व्यक्तित्व विकास की भारतीय संकल्पना

-दिलीप बेतकेकर

गोवा के एक उच्चतर माध्यमिक विद्यालय के कक्षा ग्यारह में अध्ययनरत एक विद्यार्थी को प्राचार्य ने घर वापिस जाने को कहा। कारण क्या था? उस विद्यार्थी ने सिर के ऊपर चोटी (शिखा) रखी हुई थी। मैं उस विद्यार्थी को माध्यमिक शाला में अध्ययन करते समय से जानता हूँ। जनेऊ संस्कार के पश्चात उसके सिर पर शिखा (चोटी) रखी गई थी। उसे इससे कोई अटपटा अनुभव नहीं होता था किन्तु प्राचार्य को वह अटपटा सा लगता था। प्राचार्य जी तो ग्रीष्म ट्टतु में भी गले में ‘टाई’ बांधकर आते हैं। उनकी इस प्रतिष्ठा में विद्यार्थी की चोटी बाधा बन रही थी।

वर्तमान में प्रचलित रौबीले व्यक्तित्व की कल्पना में, उनकी दृष्टि में ‘चोटी’ अर्थात्, कालबाह्य, कालविसंगत, व्यक्तित्व में बाधा लाने वाली बात थी। जबकि ‘टाई’ अर्थात् व्यक्तित्व को उभारने वाली, सुशोभित करने वाली बात। किसी व्यक्ति के ‘व्यक्तित्व’ का मापन करने के लिये कौन-कौन सी बातें ध्यान में रखते हैं? उस व्यक्ति का रंग, ऊँचाई, पहनावा, इन्हीं बातों पर सामान्यतः निष्कर्ष निकाला जाता है कि ‘व्यक्तित्व’ कैसा है? आकर्षक, प्रभावी व्यक्तित्व, अर्थात ऊंचा, गोरा, ऐसी ही साधारणतः कल्पना की जाती है। ‘व्यक्तित्व विकास’ कार्यक्रमों में भी सामने वाले व्यक्ति पर किस प्रकार प्रभाव डाला जाए, इसी के संबंध में ‘टिप्स’ अधिकतर दिये जाते है। अपने पाल्य को ‘व्यक्तित्व विकास’ की कक्षाओं अथवा शिविरों में पालकगण इस अपेक्षा के साथ भेजते हैं कि आजकल के स्पर्धा युग में हमारा पाल्य पिछड़ न जाए, वह ‘गँवार’ न दिखते हुए एक ‘स्मार्ट’ व्यक्ति दिखे। अधिक महत्व ‘दिखने’ पर दिया जाता है।

कुछ अंश तक ‘व्यक्तित्व’ दिखने पर आंका जाए, यह सही है, परन्तु ‘दिखने’ के साथ ‘होने’ पर अधिक प्रभावी होता है।

अंग्रेजी में ‘पर्सनॉलिटी’ शब्द ग्रीक भाषा के ‘पर्सोना’ शब्द से आया है जहाँ ‘मुखौटा’ को ‘पर्सोना’ कहते हैं अर्थात् दूसरों को दिखने वाला चेहरा। डॉ. अशोक निरपफराके के अनुसार किसी व्यक्ति का ‘व्यक्तित्व’ उसके शारीरिक और मानसिक घटकों का अनन्य साधारण एकात्म संघटन होता है। व्यक्तित्व का गठन जन्म पूर्व से होता है। उसमें कुछ भाग आनुवंशिक और कुछ भाग परिवार, परिसर, विद्यालय, मित्र, समाज आदि के द्वारा गठित होता है।

व्यक्तित्व अर्थात् जिससे कुछ व्यक्त होता है। विविध कृतियों द्वारा विविध पहलू द्वारा जो व्यक्त होता है। भारतीय कल्पना के अनुसार मानव का व्यक्तित्व पांच कोशों से बना हैः- ‘अन्नमय’, ‘प्राणमय’, ‘मनोमय’, ‘विज्ञानमय’ और ‘आनंदमय’। इन पांचों कोशों का संतुलित विकास अर्थात् संतुलित व्यक्तित्व विकास।

आजकल अधिक महत्व अन्नमय कोश को दिया जा रहा है। अन्नमय कोश अर्थात् शारीरिक भाग। इस विषय में लोग अत्यंत जागरुक हैं, किन्तु शरीर के आरोग्य के विषय में जागरुक नहीं। संपूर्ण ध्यान शारीरिक सौंदर्य की ओर रहता है। इस हेतु पहनने के कपडे़, सौंदर्य प्रसाधन, ब्यूटी पार्लर, क्रीम, साबुन, शैम्पू आदि का अविवेकी उपयोग करने पर सारा ध्यान दिया जाता है। आजकल कुछ नई कहावतें, वाक्प्रचार चलन में दिखते हैं –

(1) ‘खिसा फाटका, मोबाईल नेट का’- (जेब फटी हो फिर भी नेट वाला मोबाईल चाहिये।)

(2) ‘खायला कोंडा, फिरायला होंडा’ (खाने को तो भूसा है फिर भी घूमने के लिये महंगी ‘होंडा’ हो।)

(3) ‘रिकाम्या पर्सला झटके फार’ (पर्स खाली है फिर भी भरी होने जैसे झटके दिखाना।)

ये कहावतें आजकल की मानसिकता की ओर इशारा करती हैं। व्यक्तित्व विकास के विषय में भी ऐसा ही देखने को मिलता है।

‘शॉर्टकट’ से तुरत-फुरत कोई शॉर्टकोर्स करके व्यक्तित्व विकास का दिखावा करने की आजकल की परिपाटी बनी है। वास्तव में व्यक्तित्व विकास थोड़े समय में, कुछ ही घंटों, छुट्टियों की अवधि में होने वाला विषय नहीं है। यह एक दीर्घकालीन प्रक्रिया है। व्यक्तित्व विकास धीमे-धीमे प्रगत होता है।

इस विकास में केवल शारीरिक विकास अभिप्रेत नहीं। मानव का अर्थ केवल शरीर नहीं। व्यक्तित्व के अंतर्गत प्राण, मन, बुद्धि, आत्मा घटकों का भी समावेश है। इन सभी घटकों का विकास होना आवश्यक है, वरना एकांगी वृद्धि होगी।

शरीर व्यक्त होने वाला साधन होने के कारण उसका सुदृढ़, निरोगी, शक्तिशाली, होना आवश्यक है। शरीर संगोपन ठीक से हो इस हेतु पौष्टिक आहार और नियमित व्यायाम, ये दो बातें महत्पूर्ण हैं। आजकल विज्ञापनों का चलन बहुत अधिक है। उसमें बार बार खाद्य पदार्थों के विषय में विज्ञापित करने से खरीदने की जिद बच्चे करते हैं। प्रतिष्ठा रखने हेतु उन्हें खरीदना उचित और हितकर नहीं। व्यायाम के विषय में भी केवल स्नायु प्रदर्शन हेतु व्यायामशाला जाने वाले अनेक लोग हैं। उनमें निरंतरता कम ही होती है। अन्नमय कोश के विकास हेतु कुछ शारीरिक आदतों की ओर ध्यान देना चाहिये अन्यथा कभी-कभी व्यंग्य और अन्य समस्याएं निर्मित होती हैं। कभी कुछ व्यक्तियों में शरीर गठन अच्छा होने पर भी उनमें जोश, उमंग, उत्साह, चापल्य आदि गुणों की कमी दिखती है। चलने-फिरने में आत्मविश्वास में कमी, बोलने में अस्पष्टता, आवाज कमजोर। ये बातें अप्रभावी रहती है। चेहरा भावहीन, हास्यहीन, ऐसा क्यों? प्राणमय कोश का दुर्बल, कमजोर, उपेक्षित रहना। ज्ञान और जानकारी का भंडार होना ही पर्याप्त नहीं, उसका दर्शन, ‘प्रेजेंटेशन’ अच्छा होना भी जरूरी है।

शरीर दृश्य है, स्थूल है, किन्तु मन, बुद्धि न दिखने वाले, अर्थात् सूक्ष्म कोश है। भारतीय दृष्टि केवल बाह्य दृश्य बातों को महत्वपूर्ण नहीं मानती। केवल बाह्य बातों पर ध्यान देने से धोखा हो जाता है। इस भ्रम के संबंध में संत चोखामेला कहते हैं – “ऊस डोंगा परि रस नेहि डोंगा, काय भुललासी वरलिया रंगा?” (गन्ना दिखने में ऊपर से अच्छा नहीं फिर भी अंदर से उसका रस मीठा होता है।) इस प्रकार ऊपर-ऊपर की भूलभुलैया से बहुत नुकसान चारों ओर दिखाई देता है।

“नाही निर्मल मन, काय करील साबण”? (मन ही साफ नहीं तो साबुन क्या करेगा?) ऐसा संत लोग कहते हैं। शांत, स्वस्थ, संतुलित मन पर अनेक बातें निर्भर करती हैं। शरीर के लिये जैसे आहार, व्यायाम महत्वपूर्ण है, मन के लिये भी संस्कार, सुसंगति, स्वाध्याय, प्रार्थना आदि का अत्यंत महत्व है। शरीर को जैसे कपड़े, स्वर्ण अलंकार, आभूषण आदि से सुशोभित करते हैं वैसे ही अंतरंग को सुशोभित करने हेतु विवेक, विचार, संयम आदि है। समर्थ रामदास कहते हैं –

नानारत्ने आभूषणे, शरीर श्रृंगारिले।

विवेक, विचारे, राजकारणे अंतर श्रृंगारिले।।

विज्ञानमय कोश का विकास, अर्थात् बौद्धिक विकास।

ग्रहण शक्ति, स्मरणशक्ति, विचारशक्ति, कल्पनाशक्ति आदि क्षमताएँ विज्ञानमय कोश के अंतर्गत होती हैं। जितने अधिक गहराई में जायेंगे उतनी अधिक क्षमता ध्यान में आती है। प्रत्येक व्यक्ति के पास कम से कम आठ-दस क्षमताएं होती है। ये सभी एक समान मात्रा में नहीं होती। अपने स्वयं के पास ऐसी कौनसी क्षमताएं हैं जो अपने लिए बलस्थान हों और उनका विकास कैसे हो, इस संबंध में प्रथमतः पालक, तत्पश्चात् विद्यार्थी को ही तय करना पड़ेगा। उनके विकास हेतु कौन से मार्ग और अवसर उपलब्ध हैं इसको समझ लेना आवश्यक है। ये निश्चित होने पर एकलव्य, अर्जुन जैसी साधना करनी होगी। “असेल माझा हरि तर देईल खाटलयावरी”, (यदि परमेश्वर चाहेंगे, भाग्य में होगा तो बैठे ठाले अपने आप प्राप्त हो जायेगा।) ऐसा कहकर काम चलने वाला, या कुछ प्राप्त होने वाला नहीं है। ‘एकलव्य’ प्रवृत्ति आजकल कम ही दिखाई देती है।

‘आनंदमय कोश’ अन्य की अपेक्षा अत्यंत सूक्ष्म है। अपना अहंभाव, अस्मिता, मैं ही सब कुछ, जो सब व्यक्तित्व के केंद्र बिंदु हैं, उनका समावेश आनंदमय कोश के अन्तर्गत आता है। मैं कौन? मेरे जीवन का उद्देश्य क्या है? मेरे आस पास की सृष्टि से मेरा क्या संबंध है? उनसे मेरा क्या रिश्ता है? परमेश्वर से क्या रिश्ता है? ऐसे सवालों के उत्तर खोजने में निरंतर कार्यरत रहते हुए इस कोश का विकास होता है। आद्य शंकराचार्य जी कहते हैं,- “मैं प्रत्यक्ष शिव हूँ, चैतन्य हूँ, इसकी अनुभूति होना, ये सारी यात्रा ही ‘आनंदमय कोश’ का विकास है।”

व्यक्तित्व का विकास किसलिये? क्यों करें ये सब प्रयास? एक कवि ने सुंदर उत्तर दिया है- “सुंदर मी परि नच शोभेस्तव, जनहित हेतुक मम बलवैभव” (मैं केवल शोभा के लिये नहीं हूँ, मेरे जो भी वैभव हैं वे जनहित के लिये है। स्वयं को विकसित करते हुए समाज हित में, ईश्वर चरण में अर्पण करना है। वह विकसित हो और अर्पित हो।”)

गोमंतकीय कवि बा.भ.बोरकर ने अपनी एक कविता द्वारा एक आदर्श सुंदर, व्यक्तित्व की सुंदर प्रस्तुति की है। कौनसा चेहरा सुंदर मानें? आंखें और होंठ का सौंदर्य किस पर निर्भर है, सुंदर हाथ, पैर और कंधे कौन से? इसका अप्रतिम वर्णन उन्होंने किया है :

देखणे ते चेहरे जे प्रांजलाचे आरसे,

गोरटे की सांवले याला मोल नाहीं फारसे।

देखणा देहात तो जो सागरी सूर्यास्त सा,

अग्निचा पेरून जातो राज गर्भी वारसा।

(चमक चेहरे पर विराजे हृदय स्थित सत्य से। साँवला या गोरापन है अप्रभावित इस तथ्य से।। सागरोन्मुख सूर्य ज्यों द्विगुणित करे जल दीप्ति को तन समर्पित लक्ष्य को मुख प्राप्त अग्नि प्रदीप्ति को।)

संपूर्ण मूल कविता पठनीय है। ऐसे व्यक्तित्व प्रत्येक घर में, शाला में, समाज में मिलें, यही प्रार्थना।

और पढ़े: भारतीय शिक्षा – ज्ञान की बात-26 – (व्यक्ति, व्यक्तित्व और विकास)

(लेखक शिक्षाविद, स्वतंत्र लेखक, चिन्तक व विचारक है।)

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *