॥ श्रीनारायणि नमोस्तुते ॥
विद्या तथैव क्रियते भगवद्विष्णुमायया।
तया त्वमेष वैश्यश्च तथैवान्ये विवेकिन:॥
(श्रीदुर्गासप्तशती १३/३)
भगवान विष्णु की माया स्वरूपा भगवती ही विद्या उत्पन्न करने वाली हैं और उन्हीं की माया से विवेकी पुरुष भी मोह ग्रस्त हो जाते हैं।
यदि विद्या को उत्पन्न करने वाली महामाया ही मोहाविष्ट करें तो उससे कौन उबारे? “प्राधानिकं रहस्यम् ” (१५-१६) में उस स्वरूप का वर्णन है –
अक्षमाला अंकुशधरा वीणापुस्तकधारिणी।
महाविद्या महावाणी भारती वाक् सरस्वती।
हाथों में अक्षमाला, अंकुश, वीणा और पुस्तक धारण करने वाली महाविद्या, महावाणी, भारती, वाक् और सरस्वती जिनके नाम हैं।
हम सरस्वती साधकों के लिए विचारणीय है कि माता सरस्वती की कृपा प्राप्त होगी कैसे? सामान्य संसारी जीव कैसे कृपा प्राप्त कर सकता है ?
‘नास्ति विद्या समं चक्षु:’ विद्या के समान कोई नेत्र नहीं। इन नेत्रों को ‘ज्ञानाञ्जनशलाकया’ ज्ञान रूपी सुरमे की सलाई से खोलने वाले ‘चक्षुरुन्मीलन्तिनैव तस्मै श्री गुरुवे नमः’, माँ सरस्वती के प्रतिनिधि के रूप में ज्ञान का वितरण करते हैं। भारतीय संस्कृति में ‘गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णुर्गुरुर्देवो महेश्वर:’ के स्थान पर विराजित गुरु को अनेक प्रकार से महिमान्वित किया गया है।
शिक्षा ज्ञानार्जन की प्रक्रिया है। शिक्षा भाववाचक संज्ञा है, अमूर्त है परन्तु उसका मूर्त रूप हैं शिक्षक। शिक्षा के केन्द्र (जिसे आज कक्षा कक्ष तक सीमित मान लिया गया है) में केवल दो ही होते हैं – शिक्षक और विद्यार्थी। तैत्तिरीय उपनिषद् (शीक्षावल्ली द्वितीय अनुवाक) में कहा गया –
आचार्य: पूर्वरूपम्। अन्तेवास्युत्तररूपम्। विद्या संधि:। प्रवचनं संधानम्।
जिस प्रकार वर्णमाला के वर्णों की संधि से नये शब्द की रचना होती है, वैसे ही पूर्व वर्ण आचार्य और परवर्ती वर्ण शिष्य के मिलने से उत्पन्न होने वाली संधि विद्या है। आचार्य का प्रवचन और शिष्य द्वारा उसे धारण करने की, उनके बीच संवाद की प्रक्रिया ही संधान है।
मनुस्मृति (अध्याय २/१४०-१४१-१४२) में शिक्षक के तीन प्रकार बताए गए हैं – आचार्य, उपाध्याय और गुरु। सामान्य तौर पर इन तीनों को पर्यायवाची माना जाता है किन्तु भगवान स्वायंभुव मनु द्वारा दी गई व्यवस्था देखें –
उपनीय तु य: शिष्यं वेदमध्यापयेद् द्विज:।
साङ्गम् च सरहस्यम् च तमाचार्य प्रचक्षते॥
उपनयन संस्कार करने वाले और अंगों तथा रहस्यों की व्याख्या सहित वेदज्ञान का अध्ययन कराने वाले – आचार्य।
एकदेशं तु वेदस्य वेदाङ्गान्यपि वा पुनः।
यो अध्यापयति वृत्यर्थम् उपाध्याय: स उच्यते॥
आजीविका उपार्जन के उद्देश्य से वेदज्ञान के किसी एक अंश या वेदांग की शिक्षा देने वाले – उपाध्याय।
निषेकादीनि कर्माणि य: करोति यथाविधि।
सम्भावयति चान्नेन से विप्रो गुरुरुच्यते॥
अपने यजमान के यहां विविध संस्कारों को विधिपूर्वक कराते हैं और अपने गुरुकुल में शिष्यों के लिए अन्न आदि की व्यवस्था करते हैं – गुरु।
वायु पुराण (५९/३०) ‘आचार्य’ की व्याख्या इस प्रकार करता है –
स्वयमाचरते यस्माद् आचारं स्थापयत्यपि।
आचिनोति च शास्त्रार्थान् यमै: सनियमैर्युत:॥
जो स्वयं अपनी विद्या के अनुरूप आचरण करें, शिष्यों में आचार की स्थापना करें, और यम-नियम का पालन करते हुए शास्त्रों के अर्थ की उपपत्ति करें, वे आचार्य हैं।
भारतीय ज्ञान परम्परा में किसी ब्रहमविद् को भी तब तक आचार्य नहीं माना जाता था जब तक वह श्रोत्रिय, आचरणशील और अपने मत की उपपत्ति करने में सक्षम न हो। आचार्य अपने शास्त्र के लिए आप्त होते थे। उनके द्वारा उद्घोषित आप्त वचनों को आज तक शब्द प्रमाण के रूप में स्वीकार किया जाता है, उनके संदर्भ दिए जाते हैं। वेद – उपनिषद – दर्शन – मीमांसा- ब्राह्मण – आरण्यक – पुराण – इतिहास के ग्रंथ तथा द्वैत – अद्वैत – द्वैताद्वैत – शुद्धाद्वैत आदि की संकल्पना इन महान आचार्यों की वाणी है, उनके द्वारा स्थापित ज्ञान परम्परा है।
महाकवि कालिदास के प्रसिद्ध महाकाव्य ‘रघुवंशम्’ (सर्ग ५/२०) में महाराज रघु से अपने गुरु को दक्षिणा रूप में अर्पित करने हेतु धन की याचना करने आए कौत्स नामक स्नातक का उल्लेख है –
समाप्तविद्येन मया महर्षिर्विज्ञापितोऽभूत् गुरुदक्षिणाय।
समे चिरायास्खलितोपचारां तां भक्तिमेवागणयत महात्मा॥
अर्थात् विद्या पूर्ण होने पर मैंने महर्षि से गुरु दक्षिणा में क्या अर्पित करूं, ऐसा प्रश्न किया। उन महात्मा ने मेरी अविचल चिरकालिक गुरु भक्ति को ही मेरी दक्षिणा मान लिया।
अथर्ववेद (११/३/५) में गुरु-शिष्य सम्बन्ध पर एक सूत्र है जो शिक्षा शास्त्र के विश्व साहित्य में अप्रतिम उदाहरण है –
आचार्य उपनयमानो ब्रहमचारिणं कृणुते गर्भमन्त:।
तं रात्रिस्त्रि उदरे बिभर्ति तं जातं दृष्टुमभिसंयन्ति देवा:॥
अर्थात उपनयन संस्कार करने वाले आचार्य बालक को उसी प्रकार अपने पास रखते थे जैसे माता गर्भ में धारण करती है। तीन रात्रि तक आचार्य उसे आश्रम में अपने समीप रखकर बाद में उसे शिक्षा देकर इस योग्य बना देते थे कि देवता भी उसे देखने आयें।
भारत की वैदिक शिक्षा व्यवस्था में यह श्रेष्ठ कल्पना – गुरु-शिष्य सम्बन्ध की तुलना माता-पुत्र के सम्बन्ध से, इससे बेहतर और क्या हो सकता है? जैसे माँ गर्भ में धारण करती, जन्म देती, रक्षण-पोषण और संवर्द्धन करती है उसी प्रकार उपनयन संस्कार से समावर्तन तक आचार्य भी शिष्य के प्रति दायित्व निर्वाह करते हैं।
समावर्तन उपदेश की चर्चा किए बिना संपूर्ण ज्ञान परम्परा का वर्णन पूर्ण नहीं हो सकता। तैत्तिरीय उपनिषद् के एकादश अनुवाक में गुरुकुल में अध्ययन पूर्ण कर गृहस्थ आश्रम में प्रवेश करने जा रहे शिष्य को गुरु जीवन व्यवहार की शिक्षा देते हैं – सत्य बोलना, धर्म का आचरण करना, स्वाध्याय – प्रवचन – धर्मानुष्ठान – देवपितृकार्य में प्रमाद न करना के अतिरिक्त कुछ विशेष बातें सिखाते हैं, जैसे -‘प्रजातन्तुं मा व्यवच्छेत्सी:’ अर्थात् सृष्टि के क्रम प्रजा उत्पत्ति को बाधित न करना।
इसी प्रकार, “मातृदेवो भव। पितृदेवो भव। आचार्यदेवो भव। अतिथिदेवो भव।” में इन्हें देवता स्वरूप मानो, इसके साथ गुरु जी सावधान भी करते हैं। ये भी मनुष्य हैं, गुण – दोष सबमें होते हैं, इसलिए बताया – “नान्यनवद्यानि कर्माणि। तानि सेवितव्यानि। नो इतराणि। यान्यस्माकं सुचरितानि। तानि त्वयोपास्यानि। नो इतराणि।” अर्थात् हमारे भी निर्दोष कर्मों और श्रेष्ठ आचरणों का ही अनुसरण – अनुपालन करना, हमारे दोषों को मत अपनाना। अपने भी दोष होना स्वाभाविक है किन्तु शिष्य के जीवन में वे दोष अनुकरण न किए जाएं, ऐसा स्वीकार करने – बोलने का साहस केवल भारत के गुरु में है।
शिक्षा क्षेत्र के हम साधक अपने पूर्ववर्ती उन महान आचार्यों की परम्परा के वाहक बन सकें, यही प्रार्थना उस “महाविद्या – महामाया – महामेधा – महास्मृति जगन्माता” के श्रीचरणों में।
ज्ञान मार्ग में आपका सहयात्री,
– अवनीश भटनागर
(लेखक विद्या भारती के अखिल भारतीय उपाध्यक्ष है।)
बहुत सुन्दर