शिक्षा का वर्तमान स्वरूप : भौतिक व व्यक्ति केन्द्रित


शिक्षा की प्रक्रिया के माध्यम से ही मानव शिशु का शारीरिक, मानसिक, बौद्धिक, नैतिक एवं आध्यात्मिक विकास होकर वह समाज में उपयुक्त स्थान ग्रहण करता है, उसके चरित्र का निर्माण होता है, उसका सामाजिकीकरण होता है और वह ‘मनुष्य’ संज्ञा पाने के योग्य बनता है । सहस्रों वर्षों से उस समाज तथा राष्ट्र द्वारा अर्जित अनुभवजन्य ज्ञान, रीति-रिवाज-परम्पराएँ तथा सांस्कृतिक धरोहर आदि को शिक्षा के माध्यम से ही अगली पीढ़ी को हस्तान्तरित किया जाता है ।

भारतीय संस्कृति में शिक्षा को, ज्ञान प्राप्ति को जीवन की श्रेष्ठतम, पवित्रतम प्रक्रिया माना गया है । भगवान श्रीकृष्ण गीता में उद्घोष करते हैं, ‘नहि ज्ञानेन सदृशं पवित्रमिह विद्यते’ । महाभारत में कहा गया, ‘नास्ति विद्यासमं चक्षुः’ अर्थात् विद्या के समान दूसरा नेत्र नहीं है । शिक्षा का सम्बन्ध इस प्रकार सीधे जीवन से जुड़ता है । जीवन का लक्ष्य और शिक्षा का लक्ष्य एक ही है, शिक्षा व जीवन एकरस हैं । जीवन की पूर्णता के प्रकटीकरण के लिए शिक्षा ही साधन है । स्वामी विवेकानन्द के प्रसिद्ध कथन, ‘‘अन्तर्निहित पूर्णता का प्रकटीकरण ही शिक्षा है’’ का भी यही निहितार्थ है । इसीलिए शिक्षा का दर्शन भी राष्ट्र के जीवनदर्शन पर ही आधारित होना चाहिए । देश की संस्कृति ही शिक्षा का एकमेव आधार होनी चाहिए ।

भारत की संस्कृति और जीवन दर्शन का आधार अध्यात्म है । यही भारत का अन्यतम वैशिष्ट्य है । अध्यात्म का सम्बन्ध आत्मा से है, जोकि मानव में परमचैतन्य सत्ता की उपस्थिति का अन्तरतम मर्म है । भारतीय दर्शन में यह आत्मा ही समस्त ज्ञान का आधार है । ज्ञान, समस्त अन्तर्निहित चेतना का प्रकटीकरण, संवर्धन और विकास है, और शिक्षा मुख्यतः इसी ज्ञानार्जन की साधना है । शिक्षा की पद्धति संस्कृति आधारित होगी तभी पंडित दीनदयाल जी के शब्दों में ‘‘ज्ञान, चरित्र एवं संस्कृति की त्रिवेणी के संगम से जीवन को तीर्थराज प्रयाग’’ बनायेगी ।

भारतीय शिक्षा दर्शन में शिक्षा को व्यक्तित्व के सर्वांगीण विकास का आधार माना गया । पाश्चात्य विचार के अनुसार केवल सुगठित देह (Well-built body), उसकी अच्छी साज-सज्जा, उच्च बुद्धिमत्ता गुणांक (High IQ) तथा प्रत्युत्पन्नमतित्व (Presence of mind) अच्छे व्यक्तित्व का, Smartness का लक्षण मान लिया गया । यह सारी अवधारणा बाह्य आवरण अर्थात् शरीर को ही केन्द्र मानकर की गई । भारत ने मनुष्य को शरीर से इतर भी कुछ अनुभूत किया । शरीर, प्राण, मन, बुद्धि एवं आत्मा का समुच्चय, इसे मानव की संज्ञा मिली । इसीलिए, व्यक्तित्व के सम्पूर्ण विकास के विचार में शारीरिक, प्राणिक, मानसिक, बौद्धिक तथा नैतिक एवं आध्यात्मिक विकास को अपरिहार्य माना गया । शिक्षा, जीवन के विकास के साधन के रूप में इस सर्वांगीण विकास को समाहित करने वाली हो, ऐसा इस राष्ट्र के प्राचीन मनीषियों ने विचार किया ।

दुर्योग से, वर्तमान शिक्षा पद्धति उसी पाश्चात्य विचार का अनुसरण कर रही है । इससे तैयार हो रही अगली पीढ़ी के लिए शारीरिक बल-सौष्ठव (Body building) का विचार शिक्षा का अंग माना ही नहीं जा रहा । शारीरिक शिक्षा का पर्याय केवल खेल स्पर्धाओं को माना जाता है जिसमें केवल वे ही विद्यार्थी भाग लेते हैं जिन्हें रुचि व क्षमता भी हो और साथ ही सुविधा-साधन भी उपलब्ध हों । यदि बालक को रुचि है तो भी पाठ्यक्रम, गृहकार्य, कोचिंग-ट्यूशन, कम्प्यूटर, हॉबी क्लास और न जाने क्या-क्या, के कारण उसके पास समय नहीं । माता-पिता भी नहीं चाहते कि बच्चा खेलकुद में अपना बेशकीमती समय ‘बर्बाद’ करे, क्योंकि यह कैरियर के लिए व्यवधान उत्पन्न करेगा । सारी दौड़ पढ़ाई अर्थात् परीक्षा अर्थात् अंक (Marks) अर्थात् उपाधि (Degree) अर्थात् नौकरी (Job) के लिए है, उसमें अन्य अनावश्यक बातों के लिए स्थान कहाँ? जब जीवन का उद्देश्य केवल नौकरी ही रह गया हो तो इस कैरियर के राजमार्ग पर दौड़ते बालकों को ऐसे स्पीड ब्रेकर ग्राह्य नहीं, उनके माता-पिता को तो कदापि नहीं, क्योंकि इससे उनके निवेश (Investment) पर Rate of return कम हो जाने की आशंका है ।

नई पीढ़ी सुकुमार बन रही है । परिवारों की आर्थिक स्थिति और भुगतान क्षमता सुधरने के कारण, पौष्टिक हो न हो, बालक की रुचि का, स्वादिष्ट भोजन उपलब्ध है । सुख-सुविधा के साधन हैं । भागदौड़, खेलकुद, पैदल चलना या साइकिल चलाना, इन सबकी आवश्यकता नहीं । शरीर में बल-सौष्ठव-ओज-लोच- क्षमता-सहनशक्ति आदि के विकास की आवश्यकता ही कहाँ है? और फिर इन सबके विकास के लिए आवश्यक तत्व, पौष्टिक आहार, व्यायाम, विश्राम, स्वच्छता, दिनचर्या की नियमितता आदि का विचार क्यों किया जाये? प्राणिक शक्ति के विकास के लिए आवश्यक योग-आसन-प्राणायाम आदि के लिए भी समय कहाँ है?

‘शिक्षा’ शब्द की व्युत्पत्ति ‘शिक्ष्’ धातु से मानी जाती है जिसका अर्थ है ‘सीखना’ । सीखने की प्रक्रिया कर्मेन्द्रियों-ज्ञानेन्द्रियों से प्राप्त अनुभूतियों के आधार पर होती है, जिनको नियंत्रण करने का कार्य ‘मन’ का है । ज्ञानार्जन के लिए मन का शान्त, एकाग्र और अनासक्त होना आवश्यक है परन्तु जिस प्रकार शिक्षा और समाज का जैसा आपाधापी का वातावरण है, उसमें इस शान्तता, एकाग्रता और अनासक्ति के लिए भी स्थान नहीं है । साहित्य-संगीत-ललित कलाएँ आदि पाठ्यक्रम में तो हैं परन्तु कोई विद्यार्थी उनकी ओर जाना नहीं चाहता क्योंकि उनमें कैरियर के अच्छे विकल्प नहीं हैं ।

शिक्षा क्षेत्रा से जुड़े हुए विद्वज्जनों, नीति-निर्माताओं, भारत भाग्य-विधाताओं से लेकर शिक्षकों और अभिभावकों तक सभी का सारा जोर केवल बालकों के बौद्धिक विकास को लक्ष्यित है । परन्तु यहाँ भी दृष्टिकोण अत्यन्त संकीर्ण है । जहाँ ज्ञान का निकष, अवलोकन, संश्लेषण-विश्लेषण, तुलना, तर्कक्षमता और निष्कर्ष निकालने का विवेक अर्थात् निर्णय क्षमता के विकास को माना जाना चाहिए था, हमारी शिक्षा पद्धति ने केवल सूचना-संग्रह तथा स्मृति-संधारण क्षमता को ही बौद्धिक विकास का पर्याय मान लिया । निर्णयात्मक विवेक और तर्कसंगत अभिव्यक्ति, यह दोनों तत्व पिछड़ गए । ‘‘मैं पढ़ा रहा हूँ सुन लो, पुस्तक में लिखा है पढ़ लो, जो लिखाया है याद कर लो और परीक्षा की उत्तरपुस्तिका में लिख दो, ‘पास’ या ‘फेल’ होना इसी पर निर्भर है । तथ्यों का अवलोकन करना, स्वयं करके सीखना, सीखे हुए को जीवन में प्रयोग करने की क्षमता अर्थात् बोध और कौशल्य-विकास, इन दोनों व्यावहारिक पक्षों को वर्तमान शिक्षा पद्धति में उपेक्षित कर दिया गया है । मानविकी के विषयों को छोड़ भी दें तो भी विज्ञान की तकनीक से भिन्न शाखाओं अर्थात् Pure sciences में प्रवेश लेने को विद्यार्थी तैयार नहीं क्योंकि उनसे जुड़े कैरियर विकल्पों में अच्छे पैकेज नहीं ।

मनोविज्ञान के अनुसार सभी प्राणियों में मूल प्रवृत्तियाँ समान होती हैं । अपने यहाँ इसीलिए ‘आहार निद्रा भय मैथुनं च’ की मूल प्रवृत्तियों से मनुष्य को पृथक चिन्हित करने के लिए अन्तर का आधार धर्म को माना गया – ‘धर्मेणहीनाः पशुभिः समानाः’ । धर्म का व्यावहारिक स्वरूप संस्कृति में अभिहित होता है । संस्कारों के विकास के माध्यम से प्रवृत्तियों का उन्नयन ही संस्कृति है, इसीलिए शिक्षा को इसका साधन मानते हुए धर्माधारित तथा संस्कृतिपरक शिक्षा की बात कही गई है । आज UNESCO भी भारत के इस मूल विचार का अनुगमन शिक्षा के स्वरूप को Rooted in culture, committed to progress कहकर करता है ।

मनुष्य की भी सामान्य प्रवृत्ति अन्य प्राणियों की भाँति ही स्वार्थ की तथा अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति तक सीमित होती है । परन्तु अपनी इस प्राथमिक प्रवृत्ति से विकास करके मानव अपनी व्यक्तिगत आवश्यकताओं से आगे बढ़कर परिवार, समाज, राष्ट्र, विश्व तथा सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड के विषय में सोचना प्रारम्भ करता है । व्यष्टि से समष्टि व सृष्टि से होते हुए उसकी परमेष्टि तक की यह विकास यात्रा शिक्षा के माध्यम से ही पूर्ण होती है । ‘स्व’ का विकास क्यों किया जाये? इस प्रश्न का उत्तर हमारे ऋषि-मनीषियों ने खोजा कि सम्पूर्ण चराचर सृष्टि में एक ही परमचैतन्य तत्व की उपस्थिति है । उस अविनाशी तत्व की अभिव्यक्ति अनेक रूपों में हुई है । उस परमसत्ता का जो अंश मुझमें है, वही सभी मनुष्यों-पशुओं-पक्षियों-वृक्ष-वनस्पति आदि में भी है । इसी से ‘आत्मवत् सर्वभूतेषु’ और ‘सर्वेभवन्तु सुखिनः’ के भाव का जागरण होता है । इसी से मनुष्य में आध्यात्मिकता और नैतिकता के तत्व का विकास होता है, जोकि उसकी पूर्णता का प्रतीक है, ‘स्व’ से ‘सर्व’ तक की विकास यात्रा है । विकास का यह स्तर प्राप्त करना ही शिक्षा का उद्देश्य है, भारत का शिक्षा दर्शन है ।

सर्वाधिक दुर्भाग्य की बात यह है कि भारत में प्रचलित वर्तमान शिक्षा व्यवस्था, उपर्युक्त वर्णित आधारभूत बातों में से किसी भी उद्देश्य की पूर्ति नहीं करती । वास्तव में, ‘भारतीय शिक्षा व्यवस्था’ में न भारतीयता है, न शिक्षा के तत्व और न ही व्यवस्था या पद्धति । यह आश्चर्यमिश्रित खेद का विषय है कि स्वतन्त्रता के इतने वर्षों के बाद भी एक स्वतन्त्रा राष्ट्र के लिए उस राष्ट्र के मूलभूत दर्शन पर आधारित शिक्षा की व्यवस्था नहीं है । न तो यह शिक्षा प्रणाली जीवन आदर्शों के विकास की बात करती है, न ही उसकी दृष्टि बालक के सर्वांगीण विकास के माध्यम से उसे एक राष्ट्रभक्त, समाजोपयोगी, जीवनदृष्टि सम्पन्न तथा शारीरिक, प्राणिक, मानसिक, बौद्धिक तथा नैतिक एवं आध्यात्मिक क्षमताओं से सम्पन्न अगली पीढ़ी का जिम्मेदार नागरिक बनाने की ओर है । यह प्रणाली धर्म-संस्कृति तथा जीवन-मूल्यों के विकास की भी कोई व्यवस्था नहीं देती, जबकि भारत के आध्यात्मिक वातावरण के उत्थान के लिए शिक्षा के मूलभूत लक्ष्य में जीवन का दर्शन अंगीभूत होना चाहिए ।

इस सबके विपरीत, वर्तमान शिक्षा प्रणाली विद्यार्थियों को एक अन्तहीन दौड़ में शामिल करने का मार्ग दिखाती है । कैरियर के नाम पर बड़े पैकेज वाली नौकरियों की तलाश ही शिक्षा का एकमेव उद्देश्य रह गया है । विष्णु पुराण में कहा गया – ‘सा विद्या या विमुक्तये’ । विमुक्ति का मार्ग दिखाने वाली विद्या की आज किसी को आवश्यकता नहीं रह गई है । शिक्षा का उद्देश्य ज्ञानार्जन । जीवन विकास का मार्ग रूपी ज्ञान जीवन का लक्ष्य ज्ञान । ज्ञान के प्रकाश में ही जीवन के विविध पक्षों का विकास आदि बातें अब कालबाह्य जैसी मानी जाने लगी हैं । सत्यान्वेषण ज्ञान प्राप्ति का उद्देश्य है, परन्तु इस ‘सत्यम्’ के साथ ही ‘शिवम्’ और ‘सुन्दरम्’ भी संस्कृति का अंग है । अतः संस्कृति को सम्पूर्ण जीवन के परिष्कार, ज्ञान के उपार्जन तथा सत्य के अन्वेषण का सूत्र मानते हुए, उसके साधन के रूप में शिक्षा को नौकरी प्राप्ति के योग्य बनाने वाली ‘पढ़ाई’ तक सीमित न मानकर जीवन निर्माण के व्यापक स्वरूप में स्वीकार किया जाना चाहिए । दुर्योग से, इसके विपरीत वर्तमान शिक्षा पद्धति ‘सा विद्या या नियुक्तये’ की अल्पदृष्टि दोष से पीड़ित है ।

व्यवहार में परिवर्तन (Modification of Behaviour) को शिक्षाशास्त्राी शिक्षा का उद्देश्य कहते हैं । इसे चारित्रिक विकास, जीवनदृष्टि या जीवन-मूल्यों का विकास भी कहा जा सकता है । मन-वचन-कर्म की एकरूपता ही चरित्र है । वर्तमान शिक्षा प्रणाली व्यवहारकुशलता को वाक्चातुर्य के साथ ही जोड़ती है, एटीकेट्स या शिष्टाचार को सभ्यता की निशानी माना जाने लगा है । ऊपर से पोलिश्ड परन्तु अन्दर से विद्वेष पालने वालों को जेन्टलमैन माना जाता है । भारत की शिक्षा में भावना (मन), ज्ञान (वचन) तथा क्रिया  (कर्म) की समानता से युक्त व्यक्ति को सुसंस्कृत माना गया । प्रियं च नाsनृतं ब्रूयात् – यह जीवन व्यवहार भारत की संस्कृति है ।

 ‘श्रद्धावान् लभते ज्ञानं’ गीता का संदेश है ।  श्रद्धा के बिना ज्ञान नहीं मिलता । माता-पिता-गुरुजन से लेकर मातृभूमि, ज्ञानी-विज्ञानी-शौर्यवान् पूर्वज, सांस्कृतिक आस्था के केन्द्रों तक, इन सबके प्रति श्रद्धाभाव आवश्यक है । वर्तमान शिक्षा पद्धति में इस पक्ष की तो नितान्त उपेक्षा है । मॉडर्न होने का अर्थ ही इतना है कि पुरानी सारी बातों को अच्छे-बुरे का, उपयोगिता का विचार किए बिना पुरातनपंथी-दकियानूसी-कालबाह्य मानकर नकार दिया जाये । जीवन दृष्टि के विकास, समाज की एकता व समरसता तथा राष्ट्र की अखण्डता भी श्रद्धा भाव पर ही आधारित है ।

भौतिक शिक्षा का एक अर्थ जहाँ ‘अर्थार्जन के लिए काम में आने वाली शिक्षा’ है वहीं ‘भौतिक सुख-सुविधाओं से पूर्ण जीवन के प्रति आसक्ति बढ़ाने वाली शिक्षा’, ऐसा भी है । आज समाज में व्याप्त धारणा के अनुसार धन, पद, सामाजिक स्थिति, सत्ता से निकटता, रंग-रूप, साज-सज्जा आदि के आधार पर व्यक्ति के जीवन की सपफलता का आकलन किया जाता है, भले ही इन सबको प्राप्त करने के लिए साधन कोई भी, कैसा भी उपयोग किया गया हो । त्याग, समाज सेवा, परोपकार आदि सद्गुण तो अभी भी माने जाते हैं, परन्तु पुस्तकों-प्रवचनों-भाषणों में, जीवन में उनकी स्वीकार्यता दिखाई नहीं देती । सद्गुणों के मूल्य पर भी, सदाचरण को त्याग कर भी यदि इंद्रिय सुख के लिए साधन-सामग्री जुटाई जा सकती हो तो वह स्वीकार कर लेने की तैयारी, आज आलोचना का विषय नहीं रह गई है । यही भौतिक शिक्षा है, शिक्षा में भौतिकता के वर्चस्व को प्रदर्शित करता है । ज्ञानार्जन नहीं, अर्थार्जन के लिए शिक्षा प्राप्ति, यह एकमात्रा उद्देश्य रह गया है ।

वर्तमान शिक्षा पद्धति ने एक और भावना को भड़काने का काम किया है । ‘मैं’, यानी व्यक्ति सृष्टि के केन्द्र में है, उसका जीवन, उसकी सुख-सुविधा, उसकी निजता, उसकी रुचि-अरुचि यह प्रधान है और उस पर आने वाले किसी भी व्यवधान को स्वीकार न करना – यह पाश्चात्य दृष्टिकोण ही प्रमुख विचार बन गया है । परिणामस्वरूप, अन्य व्यक्ति, परिवार, समाज, जीव-जन्तु, वृक्ष-वनस्पति, प्रकृति, पंचमहाभूत युक्त समस्त सृष्टि गौण है, और इस ‘व्यक्ति’ के उपयोग के लिए है । यह उपयोग दोहन और फिर शोषण तक आगे जाता है । पर्यावरण का संरक्षण, पुनर्नवीकरण, सबके साथ बाँटना अथवा उससे जुड़े अन्य विचार – स्वच्छता, सुव्यवस्था, अनुशासन, देशभक्ति, सामाजिक दायित्वबोध उपेक्षित हो गए हैं । सृष्टि के समस्त संसाधनों के साथ-साथ अन्य ‘व्यक्ति’ का भी उपयोग अपने स्वार्थ के लिए किया जाये यह विचार इस सीमा तक बढ़ गया है कि धीरे-धीरे ‘मानव’ स्वयं ही ‘संसाधन’ बन गया है ।

भौतिकता और व्यक्ति केन्द्रितता, इन दोनों के कारण व्यक्ति, समाज, प्रकृति और सम्पूर्ण सृष्टि ही आज संकटग्रस्त हैं । आज देश को ऐसी ही भारत-केन्द्रित, चरित्र-निर्मात्री, मानव-निर्मात्री तथा राष्ट्र के जीवन दर्शन पर आधारित शिक्षा प्रणाली की आवश्यकता है, जो अगली पीढ़ी को स्वावलम्बी, चरित्रवान, राष्ट्रभक्त जिम्मेदार नागरिकों के रूप में विकसित करे, उन्हें आत्मकेन्द्रित के स्थान पर समाजोपयोगी-राष्ट्रोपयोगी बनाये । विश्वास करें, अच्छे दिन आ रहे हैं परन्तु अच्छे दिन केवल सत्ता परिवर्तन से नहीं समाज जागरण से आयेंगे, जिसके लिए शिक्षा ही एकमात्र उपकरण है ।

(लेखक शिक्षाविद है और विभिन्न विषयों के जानकार है)

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