रामकृष्ण मिशन का परिचय

– संतोष कुमार दिवाकर

Belur Math

क्या रामकृष्ण मिशन केवल एक संस्थागत कदम था, या यह एक महामानव की उस असीमित दिव्य दृष्टि का प्रतिबिंब था, जो मानवता के भले के लिए कार्य करता था? 1 मई 1897 को स्थापित यह मिशन, क्या एक नया आध्यात्मिक आंदोलन था, जो समाज में व्यापक बदलाव और आत्म-उद्धार की दिशा में काम करता था? वास्तव में, स्वामी विवेकानन्द द्वारा स्थापित रामकृष्ण मिशन, केवल एक संगठनात्मक पहल नहीं थी। स्वामी विवेकानन्द द्वारा, यह एक दिव्य दृष्टि को मूर्त रूप प्रदान करने का प्रयास था, एक ऐसी दृष्टि जो व्यक्तिगत हृदयों को स्पर्श कर सके तथा समाज की सामूहिक चेतना को जागृत कर सके। यह दृष्टि श्री रामकृष्ण परमहंस के गहन आध्यात्मिक अनुभवों से उत्पन्न हुई, एक ऐसे संत, जिन्होंने केवल धर्मों का अध्ययन नहीं किया, बल्कि उनका अनुभूतिपूर्वक आचरण किया। उनके प्रिय शिष्य, स्वामी विवेकानन्द ने इस अनुभूतिपरक परंपरा को अपने प्रखर बौद्धिक तत्त्वचिंतन तथा निःस्वार्थ कर्मनिष्ठा के माध्यम से समग्र विश्व के समक्ष प्रस्तुत किया।

रामकृष्ण मिशन के मूल में स्थित है, आध्यात्मिकता और सेवा का समन्वय (आत्मनो मोक्षार्थं जगत् हिताय च)। यह केवल मठों, विद्यालयों या अस्पतालों की स्थापना तक सीमित नहीं है; यह एक जीवन-दर्शन है, जो व्यक्ति, समाज एवं राष्ट्र तीनों को संरेखण में उन्नयन के ओर अग्रसर करता है । इस मिशन की तात्विक नींव वेदान्त, विशेषतः अद्वैत वेदान्त पर आधारित है, जो यह प्रतिपादित करता है, ‘सर्वं खल्विदं ब्रह्म’, यह सम्पूर्ण जगत ब्रह्मस्वरूप है। यदि प्रत्येक जीव में ब्रह्म का अंश है, तो सेवा केवल दान नहीं, वह ईश्वर-पूजा बन जाती है। इसीलिए स्वामी विवेकानन्द ने उद्घोष किया, ‘शिवज्ञाने जीवसेवा’, जीव में शिव को देखना और उनकी सेवा करना ही सच्ची साधना है। स्वामी विवेकानन्द ने इस विचार को अपने जीवन में दृढ़ता से अपनाया और कहा, This life is short, the vanities of the world are transient, but they alone live who live for others, the rest are more dead than alive.” यह जीवन के उद्देश्य को स्पष्ट रूप से रेखांकित करता है, अच्छे कार्य करने से ही व्यक्ति वास्तविक जीवन का अनुभव करता है।

श्रीरामकृष्ण परमहंस ने न केवल हिन्दू धर्म के विविध पंथों की साधना की, अपितु इस्लाम एवं ईसाई मत की भी अनुभूति की और निष्कर्ष स्वरूप अनुभव किया, “यतो मत, ततो पथ”, जितने मत, उतने पथ। यह विचारधारा केवल सहिष्णुता का उपदेश नहीं है, अपितु हर मत-पथ को समान रूप से सत्य के प्रति श्रद्धावान स्वीकार करना है। स्वामी विवेकानन्द ने इस सार्वभौमिक दृष्टिकोण को सन् 1893 में शिकागो के विश्व धर्म महासभा में प्रस्तुत करते हुए कहा, We believe not only in universal toleration but we accept all religions as true.” यह वाक्य केवल उदारता का प्रतीक नहीं था, यह एक धार्मिक क्रान्ति थी, जिसने पूर्वाग्रह, संकीर्णता एवं विभाजन को ललकारा और सह-अस्तित्व व करुणा को प्रतिष्ठित किया।

Ramkrishan and Vivekanand

स्वामीजी का दर्शन केवल ग्रंथों में सीमित नहीं, वह जीवन में घटित होता है। यदि हम मानते हैं कि प्रत्येक प्राणी दिव्य है, तो दया केवल नैतिक कर्तव्य नहीं, वह आध्यात्मिक अभ्यास बन जाती है। यह दृष्टिकोण यह स्पष्ट करता है कि, “In a conflict between the heart and the brain, follow your heart.” इसलिए रामकृष्ण मिशन केवल सन्यासियों का संघ नहीं, यह एक जीवंत आध्यात्मिक आन्दोलन है, जिसका प्रत्येक सामाजिक प्रयास, शिक्षा, चिकित्सा, ग्रामीण उत्थान या आपदा-सेवा, एक गहन आध्यात्मिक भावना से अनुप्राणित है। स्वामी विवेकानन्द ने शिक्षा को केवल आजीविका का साधन नहीं माना। उन्होंने कहा, We want that education by which character is formed, strength of mind is increased, the intellect is expanded, and by which one can stand on one’s own feet.” अतः, रामकृष्ण मिशन के शिक्षालयों का उद्देश्य है, सबल, विवेकशील, और सहृदय व्यक्तित्वों का निर्माण। मिशन द्वारा संचालित चिकित्सालयों एवं चिकित्सीय सेवाओं में रोगी को सहायता का पात्र नहीं, अपितु पूज्य आत्मा माना जाता है। यह दार्शनिक आधार उसे सहज मानवीय कार्य से ऊपर उठाकर आध्यात्मिक सम्पर्क का माध्यम बना देता है। प्राकृतिक आपदाओं के समय भी मिशन प्रचार या मतान्तरण के लिए नहीं, अपितु निःस्वार्थ सेवा के उद्देश्य से आगे आता है, क्योंकि, सेवा ही प्रार्थना है, और पीड़ा को कम करना एक पवित्र कर्म है। विवेकानंद कहते भी हैं –

The poor, the illiterate, the ignorant, the afflicted-let these be your God………He who sees Shiva in the poor, in the weak, and in the diseased, really worships Shiva…………..God is in every human being. The difference is only in degree.”

स्वामी विवेकानन्द के ग्रन्थ राजयोग, ज्ञानयोग, कर्मयोग आदि आज भी भारत के प्राचीन दर्शन को तर्कसम्मत, वैज्ञानिक और व्यावहारिक रूप में प्रस्तुत करते हैं। ये आपको अंधानुकरण के लिए नहीं, अपितु स्वानुभूति और स्वान्वेषण के लिए प्रेरित करते हैं। मिशन द्वारा आयोजित रिट्रीट्स, संवाद-सत्र और विचार गोष्ठियाँ समाज को ऐसा मंच प्रदान करती हैं जहाँ धर्म, आस्था एवं जीवन के मूल प्रश्नों पर सम्मानपूर्ण विमर्श हो सकता है। आज मिशन के केन्द्र अमेरिका, यूरोप, अफ्रीका, ऑस्ट्रेलिया और एशिया के विविध भागों में सक्रिय हैं। ये केन्द्र धर्म-प्रसार के लिए नहीं, अपितु मूल्य-संवर्धन, लोक-सेवा और आत्मोन्नयन के लिए समर्पित हैं। स्वामी विवेकानंद कहते भी हैं कि, “We want Western science coupled with VedantaThe world is the great gymnasium where we come to make ourselves strong.” आज जब समाज चिन्ताओं, पर्यावरणीय संकटों और मानसिक एकाकीपन से जूझ रहा है, तब रामकृष्ण मिशन का संदेश एक सजीव विकल्प प्रस्तुत करता है, यथा – सरलता, नैतिकता, मननशीलता और आत्म-शांति। यह हमसे संसार को त्यागने का आग्रह नहीं करता, अपितु विवेकानंद कहते है, Be and make. Let this be our motto.” इतिहास की दृष्टि से, रामकृष्ण मिशन भारतीय नवजागरण का एक सशक्त अंग है, राजा राममोहन राय, महर्षि दयानन्द, महात्मा गांधी जैसे महापुरुषों के समानांतर, स्वामी विवेकानन्द ने भारत को एक आत्मबोधक मार्ग प्रदान किया, जो आधुनिक भी था, वैश्विक भी और क्रियाशील भी।

अन्ततः, रामकृष्ण मिशन केवल एक संस्था नहीं है, यह एक जीवंत शक्ति है, जो प्राचीन तत्त्वज्ञान को सकारात्मक सामाजिक कार्य में परिणत करती है। स्वामी विवेकानन्द ने कहा था, “They alone live who live for others, the rest are more dead than alive.” और यही है, रामकृष्ण मिशन का हृदय और आत्मा: सेवा का आह्वान, विकास का पथ, और सभी में दिव्यता की अनुभूति।

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(लेखक दिल्ली विश्वविद्यालय के शिक्षा विभाग (CIE) में विद्यावाचस्पति शोधार्थी है।)

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