– किसलय पंचोली

आज सांगली गांव की पुरखन श्यामा बाई चौधरी को जरा फुर्सत नहीं है। भला हो भी कैसे? वे पूरे गांव में, मतलब जहां प्रधानमंत्री सड़क योजना की पतली सड़क, कीकर के दो जुड़वां पेड़ों तले, सुतारी मोहल्ले आ सांस लेती है, से दूर दूसरे छोर पर बसी हरिजन बस्ती पारकर सांस छोड़ती है, वहां तलक उन्हें एक सुर में स्यामा काकी पुकारा जाता है। कौन स्यामा काकी? वही तीज वाली स्यामा काकी! वे साल-दर-साल राखी के तुरंत बाद आने वाली, भादो मास की कृष्ण पक्ष की तृतीया के दिन सातुड़ी तीज की पूजा जो करवाती हैं। और चांद निकलने पर उसकी कथा वार्ता भी सुनाती हैं।
वही सातुड़ी तीज, जिसे नीमड़ी तीज, कजरी तीज या बड़ी तीज भी कहा जाता है। इसके महती पूजन के लिए शाम घिरते ही गांव के बम्मन और माहेश्वरी समाज की, तीज का व्रत रखने वाली, सभी बहू बेटियां यानि तत्संबंधित परिवारों की तमाम महिलाएं एक-एक कर उनके घर इकठ्ठा होने लगी हैं। यह कोई छोटी नहीं, बहुत बड़ी जिम्मेदारी है। और जिम्मेदारी से भी बढ़कर सम्मान की बात है। मानदार जिम्मेदारी का भाव उनसे सब काम करवा ले रहा है।
आज सुबह से ही श्यामा काकी काम के चलते अपने घुटनों का दर्द पूरी तरह भुला बैठी हैं। अन्यथा ‘ओ बाई म्हारा गोडा भोत दुखे हो’ कहते-कहते ही उनका हर दिन बीतता है। आज वे जब मुंह अंधेरे नहाने के तुरंत बाद, अल सुबह ही दीवाल पर नीमड़ी माता मांडने चलीं तो उनके पति काका साहब ने कहा ‘इना साल माता कोई सुहागन मांड दे तो अच्छो। तू थकी जाएगी।’ पर यह खासम-खास काम उन्होंने अभी तक किसी को नहीं दिया है। सो खुद ने ही माता उकेरी। हालांकि उन्हें लगा उम्र के साथ उनके हाथ अब कुछ कांपने लगे थे सो माता कुछ अजीब-सी बन गई। पर उनमें उसे दुरुस्त करने की हिम्म्मत नहीं बची। उकडू बैठ कर माता मांडने में कमर जो जवाब दे गई। उन्होंने जैसी बनी उसी में तसल्ली कर ली। ‘हो अच्छी मंडी हे। हंसमुख मुंडा वाली म्हारी कजरी माता।’
कमर सीधी कर उन्होंने जेठानी की बहू क्षमता की मदद से और जरूरी तैयारियां कर लीं। मसलन हलवाइयों के काम वाली, बाहर से टोचेदार और अंदर से कलाई की हुई, पीतल की बड़ी-सी परात राख से मंजवा, चमकवा दी। उसके आधे हिस्से में बारीक छनी हुई भीगी काली मिट्टी थिपवा दी। और बचे आधे हिस्से में कच्चा दूध और शुद्ध जल भरवाकर तलैया बनवा दी। थेपी हुई मिट्टी में नीम की एक डगाल भी अच्छे से दबाकर खुंसवा दी। ताकि पूजा के समय वह गिर न पड़े। पीतल का दीपक पीतांबरी से रगड़वाकर झकास साफ कर जलवा दिया। चमचमाते तांबे के लोटे में पानी भरकर रख लिया। एक धामें में पूजा उपरांत प्रसाद में बंटने वाले बताशे भी सहेज लिए कि ‘आखिरी आज हेला नी पाड़णो पड़े’। पूजा के लिए इस हिदायत के साथ के ‘तोड़ता बखत सुंघनो नी हे’, गेंदे और गुड़हल के फूल चुनवा और गीले टाट में लिपटवा के धर लिए।
धीरे-धीरे पूजा स्थल के आस-पास, सिर पर पल्ला संभालती-न-संभालती स्त्रियां, आ-आकर बैठने लगीं।
अपनी-अपनी जान और समझ-बूझ अनुसार गोटा किनारी की साड़ी या लुगड़े में सजी-संवरी विभिन्न वय स्त्रियां। धीरे-धीरे डोलती वृद्धाएं। थुलथुल अधेड़ औरतें। यौवन से जाने-अनजाने अनभिज्ञयता दिखातीं युवा स्त्रियां। सुंदर कमसिन तरुणियां और कलियों-सी खिलती किशोरियां सभी। अभिवादनों का आदान-प्रदान होने लगा। ‘वा कसी हे तू?’ ‘कई दिना में दिखी हो’। श्यामा ने सभी का हँस-हँसकर स्वागत किया। सोचा कितरा ई ऑइल पेंट की निसानी पैंदा में पाड़ि दो। गिलास उन तो अदली बदली जाए ही। ने फेर इतनी ओरतां वास्ते पुराए थोड़ी। सो उन्होंने क्षमता को स्टील के दो तीन प्रकार के गिलासों में पानी पिलवा देना इसकी अनुमति दे दी और कांच के गिलास न निकालने की ताकीद भी।
सब को जहां जगह मिली वहां बैठ जाने के बाद श्यामा ने माता की विधि-विधान अनुसार पूजा शुरू की। सबसे पहले जल के छींटे दे माता को प्रतीकात्मक स्नान करवाया। सामान्य पूजा-सामग्री जैसे कंकू, चावल और इस पूजा के लिए अनिवार्य पूजा-सामग्री जैसे सत्तू, नाड़ा, ककड़ी आदि से पूजा की गई। परात में बनी तलैया के किनारे इस तरह दीपक जलाया कि उसकी परछाई तलई में दिखे।
फिर श्यामा ने सभी को परात की तलई के धुंधले दुधिया पानी में समीप कुछ उंचाई पर एक तसलेनुमा बर्तन में ऊपर तक भरे सत्तू के लड्डूओं की परछाईं देखने को कहा। बारी-बारी से सभी औरतों द्वारा परछाइयां बाकायदा देखी दिखाई गईं। दीपक के मद्धिम प्रकाश में कोण बदल-बदलकर, झुक-झुकाकर ‘हां दिख री हे।’ ‘म्हारे बी दिखी गी।’ ‘हो दनाक दिनी से दिख गई।’ आदि कहा गया। किसी ने यह नहीं कहा कि ‘काकी, म्हारे नी दिखी परछाईं।’ कोई कहती भी कैसे? उसकी भद्द न उड़ जाती? वह हँसी की पात्र बन जाती। ऐसा माना जाता है कि ‘जिसे जितनी साफ परछाई दिखे, उसका सुहाग उतनी लंबी उम्र पाए।’ सबने देखा-देखी में ‘हां’- ‘हां’ भर दी। कोई अपने पति की उम्र कम थोड़ी चाहेगी!
इसके बाद श्यामा ने सभी व्रतधारी महिलाओं से गोबर से लिपी और फिर चूने से पुती सूखी दीवाल पर अनामिका उंगली से गीले कंकू, हल्दी, मेहंदी, और काजल की 16,16 टिपकियां लगवाईं। दीवाल के उस हिस्से में क्रमशः लाल, पीले, हरे और काले रंगों की बुंदकियों का कोलाज-सा रच गया। रंग और उनका क्रम बेहतरीन संयोजन बना रहा था। यह अलग बात है कि किसी की बुंदकियों की साइज छोटी थी। किसी की बुंदकियों के बीच की दूरी कम ज्यादा थी। किसी की पंक्तियां सीधान में थीं। किसी की तिरछी जा रही थीं। किसी ने हौले से हल्की बुंदकी लगाई। किसी ने जोर से दबाकर गाढ़ी नीचे लरकती। हां, पर आस्था के घोलक की सांद्रता सबकी बुंदकियों में एक-सी भरपूर थी।
चांद निकलने पर श्यामा कथा सुनाने जा ही रही थी कि शहर में रहने और नौकरी करने वाली, पीठ पर पिठू बैग टांगे, लगभग भागते हुए भतीजी पुष्पा का आना हुआ। उसने आते ही नाराजगी से कहा- ‘सामू काकी, फोन किया था न मैं आ रही हूं। क्या थोड़ा रुक नी सकती थी? पूरे 10 साल बाद मैं सातुड़ी तीज पर मायके आई हूं और मेरे आए बिना आपने पूजा शुरू करवा दी।’
‘अब बेटी, ये सब जनी खोटी हो रई थीं। क्या करती? तू भी आ जा। आज काले पूजा ने वारता के लिए दो दफे कोई नि आए। एक ही बारी आए हे सब जनी। पहले तू जल्दी से पूजा कर ले। टिपकी दे दे। ने परछाई देख ले। फिर ही वारता सुनाउंगी। बस सुरु करने वाली थी अभी।’ काकी ने कहा।
पुष्पा ने फटाफट सब कुछ कर लिया और सब तरफ नजरें दौड़ा फिर पूछने लगी- ‘पहले मुझे यह बताओ… काकी, अपने यहां सातुड़ी तीज पर खड़े नीम की पूजा होती थी। और अब यह खाली माली डगाल क्यों पूजा में रखी है? नीम का वह लहलहाता पेड़ कहां गया?’
‘अरे बिटिया, उसे पिछले साल ही काटना पड़ा।’ काकी ने पल्ला ठीक करते हुए भारी उदास और रुंधे स्वर में उत्तर दिया।
‘क्या? हरा भरा इतना पुराना पेड़ काट दिया? और आपने काकी कटने दिया? मैं पूछती हूँ क्यों?’
‘उसके होने से कितनी ठंडी हवा रहती थी।’ उस पर चिड़ियाएं चहकती थीं। गिलहरियां फुदकती थीं। उसके हरे कच्च पत्ते कितनी खूबसूरती से सरसराते थे। हम उसकी मोटी-मोटी शाखाओं पर डले रस्सी वाले झूले झूलते थे। ऊंची-ऊंची पींगे भरते थे। उसके नीचे खटिया बिछा बाबा सुस्ताते थे। आप ही ने बताया था पीढ़ियों से सातुड़ी तीज पर उसे ही पूजा जाता रहा है। फिर कटवाने का पाप क्यों सिर लिया? पुष्पा ने नीम के पेड़ से जुड़ी यादों, बातों का जीवंत चित्र खींचते हुए काकी को आड़े हाथों लिया।
‘मैं एकली करती तो कई करती? काका को एक बड़ा कमरा और निकालना था बेटी। भंडार छोटो पड़तो थो। काम चला तो किराए की एक खोली भी निकाल दी। चार पइसा मिल जाएगा। और जगह कहां थी कि कमरा बन सके।’ काकी ने अपनी असहाय स्थिति बयां कर दी।
‘काकी, मुझे यह पूजा, पूजा ही नहीं लग रही। बाहर नीम के पेड़ की पूजा, पूजा लगती थी।’ पुष्पा ने रुंआसे स्वर से कहा।
‘सच्ची छोरी तूने की तो म्हारा दिल की वात है। यह पूजा खाली माली पूजा को ढोंग लगे हे। पूजा इसी घर में होना थी। सो यो रास्तो निकालयो के खड़ा नीम नौ तो उकी डगाल ही पूज लां। पीढ़ियां हुई गी इना घर सेज सगला गांव की तीज पुजाए।’ भी पूजा जिसकी परंपरा चली आ रही हो, कभी-ना-कभी, किसी-न-किसी इंसान ने ही तो शुरू की होगी ना?’ ‘हां, या बात तो हे।’
उसने काकी को कुछ सलाह दी। जिसे सुन उन्होंने खुश से हां में गर्दन हिलाई। और कहने लगीं ‘हो म्हारे कई दिक्कत नी। ऐसो के दूंगी।’ और बाहर आकर अपनी चिर परिचित शैली में लगी कथा सुनाने।
‘मुं कथा सुनाऊं नीमड़ी माता री। बरोबर हुंकारों भर जो सब जनी हां।’ ‘हां, काकी सुनाओ तम। हम भरांगा हुंकारा।’ ‘नई वारता सुनाऊं इना साल। पार साल से फरक। ध्यान से सुन जो हो छोरी हुन।’
‘हूं काकी।’ ‘एक गांव-मा सातुड़ी तीज रो त्योहार आयो।’
‘हूं..।’
‘उना दिन नीमड़ी माता री पूजा होनी थी।’
‘भरो हुंकारों। इतनी जनी बठी हो… ने मने लोटो टन टनानो पड़ी रियो हे।’
‘हूं..हां।’
‘फेर सुरु से सुनाऊं। एक बार की वात है। आपनो सांगली गांव जैसो एक चोखो गांव थो। उना गांव में सातुड़ी तीज को त्यौहार आयो।’
‘हूं..।’
‘वां एक बामणी का घर मा नीम को पेड़ होतो थो। पूजा होती थी। एक साल उ नीम को पेड़ कटी गयो। कोई बूढ़ी डोकरी ने रस्तो सुझायो के ‘नीम को पेड़ नी। वा जद। कोई वात नी। दूसरा नीम का पेड़ की डगाल खोंसी ने पूजा करी लो।’ उना साल विपत्ति तो आई पन थोड़ी घणी।’
‘हूं..।’

‘फेर एक साल बित्यो। ने सातुड़ी तीज पड़ी। पुष्पा ने न जाने क्या सोचा। वह काकी को अंदर ओसारे में ले गई। और उनसे कहने लगी- ‘काकी, कोई दुसरो पेड़ भी कटी गयो सो कनी कारण डगाल भी नी वीणा मिली। तो कोई ने कियो ऐसा करो दूसरा गांव से खाली पांच पत्ता ले आओ ने रखी लो। ने पूजा करी लो। अबकी बारी जास्ती आपदा आई।’
‘हूं..।’
‘एक और साल बीती गयो। बामनी के सातुड़ी तीज पेला वाली रात के नीमड़ी माता सपना में आई ने वा उसे केवा लागी – ‘ऐसा है या कथा वारता सुननो, ने हुंकारों भरनो, पूजा पाठ करनो, ने व्रत उपवास रखनो नी रखनो, अपनी जगो जो भी है अच्छी वात है।’
‘हूं..।’
‘हूं…।’
‘के कुंवारी कन्या इके सींचे…?
‘हूं…।’
‘तो सुहागन को सुहाग बन्यो रेवे..’
‘हूं…।’
‘ने कन्या के अच्छो घर वर मिले…’
‘काकी आप भेद-भाव करती हो। मैं पिछले साल ही आपसे कह रही थी नीम का पेड़ कट गया है तो क्यों न हम नीम के रोपों की पूजाकर उन्हे रोप दें। इस बार पुष्पा दीदी ने कहा तो आपने मान लिया। है ना?’ क्षमता ‘पण तू अब की बारी सातुड़ी तीज पर नीमड़ी भाभी तनिक नाराजगी से बोल पड़ी।
माता की कथा में या वात जोड़…’
‘कसी वात काकी?’
‘कई कियो नीमड़ी माता ने?’
‘सवाल नी पूछे। बस हुंकारों भरो जाए कथा मा।’
‘हूं..।’
‘नीमड़ी माता ने कियो के जो सुहागन सातुड़ी तीज का दिन नीम का पौधा रोपे…’
लाज से दोहरी हो गईं। उनके बूढ़े कपोलों पे बला की लाली छा गई। और सब औरतें खिल-खिलाकर हँस पड़ी।
(साभार वीणा पत्रिका)
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