नवरात्र और भारतीय ज्ञान परंपरा-१

॥ ॐ नमश्चण्डिकायै ॥

शारदेय नवरात्र के प्रथम दिवस पर सभी आदरणीय, स्नेहीश्री ज्ञानसाधकों तथा विद्या अनुरागियों को सादर प्रणाम।

ॐ ज्ञानिनामपि चेतांसि, देवी भगवती हि सा।
बलादाकृष्य मोहाय महामाया प्रयच्छति॥

श्री दुर्गा सप्तशती के प्रथम अध्याय के 55वें श्लोक में वर्णन है कि श्रीहरिविष्णु की योगनिद्रारूपा भगवती ज्ञानियों के भी चित्त को बलपूर्वक आकर्षित कर मोह में डाल देती हैं, इसीलिए वे महामाया कही जाती हैं। सप्तश्लोकी दुर्गापाठ के प्रथम श्लोक के रूप में भी इसी का पारायण किया जाता है।

ज्ञानियों के चित्त को मोहित करना कैसे संभव है? हिंदू तत्त्वचिंतन में जीव और ब्रह्म के लौकिक भेद को मिथ्या और अज्ञानजनित कहा गया है। ब्रह्म के वास्तविक स्वरूप को जानने तथा उसे स्वयं में अंतर्भूत करने की सामर्थ्य पाने के लिए अंतःकरण की शुद्धि आवश्यक है। वास्तव में, ब्रह्म – जीव – जगत की इस त्रिपुटी के तात्विक संबंध के परिज्ञान का नाम ही विद्या है। यही वास्तविक ज्ञान है, जिसकी अनुभूति इंद्रियजनित बाह्य ज्ञान से संभव नहीं। यह केवल साधना के माध्यम से किए गए ‘चित्तवृत्ति निरोध’ से ही संभव है।

शुक रहस्य (३/१३) में कहा गया है –

श्रवणं तु गुरो: पूर्वम्,
मननं तदनन्तरम्।
निदिध्यासनमित्येत्,
पूर्णम् बोधस्यकारणम्॥

अर्थात सुयोग्य गुरु के उपदेश का श्रवण, मनन तथा निदिध्यासन द्वारा आत्मानुभूतिजन्य ज्ञान दीप को प्रदीप्त कर , नित्यबोधमय निज स्वरूप में प्रतिष्ठित होकर, सर्वत्र सच्चिदानंद परमात्मा की उपस्थिति की अनुभूति करता हुआ साधक जीवन्मुक्त होकर परमब्रह्म की चिन्मय सत्ता में प्रवेश कर जाता है।

(बृहदारण्यक उपनिषद् ४/४/६)

यही जीवन का परम लक्ष्य है, शिक्षा का उद्देश्य है और विद्या का वास्तविक तात्पर्य है। यह लौकिक नहीं, अध्यात्म विद्या है।श्रीमद् भगवद्गीता में स्वयं श्रीकृष्ण उद्घोष करते हैं – ” अध्यात्मविद्या विद्यानां वादं प्रवदतामहम्।” अर्थात मैं विद्याओं में अध्यात्म विद्या अर्थात ब्रह्म विद्या तथा वादों (विचार पद्धति) में तत्व निर्णय के लिए उपयोग किया जाने वाला वाद हूँ।

भारतीय जीवन दर्शन में पुरुषार्थ चतुष्टय को जीवन का लक्ष्य कहा गया है, अर्थात धर्म का आचरण करते हुए अर्जित अर्थ द्वारा वैध कामनाओं की पूर्ति करना, यही वांछित कर्म है, जो अंततः मोक्ष के मार्ग में सहायक होता है । यह कर्म जीवन को जगत के बंधनों में बांधने के लिए नहीं, बल्कि विमुक्त करने के लिए है । इसीलिए विष्णु पुराण में विद्या का लक्ष्य कहा गया –

“तत्कर्म यन्न बंधाय सा विद्या या विमुक्तये “

मां भगवती हमें इस मार्ग पर सतत चलने की सामर्थ्य प्रदान करें, यही प्रार्थना।

– अवनीश भटनागर

(लेखक विद्या भारती में अखिल भारतीय उपाध्यक्ष है।)

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