भारतीय शिक्षा – ज्ञान की बात 69 (बालक शिक्षा और बालिका शिक्षा- भाग १)

 – वासुदेव प्रजापति

शिक्षा क्षेत्र में आज सर्वत्र सहशिक्षा का बोलबाला है। बालक-बालिका ही नहीं अभिभावक भी सहशिक्षा के पक्ष में खड़े दिखाई देते हैं। उनका यह तर्क भी उचित प्रतीत होता है कि शिक्षा के जितने भी विषय हैं, वे बालक व बालिका दोनों के लिए समान हैं। उदाहरण के लिए व्यक्तित्व विकास, विकास का स्वरूप, ज्ञानार्जन, ज्ञानार्जन के करण आदि सभी विषय बालक व बालिका दोनों के लिए समान रूप से लागू होते हैं।

यह सत्य है कि अधिकांश विषय दोनों के लिए समान हैं, फिर भी कुछ विषय ऐसे अवश्य हैं, जिन पर अलग अलग विचार करना आवश्यक है। जैसे – जब विवाह संस्कार की बात होती है तब अच्छे वर के लक्षण पुरुष को ध्यान में रखकर ही बतायें जाते हैं और अच्छी वधू के लक्षण स्त्री को ध्यान में रखकर ही बताये जाते हैं। वेशभूषा के विषय में भी अलग से ही विचार करते हैं। पुरुष यदि ऊपर का वस्त्र नहीं पहनेगा तो कोई आपत्ति नहीं होगी, परन्तु अगर स्त्री ऊपर का वस्त्र नहीं पहनेगी तो घोर आपत्ति होगी। स्त्री के लिए लज्जा रक्षण का प्रश्न खड़ा हो जायेगा।

अतः स्त्री और पुरुष का विषय एक ऐसा विषय है, जो परिस्थितिजन्य और मनोवैज्ञानिक कारणों से उलझ गया है। आज इसे आग्रह पूर्वक सुलझाने की आवश्यकता है। इसे सुलझाने से पूर्व हमें परमात्मा के सृष्टि सृजन का हेतु समझना होगा।

सृष्टि पुरुष व प्रकृति का मेल है

जब परमात्मा सृष्टि के सृजन में लगा तो सबसे पहले वह जड़ व चेतन या पुरुष व प्रकृति इन दो धाराओं में विभाजित हुआ। पुरुष और प्रकृति को हम स्त्री धारा व पुरुष धारा भी कहते हैं। किन्तु यहाँ एक बात ध्यान में रखनी आवश्यक है कि यहाँ पुरुष नामक संज्ञा देहधारी पुरुष नहीं है। इसी तरह प्रकृति यह देहधारी स्त्री नहीं है। पुरुष व प्रकृति ये दोनों तत्त्व हैं। ये दोनों तत्त्व समान हैं, इनमें कोई भी तत्त्व अधिक या कम नहीं है। इनमें कोई एक श्रेष्ठ व दूसरा निम्न ऐसा नहीं है। दोनों समान हैं और दोनों के मिलने पर ही सृजन होता है, सृजन के लिए दोनों का होना आवश्यक है।

सृष्टि रचना के प्रारम्भ में चेतन व जड़ तत्त्वों की गाँठ बँध जाती है, इस गाँठ को ही चिज्जड ग्रंथी कहते हैं। यह चिज्जड ग्रंथी बनने के बाद ही सृष्टि का सृजन होता है। सृष्टि के सभी पदार्थों में ये दोनों तत्त्व होते ही हैं। किसी भी पदार्थ में इन दोनों में से एक का भी अभाव नहीं होता। मनुष्य देहधारी स्त्री-पुरुष इस स्त्री धारा व पुरुष धारा के प्रतिनिधि हैं। दोनों समान हैं, दोनों अनिवार्य हैं, दोनों परस्पर पूरक हैं और दोनों एक दूसरे के बिना अपूर्ण हैं। दोनों मिलकर ही पूर्ण होते हैं, जब पूर्ण होते हैं, तब एक होते हैं। तात्पर्य यह है कि भारतीय तत्त्वचिन्तन में स्त्री और पुरुष को समान माना गया है। इनमें कहीं भी श्रेष्ठ या निम्न का भेद नहीं है। यही भारतीय चिन्तन का मूल है विचार है।

स्त्री विषयक पाश्चात्य चिन्तन

भारतीय चिन्तन में स्त्री व पुरुष समान है, सृजन के लिए दोनों आवश्यक हैं, पुरुष मुख्य व स्त्री गौण नहीं है। परन्तु पाश्चात्य चिन्तन में यह समानता नहीं है। उन्नीसवीं शताब्दी तक यूरोप में स्त्री को पुरुष की तुलना में बहुत निम्न माना जाता था। वे मानते थे कि स्त्री में आत्मा होती ही नहीं है। वह तो पुरुष के उपभोग हेतु बना हुआ पदार्थ मात्र है। स्त्रियों को उस समय तक मतदान का अधिकार नहीं था। समाज में स्त्रियों को दूसरे दर्जे का स्थान प्राप्त था। जबकि भारत में प्रारम्भ से ही स्त्री को समान स्थान प्राप्त था। प्रत्येक मांगलिक कार्य बिना पत्नी के असम्भव था। यहाँ तक कि अकेले सम्राट का राज्यतिलक भी नहीं हो सकता था। रानी का साथ होना आवश्यक था, राजगुरु दोनों का एक साथ राजतिलक करते थे। यह समानता केवल चिन्तन में नहीं प्रत्यक्ष व्यवहार में भी परिलक्षित होती है।

स्त्री स्वतंत्रता का नारा भारत का नहीं है

भारत में यह नारा अंग्रेजों की देन है। उन्नीसवीं शताब्दी में यूरोप में सुधार का दौर चला था। जिसमें स्त्रियों की मुक्ति, स्त्री-पुरुष समानता तथा स्त्रियों के स्वतंत्र व्यक्तित्व का विकास आदि विषय लेकर आन्दोलन शुरु हुए। अंग्रेज जब भारत आए तब अपने साथ ये विषय भी लेकर आए। यहाँ आकर उन्हें यही लगा कि भारत में भी स्त्रियों का शोषण हो रहा है। किन बातों के आधार पर उनकी यह धारणा बनीं? यह जानना भी आवश्यक है।

उन्होंने देखा कि भारत में स्त्रियाँ पढ़ने के लिए विद्यालय नहीं जाती, दिनभर घर के काम ही करती रहती हैं। उन्हें बाहर जाकर अपना कर्तृत्व दिखाने का और प्रतिष्ठित होने का अवसर नहीं मिलता। उसे कमाने नहीं दिया जाता इसलिए वह आर्थिक दृष्टि से हमेशा पुरुष के अधीन रहती है। पिता की सम्पत्ति में पुत्री को हिस्सा नहीं मिलता। कई जातियों में पुत्री को जन्मते ही मार दिया जाता है। स्त्री यदि विधवा हो जाय तो उसे पुनर्विवाह की अनुमति नहीं, परन्तु पुरुषों को पुनर्विवाह की अनुमति है। यह तो स्त्रियों के शोषण की पराकाष्ठा है। इसलिए भारत की स्त्रियों को भी इस शोषण से मुक्त करवाना चाहिए, ऐसा अंग्रेजों का अनुभव था।

भारतीय मानस को समझने की भूल

भारत की समाज व्यवस्था, गृहव्यवस्था, शिक्षा व्यवस्था और परम्पराओं आदि का ज्ञान अंग्रेजों को नहीं था। इसलिए उन्होंने दिखाई देने वाले चित्र का अर्थ अपनी बुद्धि से लगाया। भारत की जीवन दृष्टि और यूरोप की जीवन दृष्टि में जो अन्तर था, उसके कारण उन्हें यहाँ का चित्र विपरीत ही दिखाई दिया। दुर्भाग्य की बात तो यह थी कि अंग्रेजी शिक्षा प्राप्त उच्च वर्ग के भारतीय भी अंग्रेजों के प्रभाव में आ गए और इन बातों में वे लज्जित होने लगे। उन्होंने अंग्रेजों के स्त्री मुक्ति के प्रयासों में न केवल सहायता ही की अपितु उनमें बढ़-चढ़ कर भाग भी लिया। विवाह विषयक, विवाह की आयु विषयक कानून बने, शिक्षा को प्रोत्साहित किया और अनेक सामाजिक परम्पराओं पर पिछड़ेपन का और अंधश्रद्धा का ठप्पा भी लगा दिया। उस समय से लेकर आज तक यही प्रक्रिया देश में चल रही है।

भारतीय समाज में भारी परिवर्तन हुए

अंग्रेजी मानसिकता के कारण विगत दो सौ वर्षों के भारतीय समाज में अनेक परिवर्तन हुए। स्त्रियों की स्थिति और पुरुषों की मानसिकता बिगड़ती गई। पहले स्त्रियों की शिक्षा जो घर में होती थी, वह बन्द होने लग गई। कारीगरों के व्यवसाय टूटते-टूटते समाप्त होने लगे। पहले व्यवसाय परिवार का होता था, अब व्यक्तिगत व्यवसाय हो जाने से स्त्रियों की आर्थिक सहभागिता समाप्त होने लगीं। नौकरी का प्रचलन बढ़ने लगा, नौकरी तो व्यक्तिगत होती थी परिवार की नहीं। फलतः स्त्रियों की अधीनता बढ़ने लगीं। स्त्रियों को उनकी विपरीत स्थिति के बारे में उकसाने का कार्य भी साथ-साथ चलता रहा।

इन सब परिणामों के कारण स्त्री-पुरुष के सम्बन्ध बदल गए और नए सिरे से व्याख्यायित होने लगे। सह अस्तित्व के सिद्धांत पर चलने वाले समाज में एक वर्ग का हित दूसरे वर्ग का विरोधी है, ऐसी स्पर्धा आधारित मानसिकता बढ़ने लगीं। आज तो स्वाभाविक रूप से यह कहा जाने लगा है कि “आज का युग तो स्पर्धा का युग है”। अब हम इस बदली हुई परिस्थिति में जी रहे हैं। हमारे देश का बहुत बड़ा शिक्षित वर्ग ऐसा है, जिसने इस स्थिति को स्वीकार कर लिया है।

आज घर को देखने वाला कोई नहीं है

अब स्त्री स्वतंत्र व्यक्ति है। उसे पढ़ने की, अर्थार्जन करने की उतनी ही स्वतंत्रता है, जितनी एक पुरुष को है। विवाह के विषय में भी उतनी ही स्वतंत्रता है। अब विधवा विवाह, विवाह विच्छेद, अविवाहित रहना, बिना विवाह किए स्त्री-पुरुष का साथ-साथ रहना अब आपत्तिजनक नहीं रहा। इन सब बातों का परिणाम हमारी गृहसंस्था पर बहुत विपरीत हुआ है।

हमारे यहाँ परिवार व्यवस्था में घर चलाना स्त्री का काम माना जाता था। अब वह स्त्री का दायित्व नहीं रहा। अब वे सभी काम जो पुरुषों के माने जाते रहे हैं, उन्हें करने के लिए स्त्री स्वतंत्र है। आज की स्त्री पुरुषों को यह दिखाने के मूढ़ में है कि वह सब कुछ कर सकती है। उसने यह सिद्ध भी कर दिखाया है कि वह वे सभी काम कर सकती है जो पुरुष करता है, और पुरुषों से अच्छी तरह कर सकती है।

स्त्री ने पुरुषों को अपनी कुशलता व क्षमता तो दिखा दी, किन्तु घर उपेक्षित हो गया। अब घर को देखने वाला कोई नहीं है। घर स्त्री व पुरुष दोनों की वरीयता में ही नहीं है। घर की चिन्ता करने वाली न स्त्री है और न पुरुष है। जो घर शिक्षा व संस्कार के साथ-साथ नई पीढ़ी के निर्माण का केन्द्र है, आज उसकी ओर देखने वाला कोई नहीं है। स्त्री व पुरुष दोनों के लिए घर के बाहर जाकर अर्थार्जन करना सबसे प्रमुख कार्य हो गया है। इस प्रकार घर के अस्त-व्यस्त हो जाने से समाज का सांस्कृतिक आधार ही नष्ट हो गया है। यही आज की आधुनिकता बन गई है।

क्या प्राचीन भारत में स्त्रियाँ अशिक्षित थीं?

जो भारतीय संस्कृति को जानता है, उसके लिए यह प्रश्न ही अज्ञानता का द्योतक है। प्राचीन भारत की नारी का वह उज्ज्वल चरित्र आज भी सबके लिए आदर्श है। वह सेवा को अपना अधिकार समझती है, इसलिए देवी है। वह त्याग की प्रतिमूर्ति है, इसलिए सम्राज्ञी है; विश्व उसके वात्सल्यमय आंचल में स्थान पा सकता है, इसलिए जगन्माता है।

प्राचीन भारत की नारी समाज में अपना स्थान माँगने नहीं गई थी। मंच पर खड़े होकर अपने अभावों की माँग रखने की आवश्यकता उसे कभी प्रतीत नहीं हुई और न कभी नारी के अधिकारों पर वाद-विवाद करने का उसे अवकाश ही मिला। वह तो सदैव नारी की सरलता, सेवा, त्याग व मातृत्व का गौरव लेकर निस्वार्थ भाव से अपने कर्तव्य में लीन रहती थी। ऐसी उच्चादर्शों वाली नारी के लिए ही मनु महाराज ने कहा था – “यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवता:।” भला ऐसी नारी अशिक्षित कैसे मानी जा सकती है?

हमारी हिन्दू संस्कृति में स्त्री अर्धांगिनी के रूप में पुरुष का बराबर सहयोग करती थीं, जिसका अत्यन्त सौम्य रूप हमें कवि कुलगुरु महाकवि कालिदास के शब्दों में यों मिलता है –

विधेः सायन्तनस्यान्ते स ददर्श तपोनिधिम्।

अन्वासितमरुन्धत्या  स्वाहयेव   हविर्भुजम्।। (रघुवंश १/५६)

निर्जन वनस्थली में ऋषिराज वसिष्ठ अपनी भार्या अरुन्धती के साथ सायंकाल की होम क्रिया सम्पन्न कर रहे हैं। यह नारी शिक्षा का कैसा श्रेष्ठ व देदीप्यमान उदाहरण है! अशिक्षित नारी क्या इस प्रकार सहयोग प्रदान करने में समर्थ हो सकती थीं? यह यज्ञ का स्थूल स्वरूप था। परन्तु यही यज्ञ की भावना जब अन्तर्मुखी हो जाती है, तब नारी का समस्त जीवन ही यज्ञमय होकर एक पवित्र साधक का रूप धारण कर लेता है। अर्थात उस समय की नारी वेद विदूषी थीं, समाज में समान स्तर प्राप्त थी, वह शोषिता नहीं थी। अंग्रेजों ने अज्ञानतावश ऐसी निर्मूल धारणा बना ली थी।

बालक व बालिका शिक्षा का शेष विचार आगामी भाग २ में …………..

(लेखक शिक्षाविद् है, भारतीय शिक्षा ग्रन्थमाला के सह संपादक है और विद्या भारती संस्कृति शिक्षा संस्थान के सचिव है।)

और पढ़ेंभारतीय शिक्षा – ज्ञान की बात 68 (औपचारिक-अनौपचारिक शिक्षा तंत्र)

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