भारतीय शिक्षा – ज्ञान की बात-9 (ज्ञानार्जन के साधन : बुद्धि)


 – वासुदेव प्रजापति

अब तक हमने जाना कि कर्मेन्द्रियों से ज्ञानेन्द्रियाँ अधिक प्रभावी हैं और ज्ञानेन्द्रियों से मन अधिक प्रभावी है। मन इसलिए अधिक प्रभावी है कि ज्ञानेन्द्रियाँ अपने-अपने विषयों के जो अनुभव प्राप्त करती हैं, मन उन्हें विचारो में रूपान्तरित करता है। रूपान्तरित विचारों से ही ज्ञानार्जन होता है, विचार नही होंगे तो ज्ञानार्जन भी नहीं होगा किन्तु मन की भी मर्यादा है, वह विचार तो करता है परन्तु किसी निश्चय तक नहीं पहुंच पाता।

मन द्वारा किये हुए विचारों को निश्चय पर पहुँचाने का काम बुद्धि करती है, इसलिए बुद्धि निश्चयात्मिका मानी गई है। जैसे बुद्धि का कार्य जानना व समझना है। हम बोलचाल में कहते भी हैं कि इसे मैंने अपनी कुशल बुद्धि से जाना है, यह गहन सिद्धान्त मैंने अपनी तीक्ष्ण बुद्धि से समझा है, इस कठिन समस्या का हल मैंने अपनी विशाल बुद्धि से निकाला है, इत्यादि। बुद्धि के आधार पर ही ज्ञानार्जन का स्वरूप, मात्रा और गुणवत्ता निश्चित होती है। सार रूप में कहा जाए तो, “जैसी बुद्धि वैसा ज्ञानार्जन

एक स्वाभाविक जिज्ञासा उत्पन्न होती है कि बुद्धि अपना मुख्य काम ‘जानना व समझना’ करती कैसे है? बुद्धि के पास उसकी अपनी शक्तियाँ है, उन शक्तियों के द्वारा वह जानने और समझने का कार्य करती है। निरीक्षण-परीक्षण, संशलेषण-विश्लेष्ण तर्क तुलना एवं अनुमान ये सब बुद्धि की शक्तियाँ हैं। आओ! संक्षेप में इन सबका तात्पर्य भी समझ लें –

निरीक्षण व परीक्षण : निरीक्षण अर्थात् देखना तथा परीक्षण अर्थात् परखना। आँखों का काम देखना है, हम दिनभर में अनेक वस्तुओं, व्यक्तियों व दृश्यों को देखते है परन्तु रात्रि तक अधिकांश को हम भूल चुके होते हैं। इसी प्रकार हम किसी मित्र के घर गये, उससे मिले अनेक बातें की और लौट आए। घर आते ही पत्नी ने पूछा, आपके मित्र के घर में फ्रिज है? हाँ है। किस कम्पनी का है? यह तो मैंने देखा ही नहीं। आप अपनी छत पर जाते हो? हाँ, रोज कम से कम एक बार तो जाता ही हूँ। रोज कितनी सीढियाँ चढ़ते हो? अरे! यह तो मुझे नहीं पता, कभी इस का ध्यान ही नहीं रखा। अर्थात् हम देखते तो है, परन्तु ध्यान से नहीं देखते, निरीक्षण नहीं करते।

इसी प्रकार हम वस्तुओं को देखते तो है, परन्तु अपनी ज्ञानेन्द्रियों से परखते नहीं। वस्तु कठोर है या मुलायम है, उपयोगी है या अनुपयोगी है, मजबूत है या जल्दी नष्ट होने वाली है। बुद्धिमान लोग निरखकर और परखकर किसी भी वस्तु का अथवा किसी व्यक्ति का सही–सही ज्ञान प्राप्त कर लेते हैं।

संश्लेषण व विश्लेषण : किसी भी घटना या सिद्धांत को सही-सही जानने में संश्लेषण व विश्लेषण का प्रयोग किया जाता है। किसी घटना विशेष के बिखरे हुए विभिन्न पहलुओं को एकत्र कर समझना संश्लेष्ण कहलाता है। सम्पूर्ण घटना के एक-एक पहलू को अलग-अलग समझना विश्लेष्ण कहलाता है। बुद्धिमान व्यक्ति किसी …….. संश्लेष्ण व विश्लेषण कर समग्र घट को जानता है।

तर्क एवं अनुमान : बुद्धि की प्रमुख शक्ति है ये, विशेष रूप से कार्य-कारण सम्बन्ध पर आधारित है। कारण को देखकर कार्य का अनुमान करना और कार्य को देखकर कारण का अनुमान करने से तर्क एवं अनुमान की क्षमता प्राप्त होती है। किसी भी घटना का कार्य-कारण भाव जानकर ही तर्क किया जाता है। व्यवहार जगत में सभी घटनायें कार्य-कारण सम्बन्ध से जुडी हुई रहती हैं। उदहारण के लिए जब पानी गिरता है तभी भूमि गीली होती है। मनुष्य क्रोध, भय, हर्ष आदि भावों के अनुभव को व्यक्त करने के लिए चिल्लाता है। आनन्द का अनुभव करके नाचता हैं। भूख लगती हैं तब खाता है, अर्थात् प्रत्येक कार्य के लिए कारण होता ही है। कार्य कारण का परिणाम हैं और कारण कार्य का स्त्रोत है। अभ्यास से बुद्धि अनुमान करती है, अनुमान करना तर्क का ही दुसरा प्रकार है।

जब बुद्धि विकसित होती है तब ज्ञानार्जन सम्यक् होता है। विकसित बुद्धि से क्या तात्पर्य है? बुद्धि का तेजस्वी होना, बुद्धि का कुशाग्र होना और बुद्धि का विशाल होना, यह बुद्धि का विकास है। बुद्धि के समक्ष जो आता है, उसे जल्दी व सही समझना तेजस्वी बुद्धि कहा जाता है। जो बुद्धि जटिल से जटिल बातों को स्पष्टतापूर्वक जान लेती है, वह कुशाग्र बुद्धि कहलाती है। जब बुद्धि बहुत व्यापक और अमूर्त बातों का एक साथ आकलन कर लेती है, उसे विशाल बुद्धि कहते है। अर्थात् विशाल बुद्धि विषय को व्यापकता में देखती है। भगवान वेदव्यास को विशाल बुद्धि कहा गया है – “नमोस्तुते विशाल बुद्धे”। ऐसी विकसित बुद्धि ज्ञानार्जन करती हैं।

उपर्युक्त तीनों गुणों वाली बुद्धि विवेक करती है। विवेक से तात्पर्य है – सही क्या और गलत क्या, उचित क्या व अनुचित क्या, करणीय क्या व अकरणीय क्या, अच्छा क्या व बुरा क्या? यह स्पष्ट रूप से जानना ही विवेक है। बुद्धि विवेक करती है, बुद्धि को विवेक तक पहुचने के लिए अनेक प्रक्रियाओं से होकर गुजरना पड़ता है, यथा – निरीक्षण-परीक्षण, संश्लेष्ण-विश्लेष्ण, तर्क-अनुमान आदि। बुद्धि इन सब प्रक्रियाओं मे से होकर विवेक तक पहुंचती है। यही जानना है, यही समझना है और यही ज्ञात होना है। यह बुद्धि का क्षेत्र है, यही विज्ञान का क्षेत्र है। यही विज्ञान का अर्थ है, जो जैसा है उसे वैसा ही जानना। बुद्धि भी जो जैसा है, वैसा ही जानती हैं। जब बुद्धि मन से पीछा छुड़ाकर आत्मनिष्ठ बनकर व्यवहार करती है, तभी विवेक कर सकती है।

बुद्धि की इस विवेकशक्ति को जागृत करना और विकसित करना शिक्षा का लक्ष्य है। परन्तु आज हम बुद्धि के भौतिक पक्ष पर अटक गये है। जीवन और जगत को भौतिक दृष्टिकोण से देखने का यह परिणाम है। इससे परिणाम स्वरूप हम मन और इद्रियों में अटक गये हैं। यह अटकावा ज्ञानार्जन में बहुत बड़ा अवरोध है। भौतिकता में अत्याधिक विश्वास होने के कारण बौद्धिक क्षमताओं के स्थान पर मापन और आंकलन के यांत्रिक साधन विकसित कर लिये है। इन यांत्रिक साधनों का सर्वत्र प्रयोग आज बुद्धि विकास में अवरोध बना हुआ हैं। उदहारण के लिए पहाड़ों के स्थान पर केलकुलेटर का उपयोग करके भारत की पारम्परिक पद्धति में पहाड़े कंठस्थ करना हमारा सदाबहार केलकुलेटर था। उसकी अवमानना कर यांत्रिक साधन को अपनाना, यह उल्टी दिशा है जो बुद्धिविकास के लिए बहुत हानिकारक है।

बुद्धि विकास के लिए मन को साधना भी आवश्यक है। मन की ओर से विचारों की तरंगें बुद्धि के पास आती हैं। उस समय वे मन के रंग में रंगी होती हैं। कभी-कभी तो मन की ओर से आई सामग्री इतनी अधिक गड़बड़ होती है कि बुद्धि के लिए उसे ठीक करना कठिन हो जाता है। बुद्धि उसे अपनी शक्तियों के माध्यम से अधिकांश मामलो में सुलझाने में यशस्वी होती है, परन्तु कभी-कभी वह हार भी जाती है और गलत समझ लेती है। जो जैसा है वैसा न समझकर जैसा मन कहता हैं, वैसा समझ लेती हैं। अत: मन की बात मानने या न मानने के लिए बुद्धि को सक्षम और शक्तिशाली होना ही पड़ता है। मन को बुद्धि के वश में रखना अथवा बुद्धि को मन के वश में न होने देना ,यही बुद्धि विकास हैं।

अच्छी बुद्धि के लिए दो प्रमुख बातें आवश्यक हैं एक है, मन और इन्द्रियों को अभ्यास से शिक्षित करना दूसरा हैं, ध्यान के माध्यम से बुद्धि को परिष्कृत करना योग बुद्धि की आत्मा हैं और ध्यान बुद्धि के लिए उत्तम आहार है बुद्धि भी मन की तरह ज्ञान प्राप्त करने का एक साधन है, बुद्धि स्वयं ज्ञान नहीं है बुद्धि को विवेक करने के लिए आलम्बन चाहिए यह आलम्बन आत्मा में हैं जो ज्ञान स्वरूप है “इस आत्मा को समझने वाली और मानने वाली बुद्धि आत्मनिष्ठ होती है बुद्धि को आत्मनिष्ठ बनाने के लिए भी अच्छी शिक्षा अनिवार्य है

सामान्य बुद्धिवाले से तेजस्वी बुद्धिवाला व्यक्ति कैसे विशेष हो जाता है यह हम इस कथा से जानेंगे।

बुद्धि की परख

एक बड़ा जमींदार था। उसके चार पुत्र थे, चारों का विवाह हो चुका था। चारों बहुएँ मिलकर घर का कम करती थी। सभी बड़े आनन्द से रहते थे। जमींदार अब वृद्ध हो चला था। वह अपना काम-धाम बेटे–बहुओं को सोंपकर निश्चिंत होना चाहता था। वह पढ़ा लिखा तो कम ही था परन्तु समझदार था। जीवन की पाठशाला में अनुभवों की गठरी बांध रखी थी। उसका यह पक्का अनुभव था कि व्यक्ति अपनी बुद्धि के अनुसार ही काम कर पाता हैं, इसलिए मुझे भी अपनी चारों बहुओं की बुद्धि-परीक्षा लेकर ही उनको काम सोंपना चाहिए।

उसने बहुओं की परीक्षा लेने की योजना बनाई। एक दिन उसने गाँव के अपने मित्रों को बुलाया और उनके साथ चबूतरे पर बैठकर बातें करने लगा। कुछ समय के बाद उसने एक बहु को बुलाया और उससे कहा –‘ये लो गेंहू के पाँच दाने, इन्हें सम्भालकर रखना।’ बड़ी बहु को लगा की ससुर जी मजाक कर रहे हैं। वह मन ही मन में कहने लगी, घर में गेहू की कोठियाँ भरी पड़ी है। इन पाँच दानो को क्या सम्भाल कर रखना? यह सोचकर उसने वे दाने फेंक दिये।

दूसरी बहू को बुलाया और उसे भी पाँच दाने दिये। दूसरी बहू को भी यह विचित्र लगा। घर में गेंहू की कोठियाँ भरी हुई हैं और पाँच दानों को सम्भालकर रखने को कहा, आखिर क्यों? सठिया तो नहीं गये? कोई बात नहीं, वापस माँगेगे तो कोठी में से मुटठी भर दाने निकाल कर दे दूँगी। जाते-जाते उसने वे पाँच दानें मुँह में डाले और चबा गई।

तीसरी बहू को भी पूर्व की भाँति पाँच दाने दिये गये। उसने सौचा ‘इसमें निश्चित ही कोई राज होना चाहिए।’ सबके सामने इन पाँच दानो को सम्भालकर रखने को कहा है, इतने लोगो को इस बात का गवाह बनाया है। इसलिए निश्चित ही इन दानो को सुरक्षित रखना चहिए। उसने अपने कमरे में जाकर एक डिब्बी ली और वे पाँचों दाने उस डिब्बी में सुरक्षित रख दिये।

अन्त में चौथी बहू को बुलाया और उसे भी पाँच दाने दिए। चौथी बहू तेजस्वी बुद्धिवाली थी, वह तुरंत समझ गई की ससुरजी मेरी परीक्षा ले रहें है। इतने लोगो के सामने मुझे मेरी बुद्धिमानी सिद्ध करनी है। ठीक है, इन्हें सुरक्षित रखने का मैं अपना तरीका अपनाऊँगी और उसी समय उसने अपने मन में कुछ निश्चय कर लिया।

समय जाते देर नहीं लगती। पाँच वर्ष बीत गये, बहुएँ तो उस बात को भूल चुकी थी। फिर एक दिन जमींदार ने अपने मित्रों को बुलाया। उनके सामने चारों बहुओं को भी बुलाया गया। सब मित्रों के सामने उनसे पूछा – ‘मैने पाँच वर्ष पहले गेंहू के पाँच दाने तुम्हे सोपे थे, वे कहाँ हैं?

पहली बहु बोली भला उन पाँच दानो को क्या सम्भालना? आप कहें तो मैं भण्डार से एक सूप भर गेहूँ ला दूँ। मैंने तो वे दाने फेंक दिये थे। दूसरी बहु ने बताया, मुझे तो लगा आप मजाक कर रहे हैं, इसलिए मैं तो उन दानो को खा गई आपको पाँच दाने चाहिए तो मैं कोठी में से ले आती हूँ। तीसरी बहु ने कहा, मुझे मालूम था आप वापिस मागेंगे, इसलिए मैने उन दानो को एक डिब्बी में सम्भालकर रखा हैं। वह फटाफट अपने कमरे में गई और वह डिब्बी लाकर ससुर जी के हाथ में दे दी।

अब बारी थी चौथी बहु की। वह बोली मैने आपके दिए उन पाँच दानो को सम्भालकर रखा हैं। पाँच वर्ष बाद आपको वे पाँच दाने चाहिए तो उनके लिए सौ बेलगाड़िया लानी पड़ेंगी। ससुर ने बड़े ही आश्चर्य से पूछा, पाँच दानो के लिए सौ बेलगाड़िया? हाँ ससुरजी सौ बेलगाड़िया। फिर उसने अपने कथन का राज बताया। मैने उन पाँच दानो को उसी समय बो दिया था। पहले वर्ष सूप भर कर गेंहू हुआ। उन्हें फिर से बोया, प्रतिवर्ष उन्हें बोती गई। अब तक पाँच वर्षो में सौ बेलगाड़ियाँ भर जाए इतना गेंहू पैदा हुआ हैं।

यह सुनकर ससुरजी व उनके सभी मित्र प्रसन्न हुए। सबने कहा आज चारों बहुओं की बुद्धिमानी प्रकट हुई। चौथी बहु की बुद्धिमानी की सभी भूरी-भूरी प्रशंसा करने लगे, वाह! बहु हो तो ऐसी।

अब ससुर जी बोले मैं जो कहता हूँ, वह सुनो पहली बहु घर के कपड़े बर्तन साफ करेगी। दूसरी बहु रसोई करेगी। तीसरी बहु हिसाब रखेगी, और चौथी बहु के हाथ में मैं अपनी जमींदारी का कामकाज सौंपता हूँ। बहु को जमींदारी का दायित्व सौंपने का कारण भी बताया। सही अर्थ में घर बहुएँ ही सम्भालती हैं। इसलिए मैने पुत्रों की परीक्षा नहीं ली।

इस प्रकार जमींदार ने बुद्धि की परख कर प्रत्येक की योग्यता अनुसार उन्हें काम बाँटकर अपना कर्तव्य पूर्ण किया।

सच ही कहा हैं – “जैसी बुद्धि वैसी योग्यता और जैसी योग्यता वैसा काम।”

(लेखक शिक्षाविद् है, भारतीय शिक्षा ग्रन्थमाला के सह संपादक है और विद्या भारती संस्कृति शिक्षा संस्थान के सह सचिव है।)

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