सौम्या की सखी

– गोपाल माहेश्वरी

सौम्या आज बहुत उदास थी। आज उसके विद्यालय के छात्रावास में विभिन्न प्रतियोगिताओं में विद्यालय का प्रतिनिधित्व करने हेतु चयन प्रक्रिया चल रही थी। गीत गायन, कहानी कथन, श्लोक वाचन, तत्काल भाषण, वाद प्रतिवाद चित्रकला आदि कितनी ही प्रतियोगिताओं के लिए बच्चों का चयन हो रहा था। लेकिन उसका चयन तो किसी में भी नहीं हुआ।

विद्यालय में ही एक ओर कुछ बच्चे रंगोली, चित्रकला और मूर्तिकला का अभ्यास कर रहे थे। सौम्या ठिठकी फिर स्वयं ही बुदबुदाते हुए आगे बढ़ गई। इनमें से कुछ भी उससे हो पाएगा ऐसा उसे स्वयं नहीं लगा। वह अपने विचारों में उलझी विद्यालय के मैदान की ओर बढ़ चली।

मैदान में एक ओर गोला फेंक, चक्का फेंक, भाला फेंक की चयन परीक्षा चल रही थी। सुधीर जी बच्चों को अवसर दे रहे थे। उन्होंने सौम्या से भी पूछा “सौम्या! तुम भी प्रयास करोगी?” सौम्या के मन पर पड़ी निराशा की कठोर परत में जैसे एक दरार सी बनी। उसे लगा कुछ ऐसा है जो उसके मन में बाहर निकलने को छटपटा रहा है। उसने भाला पकड़ा और उछाल दिया लेकिन यह क्या! वह सीधे जाने की अपेक्षा वहाँ खड़े बच्चों की ओर जाकर गिर गया। सब उपहासपूर्वक  हँस पड़े।

“लक्ष्मीबाई राणा प्रताप बनने का प्रयास करें तो ऐसा ही होता है।” पता नहीं बच्चों की भीड़ में से किसने मुंह छुपाकर यह जुमला उछाला था पर व्यंग्य का यह भाला पहले से निराश सौम्या के मन में गहरे धंस गया। वह संभवतः रो देती पर तभी परिदृश्य बदल गया। सहपाठियों में हास्यविनोद चलता रहता है लेकिन कोई महापुरुषों को लेकर उपहास करे यह सुधीर जी को बिल्कुल पसंद न था। वे खेल और अनुशासन का संबंध बहुत गहरा मानते थे। खेल यानी उद्दंडता कभी नहीं, जरा भी नहीं।

वे क्रोध से आगबबूला बने बच्चों की भीड़ में घुसे और पीछे खिसक चुके लक्षित को पकड़ कर सबके बीच ले आए। वे आवाज से पहचान चुके थे कि यह उद्दंडता उसी की है। अब लक्षित थरथर काँप रहा था।

कान पकड़ कर गिड़गिड़ाने लगा “अब नहीं करूंगा, माँ कसम।”

एक झन्नाटेदार थप्पड़ और पड़ा “माँ की कसम खाते हो? निभा पाओगे? माँ का महत्व समझते हो?” बात बढ़ती देख सुशांत जी ने उसे छुड़वाया “माफी मांगों सौम्या से और अब कभी मैदान में दिखना मत। समझे?”

लक्षित ने सौम्या से क्षमा तो मांगी पर जाते-जाते धीरे से फुसफुसाता गया “देख लूँगा तुझे तो।”

सौम्या डरी। उसकी तो कोई गलती ही न थी। प्रतियोगिता में चयन तो दूर एक नया ही बखेड़ा खड़ा हो गया था।

वह आशंका और अनमनेपन के साथ वहाँ से चल पड़ी। एक एकांत कोने में खड़े बूढ़े पीपल के नीचे बने चबूतरे की धूल झाड़ कर बैठ गई। पतझर आरंभ हो चुका था। पीपल के सूखे पत्ते हवा से टूटकर गिर रहे थे। चारों ओर सूखे पत्ते बिखरे थे। सौम्या अपने ही विचारों में उलझी उन पर चलने लगी। चरमर चरमर की आवाज से उसके पैरों के नीचे आने वाले पत्ते चूरचूर हो रहे थे। उसने झुककर थोड़ा चूरा हथेली पर रखा और फूंक से उड़ाते हुए बोली “सौम्या”। उसे लगा उसका भविष्य भी इन सूखे पत्तों जैसा ही है। उसका यह विद्यालय में अंतिम वर्ष था। क्या उसे खाली हाथ ही विद्यालयीन जीवन को विदा देनी है? उसे खोजते हुए उसकी सहेली स्वरिता उधर आ गई। सौम्या का ध्यान नहीं था वह तो अपने विचारों के शोर में ऐसी खोई हुई थी कि उसे स्वरिता के आने की आहट भी न सुनाई दी।

स्वरिता ने उसे पत्तों का चूरा उड़ाते देख लिया था। उसे मैदान वाली घटना भी पता लगी थी। वह सौम्या के कांधे पर हाथ रखे बोली “पतझर हमेशा नहीं रहता।” सौम्या चुपचाप रही। स्वरिता ने अपनी सहेली का हाथ हाथों में लिया और बोली “भगवान ने सबके हाथ में कोई न कोई रेखा बनाई है सौम्या! ऐसा कोई भी नहीं जिसके हाथ में कुछ भी नहीं।” तभी पेड़ पर कोई अनजानी-सी चिड़िया ने अलग-सी आवाज निकाली। पीपल की एक कोमल कोंपल टूटकर अपनी हथेली गिरी।

“लो, ईश्वर ने संकेत भी दे दिया।” सौम्या की अंगुली उस तांबे जैसे रंग के रेशम जैसे सुकोमल कोमल पत्ते पर घूमने लगी।

चिड़िया फिर बोली। स्वरिता ने कहा “यह कौनसी चिड़िया है?”

“पता नहीं।” सौम्या का मौन टूटा। वह उस पत्ते को डंडी से पकड़ चुटकी में पकड़ घुमाते हुए बोली।

स्वरिता कहने लगी “यह मैना नहीं, कोयल या बुलबुल नहीं, न ही गौरैया या श्यामा है। इसका नाम मुझे नहीं पता, तुम्हें नहीं पता, शायद इसे भी पता न हो, पर यह इस पतझड़ में इस पेड़ पर गाने चली आयी। कौन सुनेगा इसे यहाँ? पर इसे गाना है। कोई सुने तो शायद इसे गाना भी न माने क्योंकि यह कोयल, मैना या बुलबुल जैसी नहीं है।”

“फिर कैसी है?” सौम्या के मुख से उदासी दूर जाती दिखी।

“यह इसी के जैसी है। इसका नाम प्रसिद्ध नहीं। इसकी विशेषता यहाँ कोई नहीं जानता। इसकी योग्यता का अभी कोई नाम नहीं पर यह अपने को व्यक्त कर रही है। परमात्मा के प्रति इस विश्वास के साथ कि उसे भी खाली नहीं भेजा है उसने इस संसार में।”

सौम्या मुस्कुराई। चिड़िया फिर बोली जैसे उसका समर्थन कर रही हो। दोनों सहेली अपने छात्रावास के कक्ष की ओर चल पड़ीं। पर मन का क्षोभ अभी पूरा हटा न था। उसने पानी की बोतल ली, अपनी साइकिल उठाई और स्वरिता को पीछे केरियर पर बिठाकर घूमने चल दी।

छात्रावास से थोड़ी ही दूर चौराहे पर दाहिनी ओर मोटर साइकिल से कोई गिरा हुआ था तीन-चार लोग उसे घेरे खड़े थे। पास से गुजरते हुए इन सहेलियों ने उसे पहचान लिया तो साइकिल में ब्रेक जैसे अपने आप लग गए। यह तो लक्षित ही था। उसकी दशा बता रही थी कि न केवल वह दुर्घटनाग्रस्त था बल्कि उसकी धुनाई भी हुई थी। कोई संदेह नहीं कि यह महाशय ही किसी से भिड़े हों और बदले में अच्छी पूजापत्री हो गई हो। स्वरिता ने सुशांत जी को मोबाइल पर सूचना दी। वे तीन-चार विद्यार्थियों को लेकर पहुँचे तब तक स्वरिता ने उसे पानी की बोतल से पानी पिलाया। लक्षित के सिर से खून बह रहा था। सौम्या को कुछ उपाय न सूझा तो अपनी चुन्नी ही उसके सिर पर कसकर बांध दी। तमाशा देख रहे लोगों में से किसी लड़के ने जुमला कसा “ओऽऽहो”।

अधलेटे लक्षित के दाएं हाथ का भरपूर वार उस लड़के के पैरों पर पड़ा वह लड़खड़ाकर घुटनों पर आ गया और एक भरपूर झन्नाटेदार थप्पड़ खाकर वह भौचक्का रह गया।

सुशांत जी के साथ ही सुधीर जी भी आ चुके थे।

सुधीर जी ने एंबुलेंस में चढ़ाते हुए लक्षित से पूछा “देख लिया सौम्या को?”

“क्षमा कर दो सौम्या आज से तुम्हारी इज्जत मेरी पगड़ी है बहन!” उसने सिर पर बंधी सौम्या की चुन्नी को छूकर कहा। उसकी आँखें बरस पड़ी। एंबुलेंस उसे चिकित्सा के लिए ले जा रही थी पर उसकी सोच की चिकित्सा हो चुकी थी।

मानव में प्रतिभा होना प्रशंसनीय है पर सकारात्मक और संवेदनशीलता मानव की सबसे उत्तम प्रतिभा है। जिनके बिना प्रत्येक विशेषता कांतिहीन है, फीकी है।

विद्यालय के दीक्षांत समारोह में लक्षित अपने अनुभव कथन के लिए खड़ा हुआ तो साथियों ने सोचा अब यह कुछ ऊटपटांग हास्य-व्यंग्य भरी बातें कहेगा। लेकिन वह पूरी गंभीरता से यह घटना सुनाते हुए रो पड़ा। अपनी बात पूरी करते-करते वह सौम्या के पैरों छूकर क्षमा मांगने बढ़ा तो सौम्या ने उसे बीच में ही रोक लिया “नहीं भैया! तुमने मुझे मुझसे मिलने का अवसर दिया है। मैं कोई कलाकार या खिलाड़ी नहीं तो क्या अच्छी से अच्छी मानव बनने का प्रयास करूंगी।” तालियों की गड़गड़ाहट से सबने लक्षित और सौम्या का स्वागत किया।

प्राचार्य जी के दीक्षांत उद्बोधन के भी अंतिम वाक्य थे “मानव में प्रतिभा होना प्रशंसनीय है पर सकारात्मक और संवेदनशीलता मानव की सबसे उत्तम प्रतिभा है। जिनके बिना प्रत्येक विशेषता कांतिहीन है, फीकी है। मैं शुभकामनाएं करता हूँ कि तुम सब अपनी-अपनी योग्यतानुसार कीर्ति अर्जित करो, जो चाहो सो बनो पर मानव अवश्य बने रहो।”

जाने कहाँ से वह पीपल वाली चिड़िया आकर सौम्या के हाथ पर बैठ गयी। स्वरिता ने पूछा “पहचाना सौम्या कौन है यह?” सौम्या खिलखिलाकर हँसी और बोली “ मैं इसका नाम रख ही हूँ ‘सौम्या की सखी’।”

दोनों सहेलियां हाथों पर ताली देकर हँस पड़ी। चिड़िया भी अपने नाम से प्रसन्न होकर पेड़ पर ऊँचे जा बैठी।

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(लेखक इंदौर से प्रकाशित ‘देवपुत्र’ बाल मासिक पत्रिका के संपादक है।)

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