सा विद्या या विमुक्तये
“नमस्ते, आइये सर! आज सुबह, इस समय कैसे आना हुआ? कोई विशेष कार्य?” उस शासकीय अधिकारी पालक ने स्वागत किया। तुरंत चाय भी मंगवाई गयी। उसी समय उच्चतर माध्यमिक विद्यालय में अध्ययनरत उनकी पुत्री हाथ में गणवेश लिए हुए आयी। बोली “डैडी, मेरी ड्रेस पर इस्त्री कर दीजिये।” कपड़े पिता के समक्ष रखते हुए आज्ञा जैसे अंदाज में वह बोली। अधिकारी पिता तुरंत चुपचाप उठे और मेरे साथ बातचीत करते हुए कपड़ों पर इस्त्री करने लगे। गणवेश तैयार हो गया। मैं भी बातचीत समाप्त कर उनसे विदा लेकर घर वापस आ गया—
—परन्तु दिनभर वह एक छोटा सा, साधारण सा प्रसंग मेरी आंखों के समक्ष मंडराता रहा। वैसे इतना गंभीर भी कुछ न था! परन्तु कुछ सवाल तो समक्ष खड़े थे!
अपने कपड़ों पर स्वयं इस्त्री न करके यह कार्य उसने अपने पिता को क्यों सौंपा? ये केवल आज के लिये ही था या यह आदत रोज की है? पिताजी ने इस्त्री करके कपड़े तैयार कर दिए, कोई विशेष बात नहीं—- फिर भी— अपने काम स्वयं करने का संस्कार, सीख क्या पालक को महत्वपूर्ण नहीं लगता? क्या यह आवश्यक नहीं? विद्यालय जाने के ऐन वक्त पर ऐसा कार्य करना क्या उचित है? यह आदत भविष्य में जीवन में क्या प्रभाव डालेगी? शिक्षा, पहनावा, खानपान के बारे में जागरुक रहने वाले पालक अपने बच्चों को जीवनभर उपयोग में आने वाली आदतों को व्यवहार में लाने हेतु सीख देने में भी जागरुक हैं क्या? घर के छोटे-बड़े कार्यों में बच्चों को सहभागी बनाने का प्रयास करते हैं क्या? यह बात महत्वपूर्ण लगती है अथवा महत्वहीन?
बच्चों को क्या कार्य करने को कहें? और कहें तो किसलिये? क्यों? ऐसी सोच रखने वाले अनेक पालक हैं। वे सोचते हैं कि बच्चों को बड़े होने पर तो यह सब करना ही है। अभी तो वे छोटे बालक हैं! ऐसी उम्र में उन्हें क्या कार्य करने को कहें? यदि कहें और वे कार्य को बिगाड़ दें तो हमें दुगुना श्रम करना पड़ेगा उसे सुधारने में! इससे अच्छा तो स्वयं काम कर लेना बेहतर है!
आजकल बच्चों को बहुत अध्ययन करना पड़ता है। गृहकार्य, ट्यूशन आदि में बच्चे थक जाते हैं। इन सबके पश्चात उनमें कहां से ऊर्जा रहेगी अन्य गृहकार्य करने हेतु? वे अपना अध्ययन ही पूर्ण करें यही अच्छा! हमने बचपन में बहुत कार्य किये, परिश्रम किया, संघर्ष किया, अब बच्चों को वैसा अनुभव न हो! ऐसे अनेक कारणों से पालक अपने बच्चों की अत्यधिक अनावश्यक सावधानी से परवरिश करते हैं और उन्हें अति नाजुक बनाते हैं। सभी कार्य स्वयं ही करते हैं।
पालकों के श्रम को बचाने के लिये बच्चों को गृहकार्य में संलग्न करवाना_ऐसा उद्देश्य बिल्कुल नहीं है। अपितु, समय का सदुपयोग, समय और कार्य का समन्वय, साधना, नियोजन और जीवन कौशल्य का विकास करने का अवसर प्रदान करना, ऐसे अनेक छोटे किन्तु महत्वपूर्ण विषय ‘गृहकार्य’ से सम्बन्ध रखते हैं। यह भी शिक्षा का एक भाग है।
“बच्चे और गृहकार्य” विषय पर अनेक विद्वानों द्वारा वैज्ञानिक पद्धति से अध्ययन किया गया है। सोलबर्ग ने 1990 में स्वीडन के बच्चों का अध्ययन किया। घर पर छोटे मोटे कार्य करने का अनुभव रखने वाले बच्चे अधिक स्वावलम्बी होते हैं, ऐसा पाया गया। इसी प्रकार 1975 में विटिंग के अध्ययन में यह पाया गया कि घर के कार्य में सहभागिता करने वाले बच्चे अधिक जिम्मेदार होते हैं और विशेषकर समाज विरोधी कार्यों में उनका सहभाग न्यूनतम होता है।
बच्चों को गृहकार्य में सहभागी करने के अनेक कारण और लाभ हैं –
बच्चों को किस प्रकार गृहकार्य में सहभागी करवा लेना अथवा कौन सा कार्य उन्हें स्वतंत्र रूप से करने हेतु सौंपना, यह पालकों के कौशल्य पर निर्भर करता है। पालकों को भी यह बात परखने योग्य है कि वे किस प्रकार का कार्य बच्चों से करवा रहे हैं! परखने योग्य बातें है:
“क्या काम बताएं इन बच्चों को?” ये सवाल मन में उठा होगा! उसकी चिंता छोड़िये! शुरू-शुरू में निम्नानुसार कार्य देकर, क्रमांतर से अपने को ही अनेक कार्य समक्ष दिखने लगेंगे:
कार्य करने के लिए ‘कहना’ और वह ‘करवा लेना’, में सातत्य रहना आवश्यक है। केवल एक-दो बार कार्य करवाकर बाद में छोड़ देना उचित नहीं है। इससे आदत नहीं बनती। आदत निर्माण करना ही भावी जीवन के लिए नींव मजबूत करना है।
किसी ने सच कहा है, “मनुष्य बीस-बाईस वर्ष की आयु में नौकरी/व्यवसाय में लग जाता है, तीसवें वर्ष में मरता है और साठवें वर्ष में सेवानिवृत्त हो जाता है।’’ अर्थात्, शुरू के कालखण्ड में वह उत्साहपूर्वक, दिल लगाकर कार्य करता है। तत्पश्चात् धीमी चाल, उत्साह नदारद!
इसलिये बचपन से ही कार्य की ओर विशेष ध्यान देकर, उसके प्रति दृष्टिकोण विशेष ही रखा जाये, तो “कार्य में आनन्द और आनन्द से कार्य” कर पायेंगे।
(लेखक शिक्षाविद् है और विद्या भारती अखिल भारतीय शिक्षा संस्थान के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष है।)
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