कोरोना और बाल मनोविज्ञान

 – डॉ विकास दवे

कोरोना विषाणु की महामारी केवल भारतीय समाज ही नहीं बल्कि संपूर्ण विश्व के लिए एक नया तथा विज्ञान और मनोविज्ञान से जुड़ा हुआ विषय है। स्वाभाविक रूप से अत्यंत नवीन विषय होने के कारण इसके संबंध में जानकारियों और तथ्यों से अधिक भ्रांतियां समाज में प्रचलन में आई हुई है।

बाल साहित्य, बाल मनोविज्ञान और बाल मन को दृष्टिगत रखते हुए यदि विचार करें तो ध्यान में आता है कि इस विषय के दो पक्ष हैं पहला जिससे मेरी सर्वाधिक सहमति है वह यह कि इस विषय की भयावहता को अतिरेक के रूप में बच्चों को देकर उनके कोमल मन को आहत करने का कोई प्रयास नहीं किया जाए। दूसरा पक्ष भी ध्यान देने योग्य है। चूंकि इस विषाणु से रक्षा करने का दायित्व प्रत्येक व्यक्ति का स्वयं का है, व्यक्तिगत लापरवाही ही इस विषाणु को प्रसारित करने का मूल कारण बनेगी इसलिए स्वाभाविक रूप से बच्चे चाहे वे किसी भी आयु वर्ग के हों उन्हें इसके फैलने के कारण, इसकी भयावहता ठीक प्रकार से समझाना आवश्यक है।

बच्चे को पूरी पूरी सही सही जानकारी देना यह अत्यंत आवश्यक लगता है। यह बाल साहित्य में सूचना साहित्य के अंतर्गत अपेक्षित भी है। इन दोनों पक्षों के साथ एक सकारात्मक पक्ष भी इस विषय का है कि हमारे बच्चों ने पहली बार इतने लंबे समय तक बाहरी अनुशासन के कारण से बड़ों को घर में रुकते देखा है। जिन माता-पिता के साथ, दादा-दादी के साथ, चाचा- चाची के साथ और भाई-बहनों के साथ हमारे बच्चे सामूहिक रूप से रहने को तरसते थे उन सबको एक साथ अपने मध्य पाकर बच्चे निश्चित ही प्रसन्नता अनुभव कर रहे हैं। इस समय का सदुपयोग हम सब मिलकर करें।

हम ऐसा कर सकते हैं क्या कि बच्चों को उनके रचनात्मक विषयों से जोड़ने का काम इस खाली समय में करें। चित्रकला, कविता, कहानी या अन्य प्रकार के लेखन और विधाएं जिनसे बच्चा मन से जुड़ा हुआ है, उन विषयों के निकट लाने का प्रयास हम इस समय करें। हम बड़े भी इन बच्चों के साथ थोड़ा बच्चा होने और उनके खेल में सहभागिता करने का प्रयास करें। साथ ही इन बच्चों के मध्य इस भ्रांति को दूर करने का प्रयास करें कि इस बीमारी में ‘सोशल डिस्टेंसिंग’ अर्थात् सामाजिक दूरी का अर्थ वे यह ना लें कि हमें समाज से दूर होना है या अलग थलग होना है बल्कि सही अर्थों में इसे ‘भौतिक दूरी’ अर्थात् ‘फिजिकल डिस्टेंस’ के रूप में समझना होगा। हम अपने आसपास रहने वालों के प्रति अत्यंत आत्मीयता के साथ किंतु भौतिक दूरी रखते हुए उनके सुख दुख की चिंता करें यह भी बच्चों को समझाना आवश्यक होगा।

मेरे एक मित्र ने जो कि हिंदी के प्राध्यापक भी हैं उन्होंने बच्चों के साथ एक ड्राइंग शीट पर प्रोजेक्ट के रूप में कोरोना विषाणु से जुड़े हुए जितने भी अंग्रेजी के शब्द थे उन सब के सरल हिंदी अथवा अन्य भारतीय भाषाओं में आने वाले शब्दों  का एक छोटा-सा शब्दकोष तैयार किया है। उसका चित्र भी इन दिनों इंटरनेट पर पर्याप्त मात्रा में प्रसारित हो रहा है। हम सब भी ऐसे छोटे-छोटे प्रयोगों से बच्चों को इस विषाणु के प्रति संवेदनशील बनाने का प्रयास करेंगे।

भय और डर से दूर करने का एक अच्छा माध्यम हो सकता है धर्म और अध्यात्म अर्थात् ईश्वर में विश्वास। संध्याकाल में थोड़ा समय सामूहिक प्रार्थना के लिए अवश्य निकालें। अंततः विज्ञान ने भी समय-समय पर ईश्वरीय सत्ता की सर्वोच्चता को स्वीकारा है। इस विषय को भी बच्चों को अत्यंत सकारात्मक ढंग से देने की आवश्यकता इस समय अनुभव होती है। संभवतः यह विश्वास उन्हें भय से तुरंत दूर ले जाएगा।

मेरा यह भी निवेदन है कि इस समय हम सब बाल साहित्यकार मिलकर बच्चों के लिए हमारे रचे हुए बाल साहित्य को नवीन स्वरूप में समाज के मध्य भेजने का प्रयास करें। यह नवीन स्वरूप श्रव्य माध्यम में ध्वनि मुद्रण (ऑडियो) के रूप में अथवा दृश्य मुद्रण (वीडियो) के रूप में भी हो सकता है। इन मुद्रणों को तैयार करके इस समय के सभी सामाजिक संबंध बनाने वाले एप्प यानी फेसबुक, व्हाट्सएप, इंस्टाग्राम, ट्वीट आदि का सदुपयोग कर समाज के प्रति अपने दायित्व का निर्वाह भी करें।

(लेखक इंदौर से प्रकाशित ‘देवपुत्र’ सर्वाधिक प्रसारित बाल मासिक पत्रिका के संपादक है।)

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