– दिलीप बेतकेकर
‘बच्चों की दृष्टि में शाला अर्थात् दुनिया का सुंदरतम स्थान’ होना चाहिए। जिस स्थान पर वे उन्मुक्त रूप से खेलें-कूदें, नाचें-गायें, ऐसा स्वर्ग होना चाहिए। सृजन केन्द्र होना चाहिए। किन्तु अधिकतर विद्यालय कैदखाने समान लगते हैं। क्लेश केन्द्र हो गए हैं। बालवाड़ी भी अच्छी स्थिति में नहीं है। ‘बालवाड़ी’ के बालक अब अपना ‘बाल्य’ खो चुके हैं। उनके निश्छल हास्य के फव्वारे अब नहीं उड़ते। तुतलाती भाषा के ‘बड़बड़ गीत’ अब सुनाई नहीं देते। ‘बालवाड़ी’ में जाने के लिए वे मन से उत्सुक नहीं दिखते। पालकगण जबरन बच्चों को शाला में पहुंचाने का ‘पालक कर्तव्य’ निभाने का कार्य करते हैं। बच्चे रोते हुए, खिंचते हुए, मन में कुढ़न ग्रस्त, टिर-टिर करते हुए शाला जाते हुए दिखते हैं। शाला जाने का कोई आनंद, उत्साह चेहरे पर नहीं दिखता!
भारत की प्राथमिक शालाएं और बालवाड़ियां ‘आनंदनिर्मूल केंद्र’ बन गई हैं। ऐसी अनेक बातें जो बच्चों की दृष्टि से उपयुक्त नहीं अथवा बच्चों को जिनमें बिलकुल ही रुचि नहीं, ऐसी बातें उन्हें सख्ती से, जबरन याद करने को कहा जाता है। रटना पड़ता है। मानसिक क्लेश देने वाले कक्ष हैं। पीठ पर पुस्तकों का गट्ठा, सिर पर गृहकार्य का बोझ लादे हुए झुके हुए, बच्चों को देखकर पत्थर भी पिघल जाये, ऐसी स्थिति निर्माण होती है।
आधुनिक शिक्षा सुधार के नाम पर, योजनाबद्ध रीति से ये कोमल फूल मसल दिए जाते हैं, पढ़ाई में रगड़े जाते हैं। इसकी परवाह, चिंता, किसी को नहीं! गंभीरता से कोई देखता नहीं!
बच्चे, जैसे कोई कम्प्यूटर हो, उनके दिमाग में कितनी बातें ठूंसी जा रही हैं! भारतीय बच्चे अपना मस्ती भरा, खिलाड़ी, आनंदी बचपन भूल गए हैं। शाला और घर में सजा के भय से बेचारे बच्चे यंत्रवत् कुछ न समझते हुए, आंकड़े, जानकारी, घटना आदि याद रखने का प्रयास करते रहते हैं। तोते समान रटते हैं।
बच्चों को जो भाषा सरलता से समझ में आए, उसी भाषा में उनका अध्ययन होना उचित है। इस विषय पर सभी शिक्षाविद् भी सहमत हैं परन्तु भारत में अपनाई जाने वाली शिक्षा पद्धति के अनुसार लिपि, बोलना, लिखना तय करते हैं। वास्तव में तो अत्यन्त सरल, मित्रवत् संभाषण से ही बच्चों को बोलना सिखाना चाहिए। दुर्भाग्य से भारत में निर्जीव पुस्तकें, अक्षरों के माध्यम से लिखना सिखाते हैं। परिणामतः बच्चों की समझने की और अभिव्यक्ति की क्षमता समाप्त हो जाती है क्योंकि प्रत्येक भाषा का अपना व्याकरण, वाक्य रचना आदि भिन्न है।
मुंबई महापालिका के बारह विद्यालयों का परीक्षण किया गया। प्रथम कक्षा के 50 प्रतिशत बच्चे पूछे गए आठ अक्षर नहीं पढ़ पाए, 20 प्रतिशत बच्चे एक भी अक्षर पढ़ नहीं पाए। पाठ्यपुस्तक में से ही चयनित पंद्रह आसान शब्द केवल 24 प्रतिशत विद्यार्थी सही पढ़ पाए। 25 प्रतिशत विद्यार्थी एक भी शब्द नहीं पढ़ सके। मात्र 21 प्रतिशत विद्यार्थी स्वयं का नाम सही, ठीक ढंग से लिख सके। एक ही कक्षा में दो वर्ष पढ़कर भी 6 प्रतिशत विद्यार्थी अपना नाम नहीं लिख सके। दादी, गेंद और शाला, इन तीन शब्दों का वाक्यों में प्रयोग करने को कहने पर केवल 10 प्रतिशत विद्यार्थी सफल हुए। शेष को वाक्य बनाकर लिखना नहीं आया और निबन्ध लेखन के ज्ञान की अपेक्षा की जाती है। 40-55 प्रतिशत शालाओं में जोड़ और घटाने की प्रक्रिया की जानकारी होना आवश्यक समझा है।
पहली कक्षा का अध्ययन चार से पांच वर्ष आयु के बच्चों द्वारा पूर्ण कर लिया जाता है। कुछ स्थानों पर दूसरी कक्षा का पाठ्यक्रम बालवाड़ी कक्षा में पढ़ाया जाता है। ये परिपाटी सुस्थापित और प्रगतिशील शालाओं में देखी जा रही है।
आर्थिक लाभ हेतु उच्च स्तरीय विशेष कक्षाएं लगाने की स्पर्धा आजकल छोटी और मध्यम स्तरीय शालाओं में दिखाई देती है। परिणामतः बच्चों पर पढ़ाई का बोझ और ‘ट्यूशन’ से पढ़ाई अपरिहार्य माना जाता है। पालक गण भी इस हेतु समय देते हैं। परन्तु दुर्भाग्यवश ये समय देना अर्थात् बच्चों पर चिल्लाना, उनको मारना-पीटना होता है। परिणामतः इसका विपरीत प्रभाव बच्चों के मन पर होता है। उनका आत्मविश्वास नष्ट होता है। ये चिल्लाना, मारपीट आदि का परिणाम पालकों के व्यक्तित्व पर भी होता है और पालक और पाल्य के सम्बन्ध बिगड़ जाते हैं। पालक और शिक्षकों की असहिष्णु और उतावली प्रवृत्ति के कारण भरपाई न होने वाला बच्चों का नुकसान कर रहे हैं। समय रहते इस पर अंकुश लगाकर सही मार्ग नहीं तलाशे गए तो अधिक दुष्परिणाम भोगने पड़ेंगे।
दुनिया के सभी प्रख्यात शिक्षाविदों के मतानुसार कोमल आयु के बच्चों के दिमाग में अनावश्यक रूप से जानकारी ज्ञान ठूंसने का प्रयास करना और पढ़ाई के अनावश्यक दबाव के कारण बच्चों की पढ़ाई की स्वाभाविक इच्छा नष्ट हो जाती है। अति छोटी आयु के बच्चों को पढ़ाई करवाने से बच्चा अधिक ज्ञानवान बनेगा, यह धारणा गलत है। इसके विपरीत परिणाम पाल्य और पालक दोनों को ही भोगने पड़ेंगे। परन्तु अति महत्वाकांक्षी, विशेषकर आज के युवा पालक, अपने बच्चे महाविद्वान, ज्ञानी बनें, इस कल्पना से दबे हुए लगते हैं।
शाला में प्रवेश दिलवाने हेतु होने वाली प्रवेश परीक्षा के लिए अथवा साक्षात्कार के लिए पालक बच्चे को अनावश्यक दबाव डालकर पढ़ाई करवाते हैं परन्तु इस तैयारी के बावजूद उसे तथाकथित प्रतिष्ठित शाला में प्रवेश नकारा जाता है। तब इन छोटे बच्चों को ‘नकार’ का पहला झटका लगता है। बच्चे का जीवन अपयश से शुरू होता है। उसके कोमल बालमन पर क्या प्रभाव पड़ता होगा, इसका विचार कोई करता है क्या? बच्चे की हिम्मत, साहस, आशाएं, उत्साह सभी पर पानी फिर जाता है। हमें नकारा गया, अपयश मिला, इसका गहराई तक प्रभाव उस पर पड़ता है।
असंख्य शिक्षाविद्, मुख्याध्यापक, शिशु रोग विशेषज्ञ, बाल विकास तज्ञ आदि ने मत व्यक्त किया है कि प्राथमिक अथवा पूर्व प्राथमिक शालाओं में प्रवेश हेतु किसी भी प्रकार की प्रवेश परीक्षा अथवा साक्षात्कार लेना उचित नहीं है। पांच वर्ष आयु के पूर्व वाचन, लिखने का कार्य, अंक ज्ञान जैसी औपचारिक शिक्षा नहीं अपनाई जाए।
बड़े शहरों में बड़े-बड़े विद्यालयों में अपने बच्चों को प्रवेश दिलाने हेतु जो नाहक परेशान होते हैं, उन पालकों पर तरस आता है। मुंबई, दिल्ली जैसे बड़े शहरों की फैशनेबुल शालाओं में प्रवेश दिलवाने के लिए अपने दो-तीन वर्षीय बालक के दिमाग में जानकारी ठूंसकर भरते नजर आते हैं जिससे बच्चा साक्षात्कार में सफल हो सके। वास्तव में, इस दृष्टि से उचित उम्र नहीं होती बच्चों की! इन विद्यालयों में प्रवेश हेतु बच्चों से सख्ती से तैयारी करवाई जाती है। स्पर्धा में सफलता प्राप्त करवाने हेतु उसे गृहकार्य और पुस्तकों का भार सिर पर लादा जाता है। इस सभी प्रकार की सख्ती और अनैसर्गिक प्रयासों का विपरीत असर बच्चों के स्वास्थ्य पर पड़ता है।
‘इंडियन अकेडमी ऑफ़ पेडेट्रीसीयन’ संस्था द्वारा किए गए सर्वेक्षण में अनेक धक्का देने वाली और कष्टदायी बातें सामने आईं। बिस्तर में पेशाब करना, दांत भींचना, तोड़पफोड़, चिड़चिड़ापन जैसी बीमारियां 20 प्रतिशत बच्चों में पाई जाती हैं। अधिकांश विद्यार्थियों की आनंदी प्रवत्ति लुप्त होकर वे गंभीर हो जाते हैं। खिलाड़ी प्रवृत्ति गांभीर्य में बदल जाती है। अनुचित दबाव से बच्चों के वजन में कमी आती है। बच्चों पर भय का वातावरण हावी रहता है। शाला प्रवेश स्पर्धा के कारण ‘एनोरॅक्सिया’ (भूख न लगना) बीमारी से ग्रस्त बच्चों की संख्या में वृद्धि हो रही है।
पूर्व प्राथमिक शालाओं का समय और शाला की घर से दूरी के कारण बच्चे को प्रातः जल्दी उठना पड़ता है। इस कारण इस उम्र के लिए आवश्यक नींद बच्चे नहीं ले पाते और लगभग 80 प्रतिशत बच्चों को प्रातःकालीन नित्यकर्म हेतु पर्याप्त समय नहीं मिलता ऐसा निष्कर्ष गंगाराम और बी.एल. कपूर अस्पताल के शिशु रोग विशेषज्ञ डॉ.ए.के. गुलाटी द्वारा प्रस्तुत किया गया है। शाला जाने हेतु बस अथवा अन्य वाहन छूट जाएगा, इस डर से चार वर्ष आयु समूह के बच्चे (लगभग 20 प्रतिशत) प्रातःकालीन नाश्ता तक ठीक से नहीं कर पाते हैं।
प्रख्यात और नामीगिरामी शाला में प्रवेश प्राप्त करने हेतु कौन सी आवश्यक बातों की पूर्ति करनी पड़ती है, इस सम्बन्ध में भी एक सर्वेक्षण किया गया। ऐसे सभी विद्यालयों की अपेक्षा है कि पहली कक्षा में प्रवेश लेने वाले विद्यार्थी को अंग्रेजी के सभी अक्षर लिखने व पढ़ने आना चाहिए, हिन्दी के भी सभी अक्षर जानने चाहिए। 90 प्रतिशत शालाओं की अपेक्षानुसार बच्चों को अंग्रेजी डिक्टेशन आना चाहिए। 5 प्रतिशत शाला में बच्चों को हिन्दी व्याकरण का ज्ञान। दूसरी ओर, खेल, गीत जैसे उपक्रमों को अपनाएं, शाला के नजदीकी क्षेत्र के बच्चों को प्रवेश देना उचित है, लम्बी दूरी से बच्चों को शाला न आना पड़े, ऐसा शिक्षाविद् कहते हैं।
पूर्व माध्यमिक स्तर पर पाठ्यक्रमों द्वारा उभरने वाली खतरनाक स्थिति की ओर इशारा करते हुए प्राथमिक शिक्षा के विषय में शाला और पालकों के दृष्टिकोण में परिवर्तन लाने के उद्देश्य से ‘दि नैशनल प्रोग्रेसिव स्कूल्स एसोसिएशन’ संस्था द्वारा एक जागृति अभियान शुरू करने का मन बनाया है। वर्तमान की निराशाजनक, विफलताजनक स्थिति को बदलकर आशा का उषःकाल बच्चों के जीवन में चैतन्यदायी, आह्लाददायी शिक्षा का प्रवेश होगा, ऐसी अपेक्षा रखें!
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(लेखक शिक्षाविद, स्वतंत्र लेखक, चिन्तक व विचारक है।)