भारतीय शिक्षा – ज्ञान की बात-15 (ज्ञान प्राप्त करने की योग्यता)


 – वासुदेव प्रजापति

अब तक हमने ज्ञानार्जन के करण, करणों का विकास, करणों की सक्रियता, ज्ञानार्जन प्रक्रिया तथा करण- उपकरण विवेक को समझा। आज हम ज्ञान प्राप्त करने की योग्यता क्या होनी चाहिए? इस बिन्दु को समझने का प्रयत्न करेंगे।

ज्ञान या विद्या ऐसी अनमोल निधि है, जो किसी अयोग्य के हाथों में नहीं जानी चाहिए। यदि चली गई तो वह अपना, समाज का व स्वयं विद्या का अहित करेगा। इसलिए विद्या सदैव योग्य विद्यार्थी को ही देनी चाहिए। योग्य व्यक्ति के हाथों में दी हुई विद्या उत्तरोत्तर वृद्धि को प्राप्त होती है।

विद्या प्राप्त करने के लिए अथवा पढ़ने के लिए सर्वप्रथम उसके योग्य बनना पड़ता है। योग्य बनने के लिए कौन-कौनसी योग्यता होनी चाहिए? आओ! आज हम उन योग्यताओं का पुनर्स्मरण करें।

जिज्ञासा

जिज्ञासा का अर्थ होता है, जानने की इच्छा या पढ़ने की इच्छा। जिस विद्यार्थी में पढ़ने की इच्छा ही नहीं है, वह पढ़ नहीं सकता। पढ़ना पूरी तरह स्वैच्छिक क्रिया है, उसमें जोर-जबरदस्ती नहीं चलती। उसे डाँट-डपट कर विद्यालय तो भेजा जा सकता है, उसे कक्षा में बैठना भी अनिवार्य किया जा सकता है, परन्तु जबरन पढ़ाया नहीं जा सकता। इसलिए विद्यार्थी में पढ़ने की इच्छा होना अर्थात् जिज्ञासा होना अत्यन्त आवश्यक है।

श्रद्धा

ज्ञान प्राप्त करने वाले के अंत:करण में श्रद्धा का भाव होना चाहिए। श्रद्धाभाव से तात्पर्य है कि उसके मन में ज्ञान पवित्र है, ज्ञान श्रेष्ठ है, ज्ञान प्राप्त करने योग्य है। ऐसी ज्ञान के प्रति श्रद्धा होनी चाहिए। ज्ञान के साथ-साथ स्वयं पर भी श्रद्धा होनी चाहिए कि मैं ज्ञान प्राप्त कर सकता हूँ और अपने शिक्षक में भी श्रद्धा होनी चाहिए। अर्थात् शिक्षक के प्रति पूर्ण श्रद्धावान होना चाहिए। गीता में स्वयं भगवान कृष्ण कहते हैं – “श्रद्धावान लभते ज्ञानम्” अर्थात् श्रद्धावान को ही ज्ञान की प्राप्ति होती है। श्रद्धायुक्त बुद्धि से ही ज्ञान प्राप्त किया जाता है। यह श्रद्धा भी तामसिक, राजसिक तथा सात्त्विक रूप में अलग-अलग होती है। श्रद्धा में भी अनिवार्यता लागू नहीं की जा सकती, यह भी स्वत: स्फूर्त होती है। सात्त्विक श्रद्धा से सात्त्विक ज्ञान प्राप्त होता है। अत: विद्यार्थी में सात्त्विकी श्रद्धा होनी चाहिए।

गुरु सेवा

हमें पढ़ाने वाले को सदा गुरु मानना। गुरु हमसे श्रेष्ठ है, ऐसा आदर भाव मन में रखना। मन का यही आदर भाव जब आचरण में उतरता है, तब वह सेवा बन जाता है। गुरु की सेवा करने का अर्थ है – गुरु के काम करना, उनके कामों में मदद करना, गुरु के वे काम जो हम कर सकते हैं, उन्हें स्वयं करना ही गुरु की सेवा है। गुरुकुल में निवासी विद्यार्थी तो गुरु के वस्त्र धोना, उनका आवास स्वच्छ रखना, उनकी पूजा की तैयारी करना, यथा- पुष्प तोड़कर लाना आदि कार्य करने में अपना सौभाग्य समझते हैं। ज्ञानार्जन की योग्यता प्राप्त करने का यह सबसे उत्तम मार्ग माना गया है। सन्त कबीर गुरुसेवा के इतने सारे लाभ बताते हैं –

ज्ञान समागम प्रेम सुख, दया भक्ति विश्वास।

गुरु सेवा ते पाइए, सद्गुरु चरण निवास।।

अर्थात् गुरु की सेवा करने से प्रेम, सन्तों का समागम, परमसुख, दया, भक्ति, सत्य और सद्गुरु की शरण में निवास के लाभ मिलते हैं। इसलिए जो तन-मन से गुरु की सदा सेवा करता है, ऐसे शिष्य को गुरु निश्चय ही ज्ञान देते हैं।

ब्रह्मचर्य

ज्ञान प्राप्त करने में ब्रह्मचर्य का पालन करना अति आवश्यक माना गया है। ब्रह्मचर्य का पालन करने का अर्थ है – गलत विचार नहीं करना, अश्लील बातें नहीं करना, अश्लील चित्र नहीं देखना, लड़कों व लड़कियों को अनावश्क साथ-साथ नहीं रहना, निरर्थक कल्पनाएँ नहीं करना आदि कार्यों का पालन करना ही ब्रह्मचर्य का पालन माना गया है। आहार-विहार के नियमों पालन भी ब्रह्मचर्य के लिए आवश्यक है। ब्रह्मचर्य से शारीरिक, मानसिक व बौद्धिक शक्ति मिलती है। इसी शक्ति से उत्तम ज्ञानार्जन होता है।

महाराज जनक जी विद्यार्थियों के कार्य बताते हुए कहते हैं – “तपसागुरुवृत्त्या च ब्रह्मचर्येण वा विभो”

अर्थात् अध्ययन काल में विद्यार्थी को तप, गुरुसेवा, ब्रह्मचर्य-पालन तथा वेदाध्ययन करना चाहिए। भगवान वेदव्यास ब्रह्मचर्य की महिमा बताते हुए कहते हैं – “शक्ति में, प्रभाव में, तथा सभी क्षेत्रों में सफलता की कुंजी ब्रह्मचर्य है।” अत: प्रत्येक विद्यार्थी को ब्रह्मचर्य का पालन अवश्य करना चाहिए।

संयम एवं तत्परता

ज्ञान प्राप्त करने के लिए जैसे श्रद्धा होनी चाहिए, वैसे ही संयम एवं तत्परता भी होनी चाहिए। श्रीमद्भगवद् गीता में भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन से कहते हैं कि ज्ञान प्राप्ति के पात्र में ये योग्यताएँ होनी चाहिए –

श्रद्धावाँल्लभते ज्ञानं तत्पर: संयतेन्द्रिय:।

ज्ञानं लब्ध्वापरां शान्तिमचिरेणाधिगच्छति।।

अर्थात् जो जितेन्द्रिय तथा साधन-परायण है, ऐसा श्रद्धावान मनुष्य ज्ञान को प्राप्त होता है, और ज्ञान को प्राप्त होकर वह तत्काल परम शान्ति को प्राप्त हो जाता है।

इस श्लोक में श्रद्धावान पुरुष को ज्ञान प्राप्त होने की बात आई है, जिसे हम जान चुके हैं। यहाँ हम संयम और तत्परता की बात करेंगे। भगवान ने श्रद्धा के दो विशेषण दिये हैं, संयतेन्द्रिय: और तत्पर:। जिसकी इन्द्रियाँ पूर्णतया वश में है, वह संयतेन्द्रिय है, तथा जो अपने साधन में पूरी लगन के साथ लगा हुआ है, वह तत्पर है।

विद्यार्थी को संयमी होना चाहिए अर्थात् मन में जो आए वह न कर, गुरु के कहे अनुसार करना। बड़ों की अपेक्षा के अनुसार करना। गुरु की आज्ञा का अनुसरण करना ही विद्यार्थी का संयम है। सभी इन्द्रियों को वश में रखने का तात्पर्य है, मौज-शौक का त्याग करना, श्रृंगार न करना, फिल्में न देखना आदि। ऐसे संयम से मनोबल बढ़ता है और चरित्र का विकास होता है।

तत्परता अर्थात् ज्ञान प्राप्त करने की पूर्ण सिद्धता। ज्ञान जहाँ से, जिस शर्त से मिले उसे लेने के लिए सदैव तैयार रहना। विद्यार्थी का पहला काम पढ़ना, अन्य सब काम बाद में, इस वृत्ति को तत्परता कहते हैं। गुरु का आदेश हो तो आधी रात को भी पढ़ने के लिए तैयार रहना ही तत्परता है।

विनयशीलता

विनयशीलता का अर्थ है नम्रता, उद्दण्डता का अभाव। विद्यार्थी में गुरु के प्रति विनयशील आचरण होना चाहिए। विनयशील आचरण से तात्पर्य है, विद्यार्थी के मन में ये भाव हों कि शिक्षक मुझ से बड़े व श्रेष्ठ हैं। शिक्षक के द्वारा दिये गये ज्ञान के बदले कुछ भी नहीं दिया जा सकता। अत: जब वे खड़े हैं तो हमें भी खड़े रहना चाहिए। वे जिस आसन पर बैठे हैं, हमें उनसे ऊँचे या बराबर के आसन पर नहीं बैठना चाहिए। उनके सामने ऊँची आवाज में नहीं बोलना चाहिए। उनके सामने अपने वैभव का प्रदर्शन नहीं करना चाहिए। शिक्षक के साथ-साथ अपने से बड़ों के साथ ऐसा व्यवहार करना विनयशीलता मानी जाती है। शिक्षक को प्रणाम करना, स्नान करके ही उनके सम्मुख जाना, उनके सामने शिष्टवेश में ही जाना, कोई सत्ता सूचक चिन्ह धारण करके उनके समक्ष नहीं जाना, असभ्य भाषा का प्रयोग नहीं करना आदि शिष्टाचरण ही विनम्रता कहलाता है। प्रत्येक विद्यार्थी को विनम्र होना ही चाहिए।

विद्यार्थी के ये मापदण्ड वास्तव में कठिन हैं और जटिल भी हैं। किन्तु ज्ञान पाना भी कोई सामान्य बात नहीं है। ज्ञान श्रेष्ठ एवं अत्यन्त मूल्यवान है। ऐसा ज्ञान पाने हेतु इन कठिन मापदण्डों के आधार पर मूल्यांकन आवश्यक है। ये मापदण्ड भले-भले की कसौटी कर सकते हैं। जो विद्यार्थी उपर्युक्त योग्यताओं वाले होते हैं वे ही ज्ञान पाते हैं, और उनके हाथों में ज्ञान सुरक्षित भी रहता है तथा वृद्धि को भी प्राप्त होता है।

आओ! आज हम ऐसी योग्यता वाले विद्यार्थी की कथा का रस लें।

महर्षि ऋभु

महर्षि ऋभु ब्रह्माजी के मानस पुत्रों में से एक हैं। ये स्वभाव से ही ब्रह्म तत्त्व को जानने वाले हैं। इन्होंने निवृत्ति परायण होते हुए भी सद्गुरु की मर्यादा रखने के लिए अपने बड़े भाई सनकत्सुजात का शिष्यत्व ग्रहण किया। उनसे मन्त्र, योग और ज्ञान प्राप्त करके ये सहज स्थिति में रहने लगे। शरीर के अतिरिक्त इनकी कोई कुटिया नहीं थी।

महर्षि ऋभु यो ही विचरते-विचरते एक दिन पुलस्त्य ऋषि के आश्रम के समीप पहुँच गये। वहाँ पुलस्त्य ऋषि का पुत्र निदाघ वेदों का अध्ययन कर रहा था। निदाघ ने बिना किसी के कहे स्वयं प्रेरणा से आगे बढ़ कर महर्षि ऋभु के चरणस्पर्श किये। उसकी यह विनम्रता देखकर महर्षि अत्यन्त प्रसन्न हुए। उन्होंने कहा- “इस जीवन का वास्तविक लाभ आत्म ज्ञान प्राप्त करना है। निदाघ! तुम आत्मज्ञान का सम्पादन करो।”

निदाघ स्वयं आत्मज्ञान प्राप्त करना चाहता था। उसने दोनों हाथ जोड़कर महर्षि से निवेदन किया कि आप से बढ़कर यह ज्ञान मुझे कौन देगा? मुझे अपना शिष्य स्वीकार करें।

महर्षि ने विचार किया, निदाघ इस आत्मज्ञान को प्राप्त करने का अधिकारी है भी या नहीं? उन्होंने अपनी दिव्य दृष्टि से देखा तो पाया कि वह जिज्ञासु है, श्रद्धावान है, संयतेन्द्रिय है, गुरुसेवा में तत्पर है और विनयशील भी है। इसलिए ऋभु ने निदाघ को अपना शिष्य बनाना स्वीकार किया।

गुरु ने शिष्य को प्रथम उपदेश देते हुए कहा – “देखो निदाघ! सब संसारी लोग माया के चक्कर में पड़कर अपने-अपने स्वरूप को भूले हुए हैं। तुम अनात्म वस्तुओं से ऊपर उठकर अपने आप में स्थिर हो जाओ और इस माया पर विजय प्राप्त करो। “महर्षि ऋभु के इन अमृतमय वचनों को सुनकर निदाघ उनके चरणों में गिर पड़े। गुरु के उपदेश से शिष्य कृतकृत्य हो गया।

(लेखक शिक्षाविद् है, भारतीय शिक्षा ग्रन्थमाला के सह संपादक है और विद्या भारती संस्कृति शिक्षा संस्थान के सह सचिव है।)

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