भारतीय शिक्षा – ज्ञान की बात 76 (भारत की शिक्षा भारतीय नहीं है)

 ✍ वासुदेव प्रजापति

भारत में दी जाने वाली शिक्षा कहलाती तो भारतीय ही है, परन्तु सही अर्थों में वह आज भी भारतीय नहीं है। कुछ लोगों के द्वारा यह तर्क दिया जाता है कि भारत एक सार्वभौम प्रजातांत्रिक देश है। यहाँ का शासन देश के अधिकृत नागरिक  चलाते हैं। उन्हीं के द्वारा पारित किए हुए कानूनों से देश की शिक्षा चलती है। ऐसी शिक्षा भारत के नागरिकों के लिए ही है, इसलिए भारत में दी जाने वाली शिक्षा भारतीय शिक्षा ही तो है।

शिक्षा तांत्रिक रूप से भारतीय है

देश में दी जाने वाली शिक्षा भारतीय है, ऐसा मानने वालों का मत केवल तांत्रिक दृष्टिकोण को बतलाता है। तांत्रिक दृष्टिकोण से की गई व्यवस्थाएँ जड़ होती हैं। यंत्र के स्वभाव जैसी होती हैं और कृत्रिम होती हैं। तांत्रिक शिक्षा कभी भी मनुष्य के लिए हितकारी नहीं होती, क्योंकि मनुष्य जड़ नहीं है,यंत्र नहीं है, वह तो चेतन है। जड़ व्यवस्था चेतन मनुष्य में सकारात्मक परिणाम नहीं ला सकती। वह मनुष्य को भी अपने जैसा यंत्र मात्र बना देती है। इस शिक्षा से भारत में भारतीय बनने के स्थान पर यांत्रिक नागरिक ही बन रहे हैं। इसीलिए यह शिक्षा कहने मात्र के लिए ही भारतीय है।

शिक्षा राष्ट्रीय चरित्र के अनुरूप नहीं

प्रत्येक देश की शिक्षा उस देश के राष्ट्रीय चरित्र के अनुरूप होती है। राष्ट्रीय चरित्र ही उस राष्ट्र का मूल स्वभाव होता है। यह मूल स्वभाव ही उस राष्ट्र की पहचान होती है। शिक्षा उसका अनुसरण करती है और उसे पुष्ट बनाती है। अन्य देशों में ऐसा ही है, परन्तु भारत की बात सर्वथा इसके विपरीत है। भारत में यहाँ के तथाकथित बुद्धिजीवियों को इस सिद्धांत का ज्ञान ही नहीं है। कुछ को ज्ञान है, परन्तु वे इस सिद्धांत से सहमत नहीं हैं। उनका तर्क है कि विश्व के सभी राष्ट्र एक जैसे ही होते हैं। इसलिए शिक्षा के सिद्धांत भी समान होते हैं। शिक्षा के अलग से कोई भारतीय सिद्धांत नहीं होते, वे ऐसा मानते हैं। यही कारण है कि भारत में भारतीयता के विषय में मतैक्य नहीं है। शिक्षा विषयक जो भी योजनाएँ बनाई जाती हैं, वे न तो पूर्णतया भारतीय होती हैं, न पाश्चात्य। वे विदेशियों की कच्ची नकल मात्र होती हैं।

शिक्षा का उद्देश्य अर्थार्जन हो गया

भारत में शिक्षा सदैव अर्थनिरपेक्ष रही है। 18वीं शताब्दी तक भारत में शिक्षा निशुल्क थी, परन्तु आज शिक्षा का बाजार खड़ा हो गया है। आज शिक्षा का विचार अर्थार्जन के सन्दर्भ में होता है। अर्थ के बारे में जिस प्रकार विचार किया जाता है, ठीक उसी प्रकार से शिक्षा के बारे में विचार किया जाता है। भारत में शिक्षा का उद्देश्य सदैव ज्ञानार्जन रहा है, परन्तु आज वह उद्देश्य बदलकर अर्थार्जन हो गया है। आज शिक्षित की प्रतिष्ठा उसके ज्ञानवान होने के कारण नहीं अपितु वे खूब धन कमाते हैं, इसलिए होती है। सामान्यजन की यह धारणा बन गई है कि यदि पढ़-लिखकर भी पैसा नहीं कमाया तो शिक्षा किस काम की?

जिस विद्या को पढ़ने से खूब धन कमाया जाता है, उन विद्याओं के लिए भारी शुल्क चुकाना पड़ता है। उनमें प्रवेश लेने के लिए भी कठोर स्पर्धा देनी पड़ती है। जब सरकार इन विद्याओं के लिए व्यवस्था नहीं कर पाती तब उद्योगपति इनकी व्यवस्था कर खूब पैसा कमाते हैं। इस प्रकार जब शिक्षा अर्थार्जन के लिए होती है, तब शिक्षा का उद्योग पनपता है। ज्ञान बेचने व खरीदने की वस्तु बन जाती है। ज्ञान के लिए भी बाजार की भाषा बोली जाती है, जिससे ज्ञान की पवित्रता का नाश होता है। ज्ञान की कीमत अर्थ से आँकी नहीं जा सकती। परन्तु जब असम्भव को सम्भव बनाया जाता है तो अर्थक्षेत्र में अव्यवस्था हो जाती है। ज्ञान का सही स्वरूप नष्ट होकर वह आभासी बन जाता है। इस प्रकार ज्ञानक्षेत्र मिथ्या हो जाता है, और मिथ्या ज्ञान हानिकर ही होता है।

अर्थातुराणाम् न गुरुर्नबन्धु:

जो अर्थ का भोगी है, वह गुरु और भाई जैसे निकटतम सम्बन्धों को भी भूला देता है। अर्थात अर्थ मनुष्य को रूखा और स्वार्थी बना देता है। उसके मन व हृदय में आत्मीयता और परिवार भावना समाप्त हो जाती है। अनियंत्रित अर्थ व्यक्ति के स्वास्थ्य, समाज की समरसता और पर्यावरण के नाश का कारण बनता है। समृद्धि शनै शनै नाश की ओर धकेलती है। फलस्वरूप अर्थ अनर्थक बन जाता है। अमर्यादित उपभोग और अत्यधिक अर्थार्जन के कारण मनुष्य जीवन में निरर्थक व्यस्तता बढ़ती है। इन दोनों में इतना अधिक समय बीतता है कि अच्छे कामों के लिए समय और शक्ति बचते ही नहीं। अच्छे कामों के अभाव में जीवन में छिछलापन बढ़ता है और गहराई घटती जाती है। हानिकारक वस्तुओं का उत्पादन बढ़ता है और गुणवत्ता कम हो जाती है। जब कीमतें बढ़ती हैं तब वस्तु की गुणवत्ता की परख भी नहीं रहती और व्यक्ति सुख का स्वाद ही भूल जाता है।

सर्वे गुणा: कांचनमाश्रयन्ते

अर्थपरक शिक्षा होने से गुणवान का आदर कम होता है और अर्थवान का बढ़ता है। लायक को आदर न मिलने से और नालायक को आदर मिलने से मिथ्या अहंकार बढ़ता है और समाज में उद्दण्डता फैलती है, दम्भ और दर्प बढ़ते हैं। फलत: संस्कारों का नाश होता है। जब शिक्षा अर्थपरक हो जाती है तब शास्त्रोक्त स्थिति बनती है –

यस्यास्ति वित्तम् स नर: कुलीन: स पण्डित: स श्रुतवान गुणज्ञ:।

स एव वक्त्ता स च दर्शनीय: सर्वे गुणा: कांचनमाश्रयन्ते।।

एकमात्र धनवान बन जाने से वह व्यक्ति कुलीन, पंडित, श्रुतवान, वक्ता एवं दर्शनीय मान लिया जाता है। इसलिए कहा गया है कि सभी गुण कंचन के आश्रय में रहते हैं। अर्थ ही विकास का मापदण्ड बन जाता है। वे देश जिनके पास संसाधन अधिक हैं, विकसित देश कहलाते हैं, जिनके पास कम हैं, वे देश विकासशील कहलाते हैं। विकसित देशों की श्रेणी में गिने जाने के लिए उन देशों को अपने श्रेष्ठ मानवीय गुणों को छोड़ना पड़ता है।

हमारे देश में अर्थ सदैव धर्म के नियंत्रण में रहने के फलस्वरूप हितकारी रहा है। और शिक्षा का काम धर्म सिखाना है, परन्तु जब वही शिक्षा बाजार बन जाती है तब धर्म नहीं सिखा सकती। परिणाम स्वरूप अधर्म फैलता है। जब शिक्षा अर्थ प्राप्त करना सिखाती है, तब धर्म के साथ अर्थ का भी नाश होता है। धर्म का नियमन और नियंत्रण न होने से व्यक्ति असंयमित उपभोग की ओर बढ़ता है। अर्थ का प्रभाव उसे बाँध देता है। जहाँ एक ओर अर्थ का प्रभाव होता है, वहीं दूसरी ओर अर्थ का अभाव भी होता है। अर्थ के अभाव व प्रभाव में पिसते-पिसते समाज का सन्तुलन बिगड़ जाता है और अव्यवस्था फैल जाती है।

चार्वाक का सिद्धांत चलता है

शिक्षा जब अर्थ के अधीन हो जाती है तब लोग सेवा, सहायता, दान, धर्मादाय का त्याग कर देते हैं। दीन-दुखी, निर्धन और अनाथ लोगों की सहायता नहीं करते। दान देने के स्थान पर मुफ्तखोरी की वृत्ति बढ़ती है। बचत की मात्रा कम हो जाती है। आय से खर्च कम होना चाहिए, यह सिद्धांत विस्मृत हो जाता है। ऋण लेने की प्रवृत्ति बढ़ती है, ऋण लेने का संकोच कम हो जाता है और सामाजिक लज्जा तो समाप्त हो जाती है। ऋण लेने के बाद ऋण चुकाने की आकांक्षा कम हो जाती है। उल्टे ऋण न चुकाना पड़े उसके लिए कोई न कोई युक्ति-प्रयुक्ति का प्रयोग करने में बुद्धि लगाई जाती है। इस प्रकार “ऋणम् कृत्वा घृतम् पिबेत” अर्थात ऋण करके भी घी पीओ वाला चार्वाक का सिद्धांत अपनाया जाता है।

ऋण लेने की व्यवस्था बहुत प्रचलित हो जाती है। बैंकिग उद्योग इतना बढ़ जाता है कि अब बिना ऋण लिए वाहन या मकान खरीदना लोगों के लिए सम्भव नहीं होता। ऋण चुकाने की वृत्ति न होने के कारण बैंकों का दिवाला निकलना आम बात हो जाती है। ऐसा होने से निर्लज्ज लोगों को लाभ और शीलवान लोगों को हानि सहनी पड़ती है।

आर्थिक गुलामी बढ़ती है

शिक्षा जब अर्थपरक होती है तब उत्पादन, वितरण और उपभोग में विवेक का अभाव होने से आर्थिक असन्तुलन निर्माण होता है, फलतः बेरोजगारी, भ्रष्टाचार व शोषण बढ़ता है। इनके बढ़ने से कुछ लोग तो बहुत धनवान हो जाते हैं और अधिकांश लोग निर्धन रह जाते हैं। कर चोरी, काला धन, विदेशी निवेश, संग्रहवृत्ति, खाद्य पदार्थों में मिलावट आदि अनिष्ट बढ़ जाते हैं।

समाज में से श्रद्धा और विश्वास समाप्त हो जाते हैं और तनाव, असुरक्षा, चिंतादि बढ़ जाते हैं, जिससे मनोरुग्णता घर कर जाती है। अर्थात लोगों में आर्थिक गुलामी बढ़ने लगती है। यह प्रछन्न गुलामी समझ में भी नहीं आती। आर्थिक गुलामी आने से स्वतंत्रता और स्वावलंबन के साथ-साथ उद्यमशीलता का भी नाश हो जाता है। परिणामस्वरूप स्वास्थ्य व संस्कार भी नष्ट हो जाते हैं।

विज्ञापन भावनाओं को उकसाते हैं

विज्ञापनों के माध्यम से उत्पादित वस्तुओं का बाजार कृत्रिम पद्धति से निर्माण किया जाता है। विज्ञापन हमेशा झूठ पर आधारित होते हैं। विज्ञापनों के इस झूठ का ग्राहकों को पूरा पता होता है, परन्तु वे ग्राहकों के मन की कोमल भावनाओं को उकसाते हैं, उन्हें आकर्षित करते हैं और मूर्ख बनाकर अनावश्यक वस्तुओं को खरीदने के लिए बाध्य करते हैं। इस स्थिति में अर्थ का प्रभाव बढ़ता है, जब प्रभाव बढ़ता है तो उपभोग भी बढ़ता है। क्योंकि उपभोग ही अर्थार्जन का प्रेरक तत्त्व है। उपभोग की मर्यादा नष्ट होने से शरीर की कार्य क्षमता चली जाती है और कौशल का ह्रास होता है।

आज हमारे देश की ऐसी ही स्थिति है। ये सभी सिद्धांत पाश्चात्य हैं। शिक्षा के केन्द्र तो बहुत चलते हैं, परन्तु शिक्षा अर्थ के अधीन होने से उसका स्वत्व ही समाप्त हो गया है। वह जीवन को चरित्रवान बनाकर उसे उन्नत बनाने के अपने दायित्व को पूरा नहीं कर पाती। जो शिक्षा व्यक्ति को पाश्चात्य जीवन शैली अपनाने की प्रेरणा देती है, जीवन में धन ही सर्वोपरि है, यह सिखाती है वह व्यक्ति कभी भी सच्चा ज्ञान प्राप्त नहीं कर सकता। इन सभी तथ्यों के आधार पर हम यह कह सकते हैं कि अभी भी भारत में दी जाने वाली शिक्षा पाश्चात्य ही है, भारतीय नहीं है। हमें शिक्षा को भारतीय बनाना है।

(लेखक शिक्षाविद् है, भारतीय शिक्षा ग्रन्थमाला के सह संपादक है और विद्या भारती संस्कृति शिक्षा संस्थान के सचिव है।)

और पढ़ें : भारतीय शिक्षा – ज्ञान की बात 75 (स्वायत्त शिक्षा व्यवस्था का नाश)

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