बाल केन्द्रित क्रिया आधारित शिक्षण-5 (Nothing can be taught)


एक स्थान पर अध्यापकों से चर्चा हुई । श्यामपट्ट पर दो वाक्य लिखे – Nothing can be taught. Everything must be taught. इन दो वाक्यों को पढ़कर क्या समझ में आता है? ऐसा बताने को कहा गया । आचार्यों ने चिन्तन, मनन कर विभिन्न प्रकार के उत्तर दिए । दोनों बातें एक दूसरे से जुड़ी हुई हैं, दोनों विपरीत हैं, दोनों Continuity में हैं । एक नकारात्मक और एक सकारात्मक है । दोनों का हिन्दी अनुवाद देखते हैं । ‘कुछ भी सिखाया नहीं जा सकता । सब कुछ सिखाया जाना चाहिए’

दोनों बातों का सम्बन्ध अध्यापक की मूलवृत्ति से है । एक उदाहरण से समझते हैं । कक्ष में बालकों से पूछा जाएं – इस बार ग्रीष्मावकाश में मामा के यहाँ कौन-कौन गएं । अधिकांश बालक हाथ उठाएंगे । पूछा जाए – कैसे गए? बालक बताएंगे-बस से, रेलगाड़ी से, कार से, बाइक से, हवाई जहाज से । ये बताते समय एक के मस्तिष्क में आएगा- बस में गए थे, लेट पहुँचे, सीट नहीं मिली या खिड़की वाली सीट पर बैठकर गए या बस के लिए इंतजार करना पड़ा । वहां 6 टायरों वाली बस खड़ी थी । ये सब चर्चा करते-करते ध्यान में आएगा कि ‘परिवहन के साधन’ पाठ की अधिकाशं बातें आ गई हैं । इस पाठ में बिना उन्हें बताएं पाठ संबंधी सभी बिन्दु उन्हीं के द्वारा बताएं गए । इसे कहेंगे Nothing can be Taught.

विद्यालय में प्रवास करते समय कक्षाओं के साथ भी बैठना होता है । जब बैठते हैं तब अध्यापकों को सूचना दी जाती है– अब अध्यापक/अध्यापिका कुछ नहीं कहेंगे केवल देखंगे और नोट करेंगे । परन्तु पूरे कालांश के दौरान दो-तीन बार अध्यापक/अध्यापिका बालकों को कुछ न कुछ टोकते हैं । बिना कहे रहा नहीं जाता । यहीं है Everything must be Taught. एक बात और इससे जुड़ी है । उसे हम स्पून फीडिंग (spoon feeding) कह सकते है । बालक से जब कुछ पूछा जाता है तब वह धीरे-धीरे बताता है अथवा बताते समय अटक जाता है, अपनी स्मृति से recall करने में उसे समय लगता है । अध्यापक धैर्य नहीं रखता बल्कि तुरंत बता देता है या उसके मुंह में शब्द डाल देता है । ऐसा घर में भी होता है । जबकि धैर्य रखने से बालक सब बता देगा और इससे उसका आत्मविश्वास भी बढ़ेगा । अध्यापक के मन में कक्षा में पाठ्यक्रम पूर्ण करवाने के दवाब में पाठ करवाने की जल्दी रहती है ।

सामान्यतः अध्यापक की मनोवृत्ति इस प्रकार हो गई है कि जब तक बताया नहीं जाएगा तब तक बालक को कैसे समझ आएगा, अथवा बालक स्वयं कैसे समझ सकता है । इस कारण बालक रिमोट कंट्रोल जैसा व्यवहार करता है । अपनी समझ विकसित करने का मौका नहीं मिलता । परीक्षा में प्रश्न यदि स्टेटमेण्ट बदल कर आता है तो हल नहीं कर पाता । आचार्य और बालक कहते हैं – प्रश्न पाठ्यक्रम के बाहर से आया । इस सबके After effect गंभीर है । इस सम्बन्ध में आचार्यों को विशेष ध्यान देने की आवश्यकता है । After effect की गंभीरता को समझते हुए Everything must be Taught की वृत्ति से बाहर आना होगा ।

शिक्षा के विषय में महर्षि अरविंद ने कहा है – The first principle of true teaching is that ‘Nothing can be Taught. The second principle is that the mind has to be consulted in its own grown. The third principle of education is to work from the near to the far, from that which shall be.

Nothing can be taught को विस्तारित करते हुए महर्षि अरविन्द कहते है – The Teacher is not an instructor or task master, he is a helper and guide. His business is to suggest and not to impose. He does not actually train the pupil’s mind, he only shows him how to perfect his instruments of knowledge and helps and encourages him in the process. He does not impart knowledge to him, he shows him how to acquire knowledge for himself. He does not call forth the knowledge that is written he only shows him where it lies and how it can be habituated to rise to the surface. Child or man, boy or girl, there is only one sound principle of good teaching. Difference of age only services to diminish or increase the amount of help and guidance necessary; it does not change its nature. अर्थात शिक्षक एक प्रशिक्षक या कठोरता से कार्यकरवाने वाला नहीं है, बल्कि वह एक सहायक और मार्गदर्शक है । शिक्षक का कार्य सुझाव देना है न कि अपना विचार थोपना। वास्तव में वह छात्र की बुद्धि को प्रशिक्षित नहीं करता है, बल्कि वह बच्चे को सिखाता है कि किस प्रकार बच्चा अपने ज्ञान के साधनों/उपकरणों को सर्वश्रेष्ठ रूप में प्रयोग कर सकता है और वह ज्ञान प्राप्ति की इस प्रक्रिया में बालक की सहायता करता है और उसे प्रोत्साहित करता है। शिक्षक उसे ज्ञान प्रदान नहीं करता है,  बल्कि वह उसे दिखाता है कि उसे अपने लिए ज्ञान कैसे प्राप्त करना है। वह उस ज्ञान को नहीं प्रोत्साहित करता जो लिखा हुआ है, वह उसे बताता है वास्तव में ज्ञान कहाँ है और इसे किस तरह से बाहर निकाला जा सकता है? बच्चा हो या आदमी, लड़का हो या लड़की, अच्छे शिक्षण का केवल एक ही  पक्का सिद्धांत है। आयु का अंतर केवल ज्ञान प्राप्ति के लिए आवश्यक सहायता और मार्गदर्शन की मात्रा को कम या ज्यादा कर सकता है परन्तु ज्ञान की प्रकृति को नहीं बदल सकता ।

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