– गोपाल माहेश्वरी

श्याम आज विद्यालय से लौटते हुए बहुत ही उदास था। उसका मन ही नहीं हो रहा था कि वह घर लौटे। वह हनुमान मंदिर के सामने वाले मैदान के किनारे पड़े एक पेड़ के कटे हुए सूखे तने पर बैठ गया। उसकी आँखों के सामने जैसे कोई फिल्म चल रही हो इस तरह अनेक दृश्य तैरने लगे। सामने के मैदान का सूनापन उसकी आँखों में पसरा पड़ा था।
उसे याद आया कि आज कक्षा में उसके कुछ सहपाठी मध्यावकाश में कल रविवार को कहीं घूमने जाने की योजना बना रहे थे। अपने-अपने घरों से बना हुआ भोजन ले जाकर गाँव के तालाब के पास की अमराई में दिनभर खाते-खेलते बिताने की बातें हो रही थीं।
श्याम का भी मन हुआ उनके साथ जा मिले और योजना में सम्मिलित हो जाए। वह सहजभाव से उनकी ओर बढ़ा। बच्चों की पीठ उसकी ओर थी इसलिए वे उसे देख नहीं पा रहे थे। थोड़ा पास पहुँचा तो उल्लास से वह उन्हें पुकारने ही वाला था कि उसे उनकी चर्चा में अपना नाम सुनाई दिया। वह ठिठक गया। कुछ वाक्य सुनते ही उसके पैर मानों जम से गए। चर्चा हो रही थी।
“श्याम नहीं! उसके घर का खाना हम खाएंगे?” एक बोला।
“मुझे तो उसके साथ देख भी लिया तो मेरे घर वाले ठंडे पानी से कपड़ों सहित नहलाए बिना घर में नहीं आने देंगे।” दूसरे ने कहा।
“जानते हो उसके घर मरे हुए पशुओं का चमड़ा निकालने का काम होता था।” कहने वाले ने बनावटी उबकाई लेते हुए कहा।
“लेकिन उसके पिता तो हमारे विद्यालय में ही शिक्षक हैं!” पहले ने कहा।
“उससे क्या पर है तो वही?” तीसरे ने कहा।
श्याम के पिता पिछले सप्ताह ही यहाँ स्थानांतरित होकर आए थे। स्वाभाविक ही था कि श्याम ने भी यहीं प्रवेश ले लिया। यद्यपि यह सही है कि उसके परिवार में पारंपरिक रूप से यह काम होता रहा है लेकिन पिता संघर्षरत रहते हुए खूब परिश्रम से पढ़-लिख कर शिक्षक बन गए तो अब वे पुराने दिन इतिहास बन गए। फिर यह भी तो कड़ुआ सच है कि चमड़े के चप्पल-जूते, बेल्ट-बटुए सबको चाहिए पर उन्हें बनाने वाले पसंद नहीं?
वह पलट गया। संविधान में जातिगत भेदभाव करना अपराध है, लेकिन मन को तो संस्कार बदलते हैं कानून का उस पर बहुत वश नहीं चलता। शिकायत की जा सकती है। कानून सजा तक दे सकता है पर इससे हृदय में बैर ही पनपेगा, घृणा ही गहराएगी। तो क्या यह परिदृश्य कभी न बदलेगा? श्याम सोच रहा था।
वह शोक भरे सोच की गहराइयों में खोया हुआ था कि विद्यालय के प्रधानाचार्य पाठक जी उधर से निकले। उन्होंने अपनी फटफटी रोकी और श्याम के कांधे पर हाथ रखते हुए पूछा “क्यों,श्याम! यहाँ अकेले कैसे बैठे हो?”
श्याम सकपकाया। एकदम खड़े होकर हड़बड़ाते हुए बोला “नहीं कुछ नहीं। बस यों ही बैठा था।”
पाठक जी बड़े अनुभवी प्रधानाचार्य थे, वे ऐसी कुछ नहीं को खूब समझते थे और उपचार भी बहुत अच्छे से जानते थे। बोले “कुछ नहीं कर रहे हो तो मेरे घर तक चलो, तुम्हारे पिताजी को पढ़ने के लिए एक पुस्तक देनी है।”
श्याम क्या कहता? पर माथे पर चंदन का टीका लगाए, सिर पर चोंटी रखने वाले अपने प्रधानाचार्य की फटफटी पर पीछे बैठे अपने उन सहपाठियों के मोहल्ले से गुजरते हुए वह गर्व से भरा हुआ था। सहपाठियों ने उसे देख भी लिया। प्रधानाचार्य जी को नमस्ते कहते हुए वे श्याम को देखकर भौचक्के रह गए थे।
पाठक जी ने घर पहुँचकर श्याम को एक पुस्तक दी ‘सामाजिक समरसता के दो डाक्टर: डाक्टर भीमराव आंबेडकर और डाक्टर केशवराव हेडगेवार ‘।
“यह पुस्तक तुम्हारे पिताजी को दे देना।” फिर बोले “अच्छा तुम भी पढ़ोगे कुछ? लो यह मिठाई खाओ तब तक तुम्हारे लिए भी एक पुस्तक लाता हूँ।”
मिठाई की प्लेट उसके सामने रखते हुए वे पुनः कमरे में अंदर चले गए। श्याम ने डरते हुए संकोच से मिठाई का एक टुकड़ा उठाकर कुतरा ही था कि पाठक जी की आवाज से डरकर उसे फिर प्लेट में रख दिया। पाठक जी अंदर से ही बोले थे “श्याम! अंदर ही चले आओ, मिठाई भी लेते आना।”
श्याम अंदर पहुँचा। वह अनेक पुस्तकों से सजा पाठक जी का अध्ययन कक्ष था। संकेत पाकर श्याम बैठ गया। पाठक जी ने एक टुकड़ा मिठाई उसी की प्लेट से उठाई। श्याम अचरज में पड़ गया। पाठक जी ने दो छोटी-छोटी पुस्तकें दी एक का शीर्षक था ‘बालासाहब देवरस के जीवन प्रसंग’, दूसरी पुस्तक भी प्रेरक प्रसंगों की ही थी। श्याम ने पुस्तकें ले कर अपने बस्ते में रख लीं।
पाठक जी बोले “पढ़कर लौटा देना? किसी और के भी काम आ जाएगी।” उसी समय पाठक जी का बेटा प्रशांत आ गया। वह श्याम से एक कक्षा आगे था।
श्याम को देखकर उसने प्रसन्नता से स्वागत किया। “अरे श्याम! कैसे हो? अभी तो विद्यालय में नयापन लगता होगा? अधिक मित्र भी न बने होंगे?” उसने मिठाई की प्लेट से वही टुकड़ा उठा लिया जिसने श्याम ने थोड़ा सा कुतर कर रख दिया था। मित्र बनने की बात पर श्याम वैसे ही आज की घटना से असहज था कि प्रशांत को वह टुकड़ा मुंह तक ले जाते देख उसने घबराकर उसका हाथ पकड़ लिया “वह नहीं दूसरा टुकड़ा खा लो।”

प्रशांत समझा नहीं पर सहज हास्य करते हुए बोला “क्यों यह तुम खाओगे? खालो।” उसने वह टुकड़ा श्याम के मुंह में डाला और उसी से बचाकर आधा टुकड़ा अपने मुंह में डालते हुए अपना वाक्य पूरा किया “पर अकेले नहीं बांटकर खाएंगे।”
श्याम के लिए यह व्यवहार कल्पनातीत था।
प्रशांत ने पूछा “कल क्या कर रहे हो श्याम?”
“कुछ खास नहीं।” श्याम बोला।
“कल घर में जो भी भोजन बना हो टिफिन में लेकर नौ बजे हनुमान मंदिर के सामने आ जाना चार बजे तक लौटेंगे। घर पर बता देना।”
“क्यों? कहीं जाना है?” श्याम ने पूछा।
प्रशांत हँसा “ यह रहस्य है कल ही पता चलेगा कहाँ जाएंगे?”
प्रशांत की बहिन मुक्ता अंदर से आते हुए बोली “भैया! श्याम नया नया है। बता क्यों नहीं देते कि कल आपकी बाल शाखा का वनसंचार है?”
“शाखा क्या?” श्याम उत्साहित था।
“चलो बताता हूँ।” प्रशांत ने कहा। वे श्याम के घर उसका बस्ता रखते हुए पहुँचे। बिना किसी भेदभाव के पन्द्रह बीस बच्चे हनुमान मंदिर के मैदान में मस्त होकर खेल रहे थे। प्रशांत के बताए अनुसार श्याम ने भगवा ध्वज को ध्वज प्रणाम किया। लेकिन एक घंटे खेलकूद, व्यायाम, गीत, कहानी में रहकर प्रार्थना के समय पुनः ध्वज प्रणाम किया तो उसकी श्रद्धा कई गुना बढ़ चुकी थी। उसे लगा समाज में इतने अच्छे लोग भी हैं जिनके लिए सब बहुत अपने हैं। जिनके मन में भेदभाव की काली छाया का अंश मात्र भी नहीं है। घर लौटते हुए श्याम के रास्ते में समरसता का केसरिया प्रकाश ही प्रकाश फैला हुआ था। उस शाम उसे अपने जीवन में एक नया सूरज ऊगता प्रतीत हो रहा था।
(लेखक इंदौर से प्रकाशित ‘देवपुत्र’ बाल मासिक पत्रिका के संपादक है।)
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