पाती बिटिया के नाम-20 (विश्व का हर देश)


 – डॉ विकास दवे

विश्व का हर देश जब भी दिग्भ्रमित हो लडख़ड़ाया।

लक्ष्य की पहचान करने इस धरा के पास आया।।

प्रिय बिटिया!

आज कम्प्यूटर विषय इतने महत्व का हो गया है कि इसके पीछे पूरी की पूरी पीढ़ी दौड़ लगा रही है। मेरे मन में कई बार कुछ छोटे-छोटे प्रश्न उठते रहते हैं, जिनका समाधान कई बार हो ही नहीं पाता। और कई बार स्वयं का समाधान स्वयं ही कर लेता हूँ।

पता नहीं तुमको इस प्रश्न ने कभी परेशान किया या नहीं किन्तु मुझे इस बात ने बहुत परेशान किया कि कम्प्यूटर जैसी मशीन के साथ के एक महत्वपूर्ण यंत्र को ‘माउस’ क्यों कहा जाता है? बहुत सोचने पर बस यही लगा कि कम्प्यूटर नामक यह यंत्र आखिरकार ‘बुद्धि का देवता’ है और जिस पर ‘बुद्धि के देव’ गणपति, गजानन के साथ सदैव उनका वाहन चुहा रहता है ठीक उसी प्रकार इस यान्त्रिक बुद्धि के देव के साथ ही यह चुहा यानि माउस रहता होगा। खैर …. अब हम मूल विषय पर आते हैं जिस पर विशेष रूप से तुमसे चर्चा की इच्छा है। आजकल कम्प्यूटर के पीछे अपने देश का युवावर्ग भाग रहा है। तकनीकी ज्ञान के पीछे भागना कोई बुरी बात भी नहीं किन्तु इस अंधी दौड़ में युवावर्ग ने अनेक बातों को अनदेखा कर पाश्चात्य ‘आपाधापी’ को अपना आदर्श बना लिया है। इससे जो सबसे बड़ी हानि हो रही है वह यह कि राष्ट्र की श्रेष्ठ बुद्धि राष्ट्र के ही काम नहीं आ रही है। तुमने यह तो सुना होगा कि भारतीय मेधा इन दिनों पूरे विश्व पर हावी है। चाहे प्रोग्रामिंग का कार्य हो या अन्तरताने (इन्टरनेट) की दुनिया, भारतीय मस्तिष्क का लोहा विश्वभर के कम्प्यूटर वैज्ञानिकों ने मान लिया है। आज विश्वभर में निर्मित होने वाले श्रेष्ठ लघुवर (साफ्टवेयर) अधिकतर भारतीयों द्वारा ही निर्मित होते हैं। भारतीय बुद्धि का लोहा आज पूरे विश्व ने ठीक उसी तरह मान लिया जैसा इतिहास के स्वर्णिम वर्षों में हजारों वर्ष पूर्व माना गया था। किन्तु तब और अब में एक बड़ा फर्क यह आ गया कि कौटिल्य, वेदव्यास, वाल्मिकी, सुश्रुत, चरक, आर्यभट्ट और वराहमिहिर की इस धरती के पुत्र आजकल अपनी बुद्धि का उपयोग अपने राष्ट्र के लिए न करते हुए उन राष्ट्रों के लिए कर रहे हैं जो माँ भारती को बेड़ियों में जकड़ने के ख्वाब पाले हैं। आप तो जानती ही हो कि इस वर्ष विश्व के खरबपतियों की एक सूची जब बनी तो उसमें 43वें क्रम पर भारत के एक बड़े व्यापारी का नाम भी सम्मिलित किया गया। उन सज्जन का व्यवसाय क्या है? वे कोई तेल साबुन नहीं बेचते। वे दुनिया को बेचते हैं भारतीय बुद्धि। भारत की युवापीढ़ी को विदेशों के आरामतलब जीवन के स्वप्न दिखाकर उन्हें विदेशों में सेवा देने के बहाने देश छोड़ने की प्रेरणा दी जाती है। विदेशों में अपनी पूरी क्षमताओं का उपयोग करने वाले बच्चे यह जान भी नहीं पाते कि उनकी बुद्धि को खुले बाजार में नीलाम करने वाला व्यक्ति घर बैठे दलाली के लाखों डॉलर डकार रहा है। इन दलालों में तो मानवता ही नहीं है तो भला राष्ट्रप्रेम की क्या अपेक्षा की जाए? वे आई.टी. प्रोफेशनल बनाने के नाम पर युवा पीढ़ी को  ‘कम्प्यूटर गीरमीटिए’ बना रहे हैं।

याद है न आपको कि गांधी जी जब दक्षिण अफ्रीका गए थे तो वहाँ उन्होंने पाया था कि कुछ लोग भारतीय बन्धुओं को विदेशों में ले जाकर गुलामों के रूप में बेचने का कार्य कर रहे थे। और जिन गुलामों को वहाँ शारीरिक श्रम के लिये बेचा जाता था उन्हें गीरमिटिया कहा जाता था। दलाल आज भी हैं, गुलाम अब भी बेचे जा रहे हैं बस फर्क इतना है कि अब मानसिक श्रम के लिए ‘कम्प्यूटर गीरमिटिए’ बेचे जाते हैं। ये टाई, सूटधारी भले ही अपने को समाज का आदर्श मानते हैं किन्तु हमारे लिए तो कम्प्यूटर क्षेत्र में आदर्श है श्रद्धेय बापूराव वाकणकर। जिन्होंने सम्पूर्ण विश्व को अपने कार्य द्वारा यह मानने के लिए मजबूर कर दिया कि कम्प्यूटर के प्रोग्राम बनाने के लिए यदि कोई श्रेष्ठतम भाषा है तो वह संस्कृत ही है। महाकाल की नगरी उज्जैन का यह सपूत एक लंबे समय तक अमेरीका में रहा किन्तु वहाँ के कम्प्यूटर वैज्ञानिकों का गुरु बनकर, उन्हें संस्कृत सिखाने हेतु। इतना ही नहीं कम्प्यूटर में हिन्दी भाषा के प्रयोग हेतु प्रथम बार हिन्दी लघुवर (सॉफ्टवेयर) बनाने में भी उनका अपूर्व योगदान रहा। और हाँ हमारे नायक तो वो विशेषज्ञ हैं जिन्होंने सुपर कम्प्यूटर को सुधारने के लिए जब अमेरिका से तकनीकी सलाह चाही तो इंकार मिला और इस ‘ना’ को चुनौती मान उन्होंने पूना में बैठकर विश्व के श्रेष्ठतम कम्प्यूटर ‘परम’ का निर्माण ही कर डाला। आज यह परम्परा सतत जारी है ‘परम् 2000’, ‘परम् 9000’ और ‘सुपर परम्’ तक वह श्रृंखला जारी है।

और तो और विगत दिनों एक मजेदार प्रसंग भी यादगार बन गया। भारत द्वारा निर्मित अन्त:क्षेत्र (वेबसाईट्स) से छेड़छाड़ करने की पाकिस्तानी अपराधियों की हरकतें बहुत समय से चल रही थी। एक भारतीय ‘हैकर’ ने ईंट का जवाब पत्थर से दिया और पाकिस्तान के सभी प्रमुख अन्त:क्षेत्रों पर उनकी सामग्री समाप्त कर उन पर वन्देमातरम् और भारतमाता की जय अंकित कर दिया। साथ ही यह चेतावनी भी दे डाली कि ‘कारगिल में जूते खाने के बाद यह दूसरी मार है। यदि अपनी हरकतों से बाज नहीं आए तो भारतीय हैकर्स तुम्हारी सारी वेबसाइट्स पर कब्जा कर लेंगे। हमारे दिमाग से टकराने का प्रयास मत करना।‘ चाहे यह सायबर अपराध ही सही किन्तु हमारा राष्ट्र किसी भी स्तर पर चुनौतियों का सामना करने को तैयार है।

कहने का तात्पर्य इतना भर है कि आप भी खूब अध्ययन करें, अच्छे पाठ्यक्रम पूर्ण करें, विशेषज्ञ बने, धन भी कमाएं किन्तु राष्ट्रहित की कीमत पर बिल्कुल नहीं। जिस राष्ट्र ने हमें डॉक्टर, इंजीनियर या कम्प्यूटर विशेषज्ञ बनाने हेतु करोड़ों रुपये व्यय किए हैं उस राष्ट्र से बौद्धिक पलायन कर हम न तो स्वयं राष्ट्र की हानि करेंगे और न होने देंगे। आजाद, भगतसिंह, अशफाक जैसे युवाओं ने अपना मस्तक चढ़ाकर माँ से यही कहा था – ‘तेरा वैभव अमर रहे माँ, हम दिन चार रहें न रहें।’ फिर भला आज की पीढ़ी के युवा अमेरिका और अन्य राष्ट्रों की ओर पलायन करते हुए यह कैसे कह सकते हैं कि – ‘मेरा वैभव अमर रहे माँ…। आओ हम सभी विचार करें कि हमारा ज्ञान, हमारा मस्तिष्क, बौद्धिक पलायन का शिकार होकर कहीं अनजाने में राष्ट्रद्रोह का कारण तो नहीं बन रहा?

और अंत में यही ….

जय स्वदेश, जय स्वदेश, जय स्वदेश गाओ रे,

बुला रही है मातृभूमि, आओ-आओ, आओ रे ।

  • तुम्हारे पापा

(लेखक इंदौर से प्रकाशित ‘देवपुत्र’ सर्वाधिक प्रसारित बाल मासिक पत्रिका के संपादक है।)

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