सावित्रीबाई फुले का शैक्षिक दर्शन: छात्र केंद्रित शिक्षण

– प्रो. असित मंत्री

Savitribai-Jyotiba Phule quote

सावित्रीबाई फुले का शैक्षिक दर्शन पंथनिरपेक्ष शिक्षा के साथ-साथ सार्वभौमिक शिक्षा पर जोर देता है। सावित्रीबाई फुले ने स्वयं को भारत की पहली महिला शिक्षिका के रूप में स्थापित किया था। अपनी छात्र-केंद्रित शिक्षण विधियों में उन्होंने छात्रों को प्रेरित करने के लिए नवाचारी शिक्षण विधियाँ विकसित कीं। उन्होंने बच्चों की बेहतर समझ के लिए मातृभाषा को शिक्षण माध्यम के रूप में उपयोग किया। इसके साथ ही, गतिविधि-आधारित शिक्षा तथा सहायक और पोषणकारी शिक्षण वातावरण पर भी बल दिया। उनका शैक्षिक दर्शन और छात्र-केंद्रित शिक्षण विधियाँ आज भी उपयोगी है।

परिचय

भारत की प्रथम शिक्षिका सावित्रीबाई फुले का जन्म नए गाँव, सतारा जिले के एक गरीब परिवार में सन् 1831 में हुआ था। मात्र 9 वर्ष की आयु में ही उनका विवाह ज्योतिबा फुले से हो गया। विवाह के उपरांत, ज्योतिबा फुले ने उनकी शिक्षा का दायित्व स्वयं लिया और उन्हें घर पर ही शिक्षा दी। सावित्रीबाई फुले एक भारतीय शिक्षाविद, शिक्षिका, समाज सुधारक और कवयित्री थीं। उन्होंने महिलाओं की शिक्षा और सशक्तिकरण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उन्होंने सामाजिक बेड़ियों से मुक्ति के लिए दृढ़ता से संघर्ष किया और महिलाओं के प्रति समाज के पुरातनपंथी और अमानवीय दृष्टिकोण के विरुद्ध आवाज उठाई। सावित्रीबाई फुले महिलाओं के अधिकारों की समर्थक थीं और उन्होंने शिक्षा में महत्वपूर्ण योगदान दिया, जो भारत के इतिहास में सदैव जीवित रहेगा। उन्होंने बाल विधवाओं को शिक्षित करने और उनकी मुक्ति के लिए महत्वपूर्ण प्रयास किए। उन्होंने विधवा पुनर्विवाह, बाल विवाह और सती प्रथा के विरुद्ध भी अभियान चलाए। उन्हें महाराष्ट्र के सामाजिक क्षेत्र में एक प्रमुख व्यक्तित्व के रूप में जाना जाता है, जैसे कि बी.आर. अंबेडकर और अन्नाभाऊ साठे। उन्होंने पुरजोर प्रयास किया कि जाति और लिंग आधारित भेदभाव को समाप्त किया जा सके और उन्होंने अस्पृश्यता के खिलाफ भी आवाज उठाई। हालांकि, कई लोगों को लगा कि उनके योगदान को मुख्यधारा के समाज ने उपेक्षित कर दिया है (मनीषा एवं बिस्वास, 2024)। इसलिए, समाज के कई अच्छे लोगों ने यथासंभव उनका समर्थन और सहयोग किया।

सावित्रीबाई फुले के अनुसार शिक्षा

फुले के अनुसार, शिक्षा केवल अक्षर ज्ञान नहीं है। उनके लिए शिक्षा केवल साक्षरता या शब्दों को जानना मात्र नहीं थी, बल्कि शिक्षा प्रत्येक व्यक्ति के मस्तिष्क और व्यक्तित्व को प्रज्वलित करने का माध्यम थी। वह कहती थीं कि शिक्षा भोजन, आवास और कपड़े जैसी बुनियादी आवश्यकताओं में से एक है।

आज की शिक्षा प्रणाली में शिक्षा का अधिकार अधिनियम, मध्याह्न भोजन योजना और “कमाओ और सीखो” योजना नई अवधारणाएँ हैं। हालाँकि, सावित्रीबाई फुले ने इन सभी अवधारणाओं को अपने समय में अपनी शिक्षा प्रणाली में सम्मिलित किया था। वह छात्रों को विद्यालय छोड़ने से रोकने के लिए छात्रवृत्ति देती थीं। उन्होंने छात्रों को उपहार लेने के बजाय पुस्तकालय स्थापित करने के लिए प्रेरित किया। वह नियमित अंतराल पर अभिभावक-शिक्षक बैठकें आयोजित करती थीं, ताकि माता-पिता शिक्षा के महत्व को समझ सकें और अपने बच्चों को पढ़ाई के लिए प्रेरित कर सकें।

वह शिक्षा और कुपोषण के बीच के संबंध को भली-भाँति समझती थीं, इसलिए उन्होंने अपने छात्रों के लिए भोजन की व्यवस्था भी की (दास, ए., और दास, ए. सी., 2021)। सावित्रीबाई और ज्योतिबा का मानना था कि प्रत्येक बच्चा अद्वितीय होता है और उसमें विशेष योग्यताएँ होती हैं। सावित्रीबाई ने एक ऐसी शैक्षिक प्रणाली की कल्पना की, जो सामाजिक दृष्टिकोण को परिवर्तित कर सके। उन्होंने धर्मनिरपेक्ष शिक्षा पर विशेष बल दिया और पुरुषों व महिलाओं के बीच स्वतंत्रता, समानता, बंधुत्व, न्याय तथा नैतिक मूल्यों के विकास में विश्वास किया।

शिक्षण की विधियाँ

सावित्रीबाई फुले ने जीवन पर व्यावहारिक दर्शन के प्रभाव को समझा और इसे शिक्षा प्रणाली में लागू किया। उन्होंने और उनके पति ने भारत में पहला बालिका विद्यालय स्थापित किया, और वह उस विद्यालय के साथ-साथ हमारे देश की पहली महिला शिक्षिका बनीं। उन्होंने पाठन विधि, व्याख्यान विधि, अनुभव विधि, व्यावहारिक विधि, प्रश्न-उत्तर विधि आदि के माध्यम से छात्रों की आवश्यकताओं के अनुसार शिक्षण कार्य किया (संतरा, आर., और मधु, एस., 2023)।

सावित्रीबाई फुले ने महिलाओं और अनुसूचित जाति के लोगों की स्थिति सुधारने के लिए कार्य किया। इसी उद्देश्य से उन्होंने अपने पति ज्योतिबा फुले के साथ मिलकर देश में कई विद्यालय खोले, जिनमें लिंग, जाति या पंथ-संप्रदाय के आधार पर कोई भेदभाव नहीं किया जाता था। वह स्वयं इन विद्यालयों में शिक्षिका के रूप में कार्यरत थीं। उन्होंने शिक्षण विधियों में भी परिवर्तन किया और अपने शिक्षण में प्रगतिशील तथा आलोचनात्मक शिक्षाशास्त्र को अपनाया। उन्होंने छात्रों को पढ़ाने के लिए सांस्कृतिक रूप से उत्तरदायी शिक्षण विधियों का भी प्रयोग किया। उनका मानना था कि शिक्षा को छात्रों में सहानुभूति, आलोचनात्मक चेतना और सामाजिक उत्तरदायित्व की भावना विकसित करनी चाहिए।

Savitribai-Jyotiba Phule

अपने शिक्षण के माध्यम से उन्होंने जाति व्यवस्था की श्रेष्ठता और ब्राह्मणवादी पितृसत्ता को चुनौती दी (सुनीता, 2023)। उन्होंने अपने विद्यालयों में विशेष रूप से छात्र-केंद्रित शिक्षा शास्त्र का प्रयोग किया। उनके छात्र-केंद्रित शिक्षण प्रणाली की मुख्य विधियाँ निम्नलिखित थीं (रॉय, 2023) –

  1. सहभागी शिक्षण-अधिगम: सहभागी शिक्षा एक छात्र-केंद्रित दृष्टिकोण है, जो सीखने की प्रक्रिया में छात्रों की सक्रिय भागीदारी और संलग्नता पर बल देता है। सहभागी शिक्षण-अधिगम पद्धति का उद्देश्य छात्रों को सीखने की प्रक्रिया में अधिक सक्रिय भूमिका निभाने के लिए प्रेरित करना है। इसका तात्पर्य केवल सैद्धांतिक पाठों में छात्रों की रुचि बढ़ाने तक सीमित नहीं है, बल्कि इसमें समूह चर्चाओं और आलोचनात्मक चिंतन को प्रोत्साहित करना, व्यावहारिक गतिविधियों को सम्मिलित करना, शैक्षणिक उपलब्धियों को वास्तविक जीवन के मुद्दों से जोड़ना तथा समुदाय पर व्यक्तिगत कार्यों के प्रभाव को समझना भी शामिल है।
  2. गतिविधि आधारित शिक्षा: गतिविधि आधारित शिक्षा का अर्थ है बच्चों को नई जानकारी और कौशल प्राप्त करने, समझने और लागू करने के लिए मार्गदर्शन करने हेतु कार्य, परिस्थितियाँ, गतिविधियाँ और अन्य निर्देशात्मक तरीके तैयार करना, जो उनकी पढ़ाई और जीवन में सहायक हों। यह शिक्षार्थियों से न केवल सोचने की अपेक्षा करता है, बल्कि करने और अनुभव करने (यानी, भावनाएँ रखने) की भी अपेक्षा करता है। यह उन्हें व्यावहारिक, व्यक्तिगत और सामाजिक रूप से संलग्न करता है। गतिविधि आधारित शिक्षण एक बाल-केंद्रित शिक्षण पद्धति है, जो छात्रों को समग्र शिक्षण अनुभव प्रदान करती है और ज्ञान को कौशल के साथ एकीकृत करती है।
  3. व्यावहारिक विधि: व्यावहारिक शिक्षण विधि एक शैक्षणिक दृष्टिकोण है, जो केवल सैद्धांतिक समझ के बजाय व्यावहारिक अनुभव और वास्तविक दुनिया के अनुप्रयोग को प्राथमिकता देता है। सावित्रीबाई फुले का मानना था कि स्कूलों के साथ एक औद्योगिक विभाग जुड़ा होना चाहिए, जहाँ बच्चे उपयोगी व्यापार और शिल्प सीख सकें और अपने जीवन को आराम से और स्वतंत्र रूप से व्यतीत कर सकें।
  4. अनुभव विधि: शिक्षण में ‘अनुभव विधि’, जिसे ‘अनुभवात्मक अधिगम’ के रूप में भी जाना जाता है, एक शिक्षण दर्शन है, जिसमें छात्र पारंपरिक व्याख्यानों या पाठ्यपुस्तक आधारित सीखने पर पूरी तरह निर्भर रहने के बजाय, अपने ज्ञान को मजबूत करने और कौशल विकसित करने के लिए केंद्रित चिंतन के बाद प्रत्यक्ष, व्यावहारिक अनुभवों में संलग्न होकर सक्रिय रूप से सीखते हैं। फुले ने अपनी शिक्षण-अधिगम प्रक्रिया में इस शिक्षण पद्धति पर भी विशेष जोर दिया।
  5. व्यावसायिक शिक्षण पद्धति: व्यावसायिक शिक्षण पद्धति एक शैक्षिक दृष्टिकोण है, जो विशिष्ट व्यवसाय से सीधे संबंधित व्यावहारिक कौशल और ज्ञान प्रदान करने पर केंद्रित है। यह छात्रों को केवल सैद्धांतिक ज्ञान के बजाय, प्रासंगिक तकनीकों में व्यावहारिक प्रशिक्षण और विशेषज्ञता के माध्यम से किसी विशेष नौकरी के लिए तैयार करता है। यह व्यापार या शिल्प-उन्मुख सेटिंग में ‘करके सीखने’ पर जोर देता है। 1852 की एक रिपोर्ट में, फुले अपनी राय रखते हुए कहते हैं कि औद्योगिक विभाग को विद्यालयों के साथ जोड़ा जाना चाहिए, ताकि वह छात्रों को व्यापार की तकनीक एवं कला में निपुणता सिखा सकें, जिससे वे अपना जीवन सरलता और स्वतंत्रता से जी सकें।
  6. प्रश्न-उत्तर विधि: प्रश्न-उत्तर विधि में शिक्षक छात्रों से प्रश्न पूछता है और उन्हें उत्तर देने का अवसर देता है। यह विधि प्रभावी है क्योंकि यह आलोचनात्मक सोच को प्रोत्साहित करती है, समझ को बढ़ाती है और सहयोगात्मक शिक्षण वातावरण को विकसित करती है।

शिक्षा में नवाचारी विधियां

भारत में, सीखना पाठ्यपुस्तकों से घिरा रहता है और शिक्षण आलोचनात्मक सोच और चेतना पैदा करने के बजाय याद रखने पर केंद्रित रहता है। सावित्रीबाई फुले का शिक्षाशास्त्र केवल पाठ्यपुस्तकों और याद करने पर आधारित नहीं था। सावित्रीबाई फुले ने छात्रों को प्रेरित करने के लिए नवाचारी विधियाँ विकसित कीं (चौधरी, 2022)। इन नवाचारी विधियों में मुख्यतः कक्षा में छात्रों के बीच संवादात्मक चर्चाएं करवाना, बच्चों को शिक्षा के साथ जोड़े रखने के लिए कहानी और गीतों का उपयोग करना, व्यवहार में सकारात्मक विकास के लिए व्यावहारिक प्रदर्शन करवाना, कक्षा या स्कूल क्षेत्र में सहपाठियों के साथ सामूहिक गतिविधियां करवाना आदि जैसी विधियां शामिल हैं। उनके पढ़ाने के तरीकों में छोटी कहानियाँ सुनाना, खेल सत्र लेना, और लड़कियों के सामने अपनी कविताएँ सुनाना शामिल था। इस प्रकार, उन्होंने जॉन डेवी के व्यावहारिक दृष्टिकोण द्वारा समर्थित गतिविधि-आधारित शिक्षा को बढ़ावा दिया। ये विधियां बच्चों द्वारा सकारात्मक रूप से अपनाई जाएं, इसके लिए आवश्यक है कि बच्चों के साथ अच्छा संपर्क स्थापित किया जाए। बच्चों को उनकी नींव से जोड़े रखने और शिक्षकों को छात्रों के साथ जुड़ने के लिए आवश्यक है कि उनमें परस्पर बातचीत हो। सावित्रीबाई फुले ने छात्रों के लिए मातृभाषा को लाभकारी बताया। उनका मानना था कि छात्रों की अधिक अच्छी समझ के लिए मातृभाषा को शिक्षण माध्यम के रूप में उपयोग किया जाना चाहिए (कुमार, 2019)।

सावित्रीबाई फुले ने ज्योतिबा फुले के साथ मिलकर अपने विद्यालय में व्यावसायिक और व्यापार आधारित शिक्षा पर अत्यधिक बल दिया, जिससे कि छात्र अपना जीवन सरलता और स्वतंत्रता से जी सकें। उन्होंने अपने विद्यालयों के अंदर सहायक और पोषणकारी शिक्षण वातावरण का निर्माण किया, जिसे उन्होंने महिलाओं और शोषित वर्ग के लोगों के उत्थान के लिए सहायक भी माना। इस प्रकार, हम देख सकते हैं कि शिक्षाशास्त्र पर उनका ज्ञानमीमांसीय दृष्टिकोण सहयोगात्मक, चेतना बढ़ाने वाला, परिवर्तनकारी और व्यावहारिक था (चटर्जी, ए., 2021)।

निष्कर्ष

फुले ने एक ऐसी शिक्षा प्रणाली की वकालत की, जो आलोचनात्मक सोच, सामाजिक मानदंडों पर प्रश्न उठाने और स्वतंत्र विचार के विकास को प्रोत्साहित करे। 21वीं शताब्दी में, आलोचनात्मक सोच पर उनका बल आधुनिक विश्व की जटिलताओं के लिए छात्रों को तैयार करने हेतु समस्या-समाधान, रचनात्मकता और अनुकूलनशीलता जैसे कौशल विकसित करने की आवश्यकता के साथ प्रतिध्वनित होता है। जैसे-जैसे हम 21वीं शताब्दी की जटिलताओं से जूझ रहे हैं, सावित्रीबाई फुले का दृष्टिकोण हमें स्मरण कराता है कि शिक्षा केवल ज्ञान प्रदान करने के बारे में नहीं है, बल्कि सहानुभूति, आलोचनात्मक चेतना और सामाजिक दायित्व को बढ़ावा देने के बारे में भी है। उनकी विरासत को अपनाकर, हम ऐसे शैक्षिक स्थान बनाने की दिशा में काम कर सकते हैं, जो व्यक्तियों को सशक्त बनाते हैं, असमानताओं को चुनौती देते हैं और एक अधिक न्यायपूर्ण व दयालु समाज में योगदान करते हैं। सावित्रीबाई फुले के शैक्षिक विचार एक कालजयी प्रकाश स्तंभ के रूप में कार्य करते हैं, जो समग्र रूप से शिक्षा और मानवता के लिए एक उज्जवल भविष्य की ओर मार्ग प्रशस्त करते हैं।

और पढ़े: नारी स्वातंत्र्य का भारतीय प्रतिमानः सावित्री बाई फुले

(लेखक शिक्षा अध्ययन विभाग, जम्मू केन्द्रीय विश्वविद्यालय, जम्मू के विभागाध्यक्ष है।)

संदर्भ ग्रंथ सूची

मनीषा एवं बिस्वास, 2024. आधुनिक भारतीय शिक्षा में सावित्रीबाई फुले की भूमिका।

दास, ए., और दास, ए. सी., 2021. 21वीं सदी के भारत में सावित्रीबाई फुले का शैक्षिक योगदान।  (Educational Contribution of Savitribai Phule in 21st Century India). International Journal of Trend in Scientific Research and Development.

संतरा, आर., और मधु, एस., 2023. सावित्रीबाई फुले: भारतीय समाज और शिक्षा की अग्रदूत। (Savitribai Phule: A Harbinger of Indian Society and Education). International Journal of Creative Research Thoughts (IJCRT).

सुनीता, 2023. भारत में महिला शिक्षा और सावित्रीबाई फुले का योगदान। (International Journal of Social Science and Management Studies).

रॉय, 2023. शिक्षा और भारतीय समाज के प्रति सावित्रीबाई फुले का योगदान। (International Journal of Creative Research Thoughts) (IJCRT).

चौधरी, 2022. प्रथम महिला शिक्षिका: सावित्रीबाई फुले का योगदान।

कुमार, 2019. स्त्री शिक्षा में महात्मा ज्योतिबा फुले वा सावित्रीबाई फुले का योगदान। (Journal of Acharaya Narendra Dev Research Institute).

चटर्जी, ए., 2021. सावित्रीबाई फुले की नारीवादी शिक्षाशास्त्र और सकारात्मक शिक्षा पर इसका प्रभाव।

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