पाती बिटिया के नाम-18 (साहस की मूर्ति बाघा जतीन)

 – डॉ विकास दवे

प्रिय बिटिया!

साहस, हिम्मत और बहादुरी की बातें तो सभी करते हैं, किन्तु जब मौका आता है तो सारी बातें हवा हो जाती है, लेकिन आज तुमको एक ऐसे व्यक्तित्व से परिचित करवा रहा हूँ, जिसकी हिम्मत को स्मरण कर आज भी लोग रोमांचित हो उठते हैं। बात कुछ ज्यादा पुरानी भी नहीं है। नन्हा ज्योतीन्द्र छोटे से गाँव का रहने वाला था। विद्याध्ययन का शौक इस नन्हें बालक को अपने मामा के यहाँ ले आया। उस समय पढ़ने के लिए पास के गाँव के विद्यालय तक पहुँचना अपने आप में किसी परीक्षा से कम नहीं हुआ करता था, लेकिन जतीन (प्यार का नाम) कहां डरने वाला था, बिल्कुल निडर होकर गुनगुनाता हुआ अकेला अपनी मस्ती में चला जाता। जंगली जानवरों की डरावनी आवाजें उसे कभी विचलित नहीं कर पाई।

एक दिन अपने मामा के बेटे के साथ गाँव को एक शेर के आतंक से मुक्त कराने जतीन भी जा पहुँचा जंगल में। अचानक एक खूंखार शेर उसके सामने आ गया। शेर भी छोटा-मोटा नहीं विशालकाय। कुछ देर के लिए तो जतीन हक्का-बक्का रह गया, किन्तु तत्काल निर्णय ले लिया कि वैसे ही शेर तो मुझे खाएगा ही तो क्यों न मरते दम तक संघर्ष ही किया जाए और आश्चर्य नन्हें जतीन ने शेर के झपटने से पहले ही एक छलांग लगाई और सीधा शेर की पीठ पर चढ़कर मजबूती से उसके जबड़े में हाथ फँसा दिया। जंगल के राजा का भी दिल दहल गया होगा इस नन्हें सिंह से मिलकर और फिर छिड़ी लड़ाई, कभी नीचे कभी ऊपर होते हुए जतीन ने अपना तेजधार वाला चाकू निकाल लिया और शेर पर वार करना प्रारंभ कर दिए। लंबी लड़ाई का परिणाम घोर आश्चर्यजनक रहा। शेर तो मृत्यु को प्राप्त हो चुका था और जतीन सिर्फ बेहोश हुआ था।

घायल जतीन को गाँव के लोग उठाकर ले गए। चिकित्सा ने उसे फिर चंगा कर दिया, लेकिन दुनिया ने उसे एक नया नाम दे दिया था ‘बाघा जतीन’। हो भी क्यों नहीं छात्र जीवन में 9 फीट लम्बे बाघ को मार देना कोई मामूली बात भी तो नहीं थी। हाँ बिटिया आप बिल्कुल ठीक समझी यह नन्हा जतीन ही आगे चलकर क्रांतिकारी बाघा जतीन के नाम से प्रसिद्ध हुआ। इनका पूरा नाम तो ज्योतीन्द्रनाथ मुखर्जी था, किन्तु साथी क्रांतिकारी उन्हें बाघा जतीन ही कहते थे और यह तो तुम कल्पना कर ही सकती हो कि बचपन में बाघ को मार देने वाला यह व्यक्ति युवा होकर तो पन्द्रह बीस अंग्रेज सिपाहियों से सहज लड़ा करता था। और ऐसी ही एक आमने सामने की लड़ाई में 10 सितम्बर, 1915 को यह शेरदिल जवान मात्र 36 वर्ष की अल्पायु में शेरों की मौत मर गया और हमें सीखा गया (श्रीकृष्ण सरल के शब्दों में)-

‘वे हैं शहीद, लगता जैसे वे यहीं कही

यादों में अब भी कौंध-कौंध वे जाते हैं,

जब कभी हमारे कदम भटकने लगते हैं

जो सही रास्ता वे हमको दिखलाते हैं।

हम कैसे हैं, जो उन्हें भूलते जाते हैं,

उनकी लाशों पर अपने भवन उठाते हैं,

केवल खाना-पीना-जीना ही ध्येय बना

क्यों हमको वे बलिदानी याद न आते हैं?’

आओ उनका पुण्य स्मरण करें और यह भली प्रकार समझ लें कि तुम सभी केवल नन्हें जतीन नहीं ‘बाघा जतीन’ हो।

-तुम्हारे पापा (लेखक इंदौर से प्रकाशित ‘देवपुत्र’ सर्वाधिक प्रसारित बाल मासिक पत्रिका के संपादक है।)

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