पाती बिटिया के नाम-19 (सीखने की उम्र)

 – डॉ विकास दवे

प्रिय बिटिया!

जीवन में अनेको बार ऐसे प्रसंग उपस्थित होते हैं जब हम किसी अच्छे कार्य को सीखने या करने के लिए अपनी मन:स्थिति तैयार कर लेते हैं और मन ही मन दृढ़ निश्चय भी कर लेते हैं कि आगे से यह नियम आजीवन बनाए रखेंगे। इस तरह के कई दृढ़ निश्चय अब तक कई बार बच्चे मुझे भी प्रसन्नता से बताते रहे है। जैसे- ‘आज से हम रोज प्रात: 5 बजे उठेंगे, जल्दी उठकर अध्ययन करेंगे या प्रात: उठकर नियमित  दौड़ने जाएंगे, व्यायाम करेंगे या कभी यह भी कि इस बार ग्रीष्मावकाश में अंग्रेजी व्याकरण और गणित का अभ्यास करेंगे।’ किन्तु देखने में यह आता है कि ऐसे सभी नियम अधिक से अधिक महीने भर चलते हैं। हम चाहकर भी अच्छे नियमों को आजीवन पालन नहीं कर पाते। कभी ठंड हमें मजबूर कर देती है, सुबह के व्यायाम और दौड़ना बन्द करने के लिए। कभी छुट्टियों की मौज-मस्ती मजबूर कर देती है अंग्रेजी न सीख पाने के लिए।

ऐसे में याद आते हैं दो नाम जो जुड़े हैं काकोरी कांड से। ये नाम हैं – अमर शहीद राजेन्द्रनाथ लाहिड़ी और ठाकुर रोशनसिंह के। गोण्डा जेल में राजेन्द्रनाथ उस दिन बहुत प्रसन्न थे। कल भारत माता की सेवा से पुरस्कार स्वरूप गोरी सरकार उन्हें मौत का उपहार देने वाली थी। 17 दिसम्बर को प्रात: नियमित दिनचर्या के अनुसार जल्दी उठे। खूब मालिश की अपने कसरती बदन पर, और जी भरकर व्यायाम किया। स्नान, ध्यान पूजा-पाठ से निवृत्त होकर वह वीर तैयार था फाँसी के लिए। गोरे जज ने आश्चर्य से पूछा – “क्यों भाई लाहिड़ी मन की शांति के लिए पूजा-पाठ तो समझ में आती है लेकिन यह व्यायाम की मूर्खता क्यों?” राजेन्द्रनाथ का सीधा सपाट उत्तर था – “जज साहब, व्यायाम का नियम तो आजीवन मेरे साथ रहा तो मौत के डर से भला आज यह नियम क्यों तोड़ूँ। और वैसे भी हमारा धर्म और संस्कृति पुनर्जन्म में विश्वास रखने की है तो इस जन्म में व्यायाम करके मरुंगा तो अगले जन्म में फिर बलवान होकर जन्म लूँगा और फिर तुम्हें इस देश से भगाकर ही मरूंगा।” बेचारे जज साहब, वैसे ही लाल मुँह था शर्म से और क्या लाल होता?

इन्हीं राजेन्द्रनाथ के एक साथी ठाकुर रोशनसिंह को फाँसी होने वाली थी और वे लगे थे अंग्रेजी सीखने में। साथियों ने मजाक किया – “ठाकुर साहब तो अंग्रेजी इसलिए सीख रहे हैं ताकि गोरे जज से अंग्रेजी में माफी मांगकर सजा से छूट सकें।” ठाकुर साहब एकदम तैश में आ गए कहने लगे – “यह अंग्रेजी इसलिए सीख रहा हूँ ताकि गोरे जज की बातें समझ सकूं और यदि वह माँ भारती के बारे में कोई गलत टिप्पणी करें तो उसको उसी की भाषा में खरी-खोटी सुना सकूँ।” जानती हो बेटे? जैसे ही जज ने उन्हें मृत्युदण्ड सुनाया भावातिरेक में अपनी प्रसन्नता को छुपा नहीं पाए और केवल एक शब्द कहा ‘थैक्यू’।

हम काकोरी कांड के सभी शहीदों राजेन्द्रनाथ लाहिड़ी, ठाकुर रोशनसिंह, अशफाकउल्लाखां और रामप्रसाद बिस्मिल को शत-शत नमन करते हुए प्रयास करें कि अंश मात्र भी उनके सिद्धान्तों पर चल सकें।

-तुम्हारे पापा

(लेखक इंदौर से प्रकाशित ‘देवपुत्र’ सर्वाधिक प्रसारित बाल मासिक पत्रिका के संपादक है।)

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