकि राजनीतिक सोच से ऊपर उठकर शैक्षिक सोच के साथ कार्य कर सकें। 1986 से अब तक दुनिया कहाँ से कहाँ पहुँच गई होगी लेकिन भारत की बेचारी शिक्षा नीति निर्धारकों की प्रतीक्षा ही करती रही, अब इस शिक्षा नीति को लागू करने पर शिक्षा जगत में पूरी तरह से बदलाव दिखाई देगा। राष्ट्रीय शिक्षा नीति का आधार, गुण, विशेषताएँ ,आयाम, उद्देश्य समाज के गहरे चिन्तन का निष्कर्ष है। यह वैश्वीकरण, नई प्रद्योगिकी एवं तकनीकी विकास की ओर स्पष्ट संकेत कर रही है।

भारत केन्द्रित, एकात्मभाव से युक्त अपने स्वरूप में समग्र शिक्षा नीति लकीर से हटकर उपाय खोजने का प्रयास दिखा रही है, जोकि एक बड़े ध्येय की पूर्ति के संकल्प के साथ वैश्विक उद्देश्यों की पूर्ति करेगी। अयोध्या में राम मंदिर निर्माण, धारा 370, 35 ए की समाप्ति, नागरिकता संशोधन अधिनियम, तीन तलाक को खत्म करना आदि निर्णयों को देखकर विश्वास करना होगा कि वर्तमान नेतृत्व में नई शिक्षा नीति को लागू करने की इच्छा शक्ति व ऊर्जा विद्यमान है।

(लेखक विद्या भारती उत्तर क्षेत्र के महामंत्री एवं शिक्षा संस्कृति उत्थान न्यास चेप्टर ‘चरित्र निर्माण एवं व्यक्तित्व विकास’ के राष्ट्रीय संयोजक हैं ।)

और पढ़ें : ‘सा विद्या या विमुक्तये’ को प्रकट करती राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020

 

Facebook Comments

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *