श्रीराम: शरणं मम

 – चेतनानन्द

सेवा तो हो, पर सेवा करने वाला दिखायी न दे, प्रदर्शन न हो, कर्तृत्त्व अभिमान न हो और परिणाम पाने की रंचमात्र भी आकांक्षा न हो, वही निष्काम कर्मयोग है। यही पवन देवता की विशेषता है। उन पवन देवता के पुत्र के रूप में हनुमानजी निष्काम कर्मयोग का प्रचार और प्रसार करते हैं।

हनुमान जी के चरित्र में समस्त वर्ण धर्मों का समुचित समावेश दिखायी देता है। वे चतुर इतने हैं कि वर्ण धर्मों से भी आगे निकल जाते हैं। मनुष्य चार वर्णों में विभाजित है और यही उसकी सीमा भी है, किन्तु जब हनुमान जी ने लक्ष्मण जी के सामने यह प्रस्ताव रखा कि आप दोनों भाई मेरे पीठ पर बैठ जाइए, तो यह हनुमान जी का कौन-सा वर्ण धर्म था? कोई स्वस्थ व्यक्ति किसी के कंधे पर बैठे, यह तो बड़ी अटपटी बात है। फिर एक नहीं, बल्कि दो-दो व्यक्ति एक के कंधे पर सवार हो जाएं, यह तो बड़ा विचित्र प्रस्ताव है। हनुमान जी ने देखा कि प्रभु कंधे पर बैठने में संकोच कर रहे हैं। तब उन्होंने कहा, महाराज! संकोच तो मनुष्य के कंधे पर बैठने में होना चाहिए, पर मैं तो पशु हूँ। घोड़े पर तो आप बैठते ही होंगे, जिस दिन दूल्हा बने, उस दिन आप घोड़े पर बैठे ही थे, इसलिए आप मुझ पर भी बैठना स्वीकार कर लीजिए। पशु को तो इस रूप में सेवा का अधिकार है। मैं मनुष्य नहीं हूँ, मेरी सीमा चार वर्णों तक ही नहीं, उससे भी आगे है। इस तरह से सचमुच यह हनुमान जी के जीवन की परम सार्थकता है कि वे पशु भी बने तो कैसे सुन्दर पशु बने! इससे बढ़कर पशुत्व की सार्थकता भला और क्या होगी? मनुष्य डरता है कि हम पशु न बन जाएं! पशु बनकर न जाने हम किस निकृष्ट योनि में चले जायेंगे। किन्तु हनुमान जी न केवल मनुष्यता के और वर्ण धर्म के साथ ही साथ पशुत्व के माध्यम से भी सेवा का आदर्श प्रस्तुत करते हैं, पशुत्व को भी उदात्त रूप दे देते हैं कि सभी वर्णों की सेवा और यहाँ तक कि पशुत्व के प्रति भी हमारे अन्तःकरण में घृणा का भाव न आने पावे, बल्कि इस भाव का उदय करते हैं कि पशुत्व के द्वारा यदि हमें अधिक सेवा का अवसर मिले, तो वह भी हम सहर्ष स्वीकार करें!

हनुमान जी के चरित्र में समस्त वर्णों का और समस्त आश्रमों का सामंजस्य तो है ही, पर उसके साथ ही साथ समस्त योगों का भी सुन्दर सामंजस्य है। हनुमत् चरित्र के विभिन्न-प्रसंगों में भिन्न-भिन्न योगों की प्रधानता है – कहीं ज्ञानयोग की प्रधानता है, कहीं भक्तियोग की, कहीं कर्मयोग की और कहीं उस चौथे योग की, जिसे ‘मानस’ में दैन्य या शरणागति-योग के रूप में प्रस्तुत किया गया है। इसलिए हनुमान जी का परिचय भी बड़ा अनोखा है। इतना विचित्र परिचय तो शायद किसी का नहीं होगा। हनुमान-चालीसा में आप पढ़ते हैं कि गोस्वामी जी एक ही पंक्ति में एक साथ ही दो परस्पर विरोधी बातें लिखते हैं। एक ओर वे ‘संकर सुवन’ और उसके बाद ही ‘केसरी नन्दन’ भी कहते हैं। वे भगवान शंकर के और केसरी के पुत्र हैं। आगे वे एक नाम और लेते हैं, ‘पवनतनय’। हनुमान जी पवन के पुत्र हैं। उसके बाद जब हनुमान जी लंका से लौटकर आये तो उनके चौथे पिता का भी परिचय मिला। कौन? भगवान श्रीराम हनुमान जी से कहते हैं –

सुनु सुत तोहि उरिन मैं नाहीं।

इस तरह से वे भगवान राम के भी पुत्र हैं। ये उनके चार पिता हैं, क्योंकि उनमें चारों योगों का पूर्ण सामंजस्य दिखायी देता है।

नयोग की दृष्टि से जब भगवान राम उन्हें पुत्र के रूप में स्वीकार करते हैं, तब उसका क्या तात्पर्य है? हमारे शास्त्रों की मान्यता है कि पुत्र पिता की आत्मा है, वह पिता का तद्रुप है, पिता और पुत्र में कोई भिन्नता नहीं है, ‘आत्मा वै जायते पुत्र:।’ ज्योंही भगवान के मुंह से ‘सुत’ शब्द निकला, सुनकर हनुमान जी आनन्द में डूब गये। भगवान राम इसके साथ ही एक अन्य मधुर बात जोड़ देते हैं। भगवान कहने लगे, “पुत्र हनुमान! संसार में जितने पुत्र होते हैं, वे सब माता-पिता के ऋणी होते हैं, पर तुम एक ऐसे पुत्र हो जिसने पिता को ऋणी बना लिया है।” कैसे?

प्रभु ने संकेत देते हुए कहा कि माँ पुत्र को गर्भ में धारण करती है, पिता पुत्र का पालन करके उसे बड़ा करता है, इसलिए पुत्र माता-पिता का ऋणी होता है, पर तुम्हें जन्म देने में न तो तुम्हारी माँ सीता जी को कष्ट उठाना पड़ा और न ही मुझे तुम्हारा पालन-पोषण करना पड़ा। तुम तो हमें बिना कष्ट के ही प्राप्त हुए हो। किन्तु तुमने अवश्य हमारे लिए कष्ट उठाया है। तुमने तो सारा क्रम ही उलट दिया। पिता तो पुत्र को गोद में लेता है, पर तुम तो ऐसे पुत्र मिले कि जिसने पिता को ही गोद में उठा लिया। तुम तो अनोखे पुत्र हो! अब यहाँ पर हनुमान जी भगवान राम के पुत्र हैं, इसका अभिप्राय क्या है? इसका अभिप्राय यह है कि भगवान राम स्वयं ही साक्षात हनुमान जी हैं। अनेक प्रसंगों में इसका उल्लेख किया गया है और हनुमान जी द्वारा कहा भी गया है – ‘वस्तुतस्तु त्वमेवाहम्’

ऋषि-मुनियों को हनुमान जी का व्यवहार इतना अटपटा सा लगा कि उनके मन में यह संदेह हो गया कि शायद इनको ठीक से तत्त्वज्ञान नहीं हुआ है। इसीलिए चरणों में बैठकर आँसू बहाया करते हैं, लेकिन जब प्रभु ने मुनियों के संदेह को दूर करने के लिए हनुमान जी से पूछा कि हनुमान तुम कौन हो? तो हनुमान जी ने यही कहा – ‘देहदृष्ट्या तु दासोऽहम्‌’। महाराज! देह की दृष्टि से मैं आपका दास हूँ। प्रभु ने कहा – देह की दृष्टि से नहीं! बुद्धि की दृष्टि से क्या हो? बोले – ‘बुद्धिदृष्ट्या त्वदंशकः’। बुद्धि की दृष्टि से आपका अंश हूँ और तत्त्वतः? बोले – ‘वस्तुतस्तु त्वमेवाहमिति मे निश्चिता मतिः’। वस्तुतः आप में और मुझमें कोई रंचमात्र भेद अथवा दूरी है ही नहीं। यही मेरा दृढ़ मत है।

इस दृष्टि से हनुमान जी ज्ञानयोग में ‘ज्ञानिनामग्रगण्यम्’ के रूप में साक्षात अखण्ड ज्ञानघन के पुत्र ही क्या, स्वयं वे ही हैं, तद्रुप हैं, सर्वथा एक हैं और अब भक्ति के संदर्भ में देखें तो हनुमान जी शंकर जी के पुत्र हैं। भक्ति का मूल आधार क्या है?

बिनु बिस्वास भगति नहिं तेहि बिनु द्रवहिं न रामु।

राम कृपा बिनु सपनेहूँ जीव न लह बिश्रामु।।

बिना विश्वास के भक्ति प्राप्त नहीं होती। शंकर जी हैं मूर्तिमान विश्वास। कर्मयोग की भूमिका में वे पवनपुत्र हैं। पवनदेव निष्काम कर्मयोग के आदर्श हैं। इस प्रकार अखण्ड ज्ञानघन के रूप में हनुमान जी लोगों को तत्त्वज्ञान का उपदेश देते हैं। विश्वास के घनीभूत रूप भगवान शंकर के पुत्र के रूप में लोगों के अन्तःकरण में विश्वास का संचार करते हैं और पवनपुत्र के रूप में निष्काम कर्मयोग की शिक्षा देते हैं। पवन देवता के द्वारा जो सेवा होती है, उसकी विलक्षणता यही है कि वह दिखायी नहीं देती। अन्य लोगों की सेवा तो दिखायी देती है, किन्तु पवन देवता अहर्निश (दिन-रात) सेवा कर रहे हैं, लेकिन हम उन्हें सेवा करते हुए कभी देख नहीं पाते। सेवा तो हो, पर सेवा करने वाला दिखायी न दे, प्रदर्शन न हो, कर्तृत्त्व अभिमान न हो और परिणाम पाने की रंचमात्र भी आकांक्षा न हो, वही निष्काम कर्मयोग है। यही पवन देवता की विशेषता है। उन पवन देवता के पुत्र के रूप में हनुमान जी निष्काम कर्मयोग का प्रचार और प्रसार करते हैं।

अब अगर कोई दीन-हीन शरणागति-योग वाला मिल जाए, तो हनुमानजी अपना परिचय न प्रभु के पुत्र के रूप में देते हैं, न शंकर जी के पुत्र के रूप में और न ही पवनपुत्र के रूप में। विभीषण जी ने हनुमान जी से पूछा – क्या प्रभु मुझ पर कृपा करेंगे? हनुमान जी ने तत्काल प्रतिप्रश्न किया, आप मुझे देखकर पूछ रहे हैं या बिना देखे ही? क्यों? आपको देखने का तात्पर्य क्या है? बोले – जब आप प्रत्यक्ष देख रहे हैं –

कहहु  कवन मैं परम कुलीना।

कपि चंचल सबहीं बिधि हीना।।

अरे भाई! मैं तो बन्दर का पुत्र हूँ न! देख रहे हो, मैं एक बन्दर हूँ। जब यह बन्दर कृपा का अधिकारी हो सकता है, तो फिर संसार में ऐसा कौन होगा, जो उनकी कृपा का अधिकारी नहीं है। संसार में किसी को निराश होने की आवश्यकता नहीं। हनुमानजी केसरी-पुत्र के रूप में प्रत्येक व्यक्ति के अन्तःकरण में प्रभु की कृपा का प्रसार करते हैं।

(लेखक आदर्श विद्या मंदिर उच्च माध्यमिक चौहटन जिला बाड़मेर के प्रधानाचार्य है।)

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