भारतीय शिक्षा – ज्ञान की बात-7 (ज्ञानार्जन के साधन: अंत:करण)

–  वासुदेव प्रजापति

अब तक हमने ज्ञानार्जन के बहिकरण कर्मेन्द्रियों व ज्ञानेन्द्रियों को जाना। ज्ञानार्जन के साधनों को जानने के क्रम में आज हम अन्त:करण अर्थात् भीतरी साधनों को जानेंगे।

पहले हम बहिकरण व अन्त:करण के अंतर को जानेंगे। बहिकरण शरीर के बाहरी साधन है, जबकि अन्त:करण शरीर के भीतरी साधन हैं। बाहरी साधन स्थूल हैं, जबकि भीतरी साधन सूक्ष्म है। स्थूल साधन हमें दिखाई देते है, जबकि सूक्ष्म साधन दिखाई नहीं देते। स्थूल व सूक्ष्म के इस सामान्य अंतर के साथ इसके गहन अंतर को भी समझेंगे।

स्थूल का एक निश्चित आकार होता है, जबकि सूक्ष्म का कोई आकार नहीं होता। हम सूक्ष्म का अर्थ महीन से महीन वस्तु, ऐसा मानते हैं। सूक्ष्म महीन नहीं होता, व्यापक होता है। व्यापक से अर्थ है, जो चारों ओर फैला हुआ हो। उदाहरण के लिए बर्फ का टुकड़ा ठोस है, कम स्थान घेरता है उसी बर्फ के टुकडे का पानी बन गया तो वह अधिक स्थान में फ़ैल जाता है। उसी पानी को गर्म करेंगे तो वह वाष्प बन जाएगा। यह वाष्प पूरे मकान में फ़ैल जायेगी अर्थात् जल से अधिक क्षेत्र में फ़ैल जाएगी या व्याप्त हो जाएगी, यही व्यापक का अर्थ है।

इसी व्यापकता को समझने के लिए दूसरा उदाहरण लेंगे। हमने अपने पूजा घर में पूजा करते समय चन्दन की धूपबत्ती जलाई। धूपबत्ती तो ठोस है, थोड़े से स्थान में समा गई। थोड़ी देर में उस धूपबत्ती से चन्दन की सुगंध उस पूजा घर में आने लगती है, धीरे-धीरे वह सुगंध उस घर के कौन-कौने में फ़ैल जाती है। बाहर से कोई अतिथि हमारे घर पर आते है तो आते ही कहते हैं, भई वाह! पूरे घर में चन्दन की सुगंध व्याप्त है। अत: व्याप्त का अर्थ छोटा या महीन नहीं होता, सूक्ष्म होता है।

ज्ञानार्जन के भीतरी साधनों में जो चार साधन हैं, वे दसों इंद्रियों के सामान स्थूल नहीं हैं अपितु सूक्ष्म हैं शरीर के इन भीतरी सूक्ष्म साधनों को हम अन्त:करण कहते है। ये अन्त:करण चार हैं, इनके नाम – मन, बुद्धि, अहंकार व चित्त हैं। ये चारों हमारे शरीर में हृदय, फेफड़े, अमाशय या बड़ी आंत की तरह कोई अंग नहीं है। ये चारों तो सूक्ष्म हैं, इसलिए इनका कोई आकर नहीं है, ये दिखाई भी नहीं देते परन्तु हमारे पूरे शरीर में व्याप्त हैं।

मन, बुद्धि, अहंकार व चित के सम्बन्ध में एक बात और ध्यान रखने योग्य है। इन चारों की सूक्ष्मता और प्रभावशालिता क्रमश: बढ़ती जाती है। मन से बुद्धि अधिक सूक्ष्म एवं अधिक प्रभावी है। बुद्धि से अहंकार अधिक सूक्ष्म एवं अधिक प्रभावी है तो अहंकार से चित्त अधिक सूक्ष्म एवं अधिक प्रभावी है।

अन्त:करण के इन चारों साधनों के अपने-अपने निश्चित कार्य हैं, हमारे शास्त्रों में अंत:करण से सम्बंधित श्लोक इस प्रकार है –

मनोर्बुद्धि अहंकार चितं करणमंतरम्

संशयोनिश्च्यो गर्व: स्मरण विषया इमे।।

अर्थात् मन, बुद्धि, अहंकार व चित्त ये चारों ज्ञानार्जन के साधन हैं संशय करना, निश्चय करना, गर्व करना तथा स्मरण रखना ये इन चारों के विषय हैं अर्थात् मन संकल्प-विकल्प करता है परन्तु निश्चय नहीं कर पाता बुद्धि निश्चय करती है, बुद्धि द्वारा निश्चय किये हुए ज्ञान पर अहंकार गर्व करता है और अहंकार द्वारा गर्व किये हुए ज्ञान को चित्त स्मरण रखता है

सार रूप में हम यह कह सकते हैं कि ज्ञानार्जन के साधनों में अंत:करण सबसे मुख्य व प्रभावी साधन हैं। आओ! हम अंत:करण को इस कथा से और अधिक समझने का प्रयत्न करें।

अंत:करण की शुद्धि

एक बार एक धनी व्यापारी ने एक महात्मा से दीक्षा देने का अनुरोध किया। महात्मा ने बात टालने का प्रयत्न किया, किन्तु व्यापारी ने पाँव पकड़ लिए। तब महात्मा ने वचन दिया कि मैं कुछ समय बाद वापस आऊंगा और तुम्हें दीक्षा दूंगा। वचन देकर महात्माजी चले गए।

पाँच पखवाड़े बाद महात्मा उसी व्यापारी के द्वार पर आये और भिक्षाम् देहि! की आवाज लगाईं। व्यापारी ने स्वर पहचान लिया और एक से बढ़कर एक पकवानों से थाली सजाकर ले आया। उसे आशा थी कि महात्माजी इस बार मुझे दीक्षा अवश्य देंगे।

महात्मा ने अपना कमण्डलु आगे करते हुए कहा, ‘सारा भोजन इसी में डाल दो।’ व्यापारी उन पकवानों को ज्योंही डालने लगा तो उसे कमंडलु में कूड़ा-करकट आदि बहुत सारी गंदगी भरी हुई दिखी। उसने महात्मा से कहा, ‘आपका कमंडलु तो बहुत ही गन्दा है, उसमें ये पकवान डाले तो खाने योग्य भी नहीं रहेंगे’।

महात्माजी ने तुरंत उत्तर दिया- ‘कमंडलु की गंदगी से जिस प्रकार भोजन अशुद्ध हो जाएगा, उसी प्रकार विषय-विकारों से मलिन तुम्हारे अंत:करण में मेरे द्वारा दी हुई दीक्षा भी अशुद्ध हो जायेगी। उसका कोई फल नहीं मिलेगा’।

व्यापारी बुद्धिमान था, वह महात्माजी का आशय समझ गया। उसने महात्माजी को प्रणाम किया और कहने लगा अब मैं अपने अंत:करण को शुद्ध करूँगा अर्थात् पहले पात्रता अर्जित करूँगा, तब दीक्षा की इच्छा!

जब अंत:करण शुद्ध एवं निर्मल होता है, तभी वह पवित्र ज्ञान प्राप्त कर सकता है। ऐसे पवित्र ज्ञान से ही व्यक्ति का जीवन सदाचारी, सद्गुणी व संस्कारी बनता है। अगले अंकों में हम अंत:करण के चारों साधनों को क्रमश: समझेंगे।

(लेखक शिक्षाविद् है, भारतीय शिक्षा ग्रन्थमाला के सह संपादक है और विद्या भारती संस्कृति शिक्षा संस्थान के सह सचिव है।)

और पढ़ें : भारतीय शिक्षा – ज्ञान की बात-6 (ज्ञानार्जन के साधन: ज्ञानेन्द्रियाँ)

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