सा विद्या या विमुक्तये
– वासुदेव प्रजापति
अब तक हमने अंगांगी भाव को विभिन्न आयामों में समझा है। आज हम अंग और अंगी के सम्बन्ध में आवश्यक अनिवार्यताओं को जानेंगे। जैसे माता-पिता व पुत्र के सम्बन्धों को परिभाषित करना हो तो हम कहेंगे कि पुत्र को सदैव माता-पिता के अधीन रहना चाहिए। उसे माता-पिता का अविरोधी होना चाहिए। पुत्र की सभी आवश्यकताओं की पूर्ति माता-पिता को करनी चाहिए। पुत्र से सम्बन्धित सभी प्रश्नों के उत्तर माता-पिता के पास होने चाहिए। और माता-पिता से ही पुत्र को मान्यता मिलनी चाहिए। यदि पुत्र का समर्थन माता-पिता नहीं करते तो वह परिवार के लिए त्याज्य होता है। ठीक यही बातें अंग व अंगी के सम्बन्ध में लागू होती है।
शास्त्रों की अन्तर्भूत प्रमाण व्यवस्था
सूत्र कहता है कि अंग को अंगी का समर्थन होना चाहिए। जैसे- धर्म शास्त्र को अध्यात्म शास्त्र का समर्थन चाहिए। समाजशास्त्र को धर्मशास्त्र का समर्थन चाहिए। अर्थशास्त्र को समाजशास्त्र का समर्थन चाहिए। आहारशास्त्र को आरोग्य शास्त्र का समर्थन चाहिए। इसी प्रकार भौतिक विज्ञानों को प्राणिक विज्ञान का समर्थन चाहिए। प्राण विज्ञान को मनोविज्ञान का समर्थन चाहिए। और मनोविज्ञान को पुनः अध्यात्म शास्त्र का समर्थन चाहिए।
इसी प्रकार निर्माण के सभी शास्त्रों को रचना के शास्त्रों का समर्थन चाहिए। रचना के सभी शास्त्रों को व्यवस्था शास्त्रों का समर्थन चाहिए। व्यवस्था के शास्त्रों को व्यवहार शास्त्रों का समर्थन चाहिए। व्यवहार शास्त्रों को तात्त्विक शास्त्रों का समर्थन चाहिए और तात्त्विक शास्त्रों को अनुभूति के शास्त्रों का समर्थन होना चाहिए।
इस प्रकार सभी शास्त्रों की यह अन्तर्भूत प्रमाण व्यवस्था है। हमारे आध्यात्मिक शास्त्रों के वचन इसकी पुष्टि करते हैं –
१. धर्माविरुद्धो भूतेषु कामोऽस्मि भरतर्षभ।। गीता।। अर्थात सभी प्राणियों में धर्म के अविरोधी काम मैं हूँ।
२. अर्थशास्त्रात् तु बलवत् धर्मशास्त्रम् इति स्मृत:। अर्थात अर्थशास्त्र से धर्मशास्त्र बलवान है।
अर्थात् अंग से अंगी सदैव बलवान होता है और अंग हमेशा अंगी का अविरोधी होता है।
क्या वैज्ञानिकता अन्तिम निकष है?
यह प्रश्न अनेक लोगों को भ्रमित करता है। इसलिए इसे समझने की आवश्यकता है। प्रकृति परमात्मा निर्मित रचना है, जबकि संस्कृति मनुष्य निर्मित रचना है। प्रकृति व संस्कृति इन दोनों से सम्बन्धित शास्त्र, प्राकृतिक शास्त्र तथा सांस्कृतिक शास्त्र हैं। इन दोनों शास्त्रों में भी क्या अंगांगी सम्बन्ध है? यदि सम्बन्ध है तो कौन अंग है और कौन अंगी है? पहले इसे समझते हैं। मनुष्य परमात्मा की सर्वश्रेष्ठ कृति है। इस नाते वह भी प्राकृतिक रचना का एक अंग है। इस आधार पर प्राकृतिक शास्त्र अंगी और सांस्कृतिक शास्त्र उसके अंग होने चाहिए। आज प्राकृतिक शास्त्रों को विज्ञान कहा जाता है। इसलिए अधिकांश लोग वैज्ञानिकता को ही अन्तिम निकष मानने लगे हैं। किन्तु यह समीकरण इतना सरल नहीं है, जितना प्रथम दृष्ट्या दिखाई देता है। इसे हम अधोलिखित आयामों में समझने का प्रयत्न करेंगे।
१. मनुष्य के अतिरिक्त सम्पूर्ण सृष्टि, चाहे वह प्राणी हो, वनस्पति हो और पंचमहाभूत हों सभी प्रकृति के नियमन और नियंत्रण में रहते हैं। वे अपनी स्थिति में या अन्यों की स्थिति में कोई परिवर्तन नहीं कर सकते। इनकी रचना को समझना और इनका संरक्षण करना, यह मनुष्य का दायित्व है। मनुष्य को यह दायित्व निभाने की समझ सांस्कृतिक शास्त्रों से मिलती है। जबकि प्रकृति को प्राकृतिक शास्त्रों से जाना जाता है।
२. प्रकृति को जानने वाला मनुष्य है। मनुष्य को प्रकृति के साथ कैसा व्यवहार करना चाहिए, यह उसे धर्मशास्त्र और उसके अन्तर्गत आने वाला नीति शास्त्र सिखाता है।
३. समस्त सृष्टि अन्नमय और प्राणमय कोश में अवस्थित है, जबकि मनुष्य अन्नमय और प्राणमय कोश से ऊपर उठकर मनोमय, विज्ञानमय और आनन्दमय कोश में अवस्थित होता है। मनुष्य को इन सब कोशों के आवरण से मुक्त होकर अपने ‘स्व’ स्वरूप का बोध करना है, जो विज्ञान के क्षेत्र से परे का विषय है, उससे ऊपर का विषय है।
४. इसका अर्थ यह है कि मनुष्य जगत के अन्नमय और प्राणमय कोश के जो विषय हैं, उनके निकष तो प्राकृतिक विज्ञान हैं, किन्तु मनोमय, विज्ञानमय और आनन्दमय कोश से सम्बन्धित विषयों के अन्तिम निकष तो सांस्कृतिक शास्त्र ही हैं।
५. इस आधार पर आज की वैज्ञानिकता एक सीमित स्वरूप में ही निकष बन सकती है। जबकि मनुष्य के लिए सृष्टि धारणा और समाज धारणा दोनों से सम्बन्धित व्यवहार अपेक्षित है। अतः व्यक्तिगत और समाजगत श्रेय व प्रेय की प्राप्ति उसका लक्ष्य है। इसलिए विज्ञान अन्तिम निकष नहीं हो सकता, अन्तिम निकष तो अध्यात्म ही है।
वर्तमान शिक्षा का विचार
वर्तमान शिक्षा प्रणाली में घोर अनवस्था फैली हुई है। इस अनवस्था के प्रमुख कारण अधोलिखित हैं –
ज्ञानेश्वरी की एक आवी का अर्थ
यह संस्मरण महाराष्ट्र के एक विनोदी साहित्यकार का है। उनका नाम है, पु.ल.देशपांड़े। उन्हें एक महाविद्यालय ने अपने विद्यार्थियों को उद्बोधन देने हेतु बुलाया। वे गए, उन्होंने कालेज विद्यार्थियों को बड़ा ही विनोदी और प्रेरक उद्बोधन दिया। वे अपना उद्बोधन पूरा करके सभागार से बाहर आए ही थे कि एक कालेज विद्यार्थी भागा-भागा उनके पास आया। उसने पूछा, सर आप मुझे एक आवी का अर्थ बतायेंगे ? (ज्ञानेश्वरी के श्लोक को मराठी में आवी कहते हैं) पु.ल.देशपांड़े कहते हैं कि मैं मन ही मन बहुत प्रसन्न हुआ कि आज के इस आधुनिक युग में एक कॉलेज विद्यार्थी आवी का अर्थ जानना चाहता है। इसका अपने धार्मिक ग्रंथों में इतना अधिक भक्ति भाव है! तब तो देश का भविष्य निश्चय ही उज्जवल है।
मैंने उस कॉलेज विद्यार्थी से पूछा, तुम ज्ञानेश्वर महाराज के भक्त हो? उसने कहा, नहीं। क्या तुमने ज्ञानेश्वरी पढ़ी है? उसने फिर कहा, नहीं। तब मुझे आश्चर्य हुआ कि यह न तो ज्ञानेश्वर महाराज को जानता है और न इसने ज्ञानेश्वरी ही पढ़ी है, फिर यह आवी का अर्थ क्यों जानना चाहता है? इसलिए मैंने उससे पूछ ही लिया कि तुम आवी का अर्थ क्यों जानना चाहते हो? वह बोला, सर! मुझे मालूम हुआ है कि इस बार परीक्षा में एक प्रश्न आवी पर हण्ड्रेड पर्सेंट आएगा। तब मैंने जिज्ञासावश पूछा, कितने अंक का प्रश्न आयेगा? उसने बताया, दो मार्क्स का तो होगा ही। मैंने मन ही मन सोचा कि जब ज्ञानेश्वरी ही दो मार्क्स की है तो अन्य ग्रन्थों का स्थान कहाँ होगा?
इस संस्मरण से यह ध्यान में आता है कि वर्तमान शिक्षा प्रणाली में अध्यात्म और धर्म पूरी तरह से उपेक्षित हैं। यही आज के शिक्षा जगत की गंभीर समस्या है। इस समस्या का समाधान हम उपर्युक्त मूलभूत कारणों को दूर कर निश्चित ही सकते हैं।
(लेखक शिक्षाविद् है, भारतीय शिक्षा ग्रन्थमाला के सह संपादक है और विद्या भारती संस्कृति शिक्षा संस्थान के सह सचिव है।)
और पढ़ें : भारतीय शिक्षा – ज्ञान की बात 52 (विषयों में परस्पर सम्बन्ध)
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